प्रयागराज में छात्रों का महासंग्राम, उमड़ी भारी भीड़
उत्तर प्रदेश के प्रमुख शैक्षिक केंद्र माने जाने वाले शहर में शनिवार को युवाओं का गुस्सा सड़कों पर साफ दिखाई दिया। मौका था भारतीय विद्यार्थी मोर्चा द्वारा आयोजित विशाल महारैली और प्रदर्शन का, जो सिविल लाइंस इलाके के प्रसिद्ध पत्थर गिरजाघर धरना स्थल पर संपन्न हुआ। इस आंदोलन में बड़ी संख्या में दूर-दराज के छात्र, युवा और विभिन्न छात्र संगठनों के कार्यकर्ता शामिल हुए। प्रदर्शनकारियों के तेवर सरकार और विश्वविद्यालय प्रशासन के खिलाफ काफी आक्रामक नजर आए।
इस विरोध प्रदर्शन का मुख्य केंद्र बिंदु शिक्षा के क्षेत्र में हो रहे बदलाव और नीतियां रहीं। वक्ताओं ने मंच से साफ शब्दों में चेताया कि यदि छात्र हितों की अनदेखी का सिलसिला जारी रहा, तो इस आंदोलन को और अधिक व्यापक रूप दिया जाएगा। युवाओं की इस भीड़ ने प्रशासनिक दफ्तरों से लेकर सत्ता के गलियारों तक अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई है।
धरना स्थल पर मौजूद छात्रों ने तख्तियां और बैनर थाम रखे थे, जिन पर शिक्षा के बाजारीकरण और बढ़ती बेरोजगारी के खिलाफ तीखे नारे लिखे हुए थे। पुलिस और प्रशासनिक अमला भी कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए मौके पर मुस्तैद दिखाई दिया, हालांकि प्रदर्शन पूरी तरह से शांतिपूर्ण रहा और युवाओं ने लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात रखी।
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इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में 52% सीटों की कटौती पर मचा बवाल
इस पूरे आंदोलन की सबसे बड़ी और मुख्य मांग इलाहाबाद विश्वविद्यालय में सीटों की भारी कटौती को तुरंत रोकना थी। छात्र नेताओं ने आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि संस्थान में यूजी और पीजी यानी स्नातक और परास्नातक पाठ्यक्रमों की लगभग 52 प्रतिशत सीटें कम कर दी गई हैं। इस कटौती की वजह से हजारों मेधावी और जरूरतमंद छात्रों के उच्च शिक्षा प्राप्त करने का सपना बीच में ही टूट रहा है।
वक्ताओं ने आरोप लगाया कि सीटों के कम होने से प्रवेश परीक्षा में प्रतिस्पर्धा अत्यधिक बढ़ जाएगी, जिसका सीधा नुकसान ग्रामीण पृष्ठभूमि और सामान्य वर्ग के आर्थिक रूप से कमजोर विद्यार्थियों को उठाना पड़ेगा। यूनिवर्सिटी प्रशासन के इस कदम को छात्र समुदाय ने शिक्षा से वंचित करने की एक सोची-समझी साजिश करार दिया है।
छात्रों का कहना है कि एक तरफ सरकारें सबका साथ और सबका विकास का नारा देती हैं, वहीं दूसरी तरफ देश के प्रतिष्ठित केंद्रीय विश्वविद्यालयों में सीटें सीमित करके उच्च शिक्षा के दरवाजे आम जनता के लिए बंद किए जा रहे हैं। जब तक यह कटौती वापस नहीं ली जाती, तब तक उनका संघर्ष निरंतर जारी रहेगा।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 और निजीकरण के खिलाफ खुली जंग
भारतीय विद्यार्थी मोर्चा के बैनर तले हुए इस प्रदर्शन में केवल सीटों की कटौती ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 (NEP) को भी सिरे से खारिज किया गया। वक्ताओं ने अपने संबोधन में स्पष्ट किया कि यह नीति शिक्षा को आम आदमी की पहुंच से दूर कर रही है और इसे पूरी तरह से व्यावसायिक रूप दे रही है।
शिक्षा के तेजी से हो रहे निजीकरण पर गहरी चिंता जताते हुए छात्र नेताओं ने कहा कि इससे गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों के बच्चों के लिए उच्च शिक्षा हासिल करना असंभव होता जा रहा है। महंगे होते शिक्षण संस्थानों और कोर्सों के कारण समाज का एक बड़ा वर्ग पढ़ाई छोड़ने के लिए मजबूर हो रहा है।
छात्र संगठनों ने मांग की कि सरकार को शिक्षा के व्यापारीकरण पर रोक लगानी चाहिए और सरकारी शिक्षण संस्थानों को मजबूत करना चाहिए ताकि हर वर्ग के छात्र को सस्ती और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिल सके।
बेरोजगारी भत्ता और शिक्षक भर्ती पर सरकार से तीखे सवाल
शिक्षा के अलावा रोजगार का मुद्दा भी इस महारैली के केंद्र में रहा। देश और प्रदेश में बढ़ती बेरोजगारी को लेकर युवाओं ने सरकार के दावों की पोल खोली। प्रदर्शनकारियों ने मांग की कि जब तक युवाओं को स्थाई रोजगार नहीं मिलता, तब तक उन्हें सरकार की ओर से हर महीने बेरोजगारी भत्ता दिया जाए।
इसके साथ ही, लंबे समय से लटकी पड़ी शिक्षक भर्ती प्रक्रिया को तत्काल प्रभाव से शुरू करने की पुरजोर मांग उठाई गई। वक्ताओं ने कहा कि स्कूलों और विश्वविद्यालयों में शिक्षकों के हजारों पद खाली पड़े हैं, लेकिन भर्ती प्रक्रिया में हो रही अंतहीन देरी के कारण योग्य युवा ओवरएज हो रहे हैं और मानसिक रूप से प्रताड़ित हो रहे हैं।
"शिक्षा का निजीकरण और विश्वविद्यालयों में सीटों की भारी कटौती देश के युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ है। हम गरीब और मध्यमवर्गीय छात्रों के हक की यह लड़ाई तब तक लड़ते रहेंगे जब तक सरकार हमारी मांगें नहीं मान लेती।" — छात्र नेता, भारतीय विद्यार्थी मोर्चा
छात्राओं की सुरक्षा और भविष्य की रणनीति
शैक्षणिक और आर्थिक मांगों के साथ-साथ इस महासंग्राम में परिसरों और सार्वजनिक स्थलों पर छात्राओं की सुरक्षा का मुद्दा भी प्रमुखता से उठाया गया। वक्ताओं ने कहा कि परिसरों में महिलाओं के लिए सुरक्षित माहौल का होना अनिवार्य है, लेकिन वर्तमान हालात चिंताजनक बने हुए हैं। छात्राओं के खिलाफ बढ़ रहे अपराधों पर रोक लगाने और कड़ी कार्रवाई करने की मांग की गई।
अंत में छात्र नेताओं ने चेतावनी दी कि यदि जिला प्रशासन और विश्वविद्यालय प्रशासन ने जल्द ही इन सभी मांगों पर सकारात्मक रुख नहीं अपनाया, तो वे सड़कों से लेकर संसद तक बड़ा आंदोलन खड़ा करने के लिए बाध्य होंगे। इस प्रदर्शन ने एक बार फिर देश के युवा वर्ग के भीतर सुलग रहे असंतोष को सतह पर ला दिया है।








