कैंसर के पीछे छिपे हैं ये अनदेखे और खतरनाक संक्रमण
जब भी हम कैंसर जैसी गंभीर और जानलेवा बीमारी के बारे में सोचते हैं, तो आमतौर पर हमारे जहन में अस्वास्थ्यकर जीवनशैली, अत्यधिक खानपान की गलत आदतें, तंबाकू, शराब या आनुवंशिक कारणों का ही ख्याल आता है। हममें से ज्यादातर लोग यही मानते हैं कि यह बीमारी केवल बुरी आदतों या पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही कमजोरियों की वजह से पनपती है। लेकिन हाल ही में चिकित्सा जगत के सबसे प्रतिष्ठित माने जाने वाले मेडिकल जर्नल 'द लैंसेट ऑन्कोलॉजी' में प्रकाशित एक चौंकाने वाली रिपोर्ट ने इस धारणा को पूरी तरह से बदल दिया है। इस ताज़ा अध्ययन के आंकड़े बताते हैं कि दुनिया भर में कैंसर के हर आठवें मामले की असली जड़ कोई बुरी आदत नहीं, बल्कि शरीर के भीतर चुपचाप पनपने वाला एक पुराना संक्रमण है।
विशेषज्ञों के अनुसार, केवल वैश्विक स्तर पर ही नहीं बल्कि हमारे देश भारत में भी संक्रामक रोगजनकों यानी पैथोजन्स के कारण कैंसर के मामले खतरनाक रूप से बढ़ रहे हैं। आंकड़ों पर नजर डालें तो भारत में हर साल लगभग 1.9 लाख से अधिक लोग ऐसे कैंसर का शिकार हो रहे हैं, जिनकी मुख्य वजह कोई न कोई पुराना वायरल या बैक्टीरियल इन्फेक्शन रहा है। ये रोके जा सकने वाले संक्रमण शरीर की कोशिकाओं को लंबे समय तक नुकसान पहुंचाते हैं और धीरे-धीरे उन्हें घातक ट्यूमर या कैंसर ग्रस्त कोशिकाओं में बदल देते हैं। समय रहते यदि इनके प्रति सतर्कता न बरती जाए, तो स्थिति बेहद भयावह हो सकती है।
संबंधित खबरें
ह्यूमन पेपिलोमावायरस (HPV) बना महिलाओं के लिए सबसे बड़ा जानलेवा खतरा
भारत में संक्रमण से होने वाले कैंसर के मामलों का विश्लेषण किया जाए, तो सबसे बड़ा और सबसे खतरनाक योगदान 'ह्यूमन पेपिलोमावायरस' यानी HPV का पाया गया है। अकेले इस एक वायरस की वजह से देश में हर साल 1 लाख से ज्यादा कैंसर के नए मामले सामने आ रहे हैं। यह वायरस मुख्य रूप से महिलाओं में होने वाले गर्भाशय ग्रीवा यानी सर्वाइकल कैंसर के लिए पूरी तरह जिम्मेदार माना जाता है। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि इस गंभीर खतरे से निपटने के लिए आज मेडिकल साइंस में बेहद असरदार टीके उपलब्ध हैं, लेकिन जागरूकता की भारी कमी और सामाजिक झिझक के कारण यह आंकड़ा लगातार बढ़ता ही जा रहा है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का साफ तौर पर कहना है किशोरावस्था की शुरुआत में ही लड़कियों को एचपीवी का टीका लगवाकर इस जानलेवा बीमारी के खतरे को लगभग नगण्य किया जा सकता है। इसके अलावा, नियमित रूप से पैप स्मीयर टेस्ट और रूटीन स्क्रीनिंग कराने से शुरुआती लक्षणों को समय रहते पकड़ा जा सकता है। लेकिन जानकारी के अभाव में महिलाएं अक्सर शुरुआती संकेतों को नजरअंदाज कर देती हैं, जिससे बीमारी एडवांस स्टेज में पहुंच जाती है और इलाज बेहद कठिन हो जाता है.
पेट में पलने वाला छोटा सा बैक्टीरिया हेलिकोबैक्टर पायलोरी दे रहा है गंभीर चुनौती
एचपीवी वायरस के बाद जिस दूसरे सबसे बड़े खतरे ने देश के मेडिकल जानकारों की नींद उड़ाई है, वह पेट के अंदर होने वाला संक्रमण है। रिपोर्ट के अनुसार, 'हेलिकोबैक्टर पायलोरी' (H. pylori) नाम का एक सूक्ष्म बैक्टीरिया भारत में लगभग 47,000 कैंसर मामलों के लिए जिम्मेदार साबित हुआ है। यह बैक्टीरिया पेट की अंदरूनी परत में लंबे समय तक डेरा डाले रहता है और पेट दर्द, अल्सर जैसी समस्याओं को जन्म देता है। यदि इसका सही समय पर इलाज न कराया जाए, तो यह आगे चलकर गैस्ट्रिक या पेट के कैंसर का खतरनाक रूप धारण कर लेता है।
मैक्स हॉस्पिटल की मेडिकल ऑन्कोलॉजी विभाग की चेयरमैन डॉ. मीनू वालिया के अनुसार, यह बैक्टीरिया बहुत दुर्लभ नहीं है और कई लोगों के शरीर में बचपन से ही प्रवेश कर जाता है। यह सालों तक बिना किसी खास लक्षण के चुपचाप शरीर के भीतर बना रहता है। हालांकि, हर संक्रमित व्यक्ति को कैंसर हो यह जरूरी नहीं है, लेकिन जिन लोगों में यह संक्रमण लंबे समय तक रहता है और पुरानी सूजन पैदा करता है, उनके डीएनए को नुकसान पहुंचता है जो अंततः कैंसर कोशिकाओं का निर्माण करता है।
लिवर कैंसर के पीछे छिपे हैं हेपेटाइटिस बी और सी जैसे खतरनाक वायरस
पेट और सर्वाइकल कैंसर के अलावा, हमारे देश में लिवर को अंदर ही अंदर खोखला करने वाले 'हेपेटाइटिस बी' और 'हेपेटाइटिस सी' वायरस भी बड़ी चुनौती बने हुए हैं। इन दोनों जानलेवा वायरसों की वजह से देश में क्रमशः लगभग 10,000 और 5,300 लिवर कैंसर के नए मामले सामने आए हैं। इसके साथ ही, 'एपस्टीन-बार वायरस' भी लगभग 22,000 कैंसर मामलों के लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार पाया गया है। ये सभी रोगजनक शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को चकमा देकर सालों-साल छिपे रहते हैं और धीरे-धीरे ऊतकों को नष्ट करते रहते हैं।
"कैंसर के कई मामलों के पीछे साधारण से दिखने वाले इन्फेक्शन होते हैं जो वर्षों तक शरीर में बिना लक्षण के छिपे रहते हैं। सही समय पर टीकाकरण, जागरूकता और रूटीन जांच के जरिए इन मामलों को बड़ी आसानी से रोका जा सकता है।" — डॉ. मीनू वालिया, वरिष्ठ ऑन्कोलॉजिस्ट
टीकाकरण और शुरुआती जांच से ही बच सकती है लाखों लोगों की बहुमूल्य जिंदगी
इस पूरी गंभीर रिपोर्ट के सामने आने के बाद देश के तमाम स्वास्थ्य विशेषज्ञों और शोधकर्ताओं का यही मानना है कि इन जानलेवा मामलों को सही नीति और समय पर उठाए गए कदमों से पूरी तरह रोका जा सकता है। चूंकि ये सभी मामले किसी न किसी संक्रामक एजेंट से जुड़े हुए हैं, इसलिए देशस्तर पर वैक्सीनेशन अभियानों को और अधिक मजबूत करने की आवश्यकता है। नवजात शिशुओं को हेपेटाइटिस बी का टीका समय पर लगवाना और युवा लड़कियों को एचपीवी वैक्सीन देना इस दिशा में सबसे अचूक और प्रभावी हथियार साबित हो सकता है।
इसके अलावा, आम नागरिकों को भी अपने स्वास्थ्य के प्रति जागरूक होना पड़ेगा। पेट की पुरानी समस्याओं, लंबे समय तक रहने वाले पाचन विकारों या किसी भी तरह के पुराने संक्रमण को हल्के में लेने की भूल बिल्कुल न करें। समय-समय पर मेडिकल जांच करवाना और किसी भी असामान्यता दिखने पर तुरंत योग्य चिकित्सक से परामर्श लेना ही इस घातक बीमारी से बचने का एकमात्र सुरक्षित रास्ता है। सरकार और स्वास्थ्य संगठनों को मिलकर देश के दूरदराज के इलाकों तक इन जीवनरक्षक टीकों और जांच सुविधाओं की पहुंच को सुनिश्चित करना होगा ताकि हर नागरिक का जीवन सुरक्षित हो सके।








