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अल्जाइमर जांच में बड़ी कामयाबी: अब मात्र 7 मिनट के एमआरआई स्कैन और रक्त परीक्षण से जल्द पकड़ में आएगी गंभीर बीमारी

वैज्ञानिकों ने अल्जाइमर और डिमेंशिया के निदान को तेज करने के लिए नई तकनीकों का परीक्षण शुरू कर दिया है। मात्र 6.5 से 7 मिनट के एमआरआई स्कैन और ब्लड टेस्ट से डॉक्टरों को शुरुआती चरण में ही बीमारी का आकलन करने में बड़ी मदद मिलेगी।
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नेशनल डेस्क, द फ्रीलांस
राष्ट्रीय संपादकीय ब्यूरो•2 अक्टूबर 2026 • अपडेटेड•43
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अल्जाइमर जांच में बड़ी कामयाबी: अब मात्र 7 मिनट के एमआरआई स्कैन और रक्त परीक्षण से जल्द पकड़ में आएगी गंभीर बीमारी
📷 अल्जाइमर जांच में बड़ी कामयाबी: अब मात्र 7 मिनट के एमआरआई स्कैन और रक्त परीक्षण से जल्द पकड़ में आएगी गंभीर बीमारी — मुख्य घटनाक्रमफोटो साभार: रॉयटर्स / एजेंसीज़ / सोशल मीडिया

खबर की बड़ी बातें (Key Highlights)

  • नवीनतम तकनीकी परीक्षणों के तहत केवल 7 मिनट में होने वाले एमआरआई स्कैन और रक्त बायोमार्कर परीक्षणों से अल्जाइमर का शुरुआती दौर में पता लगाना आसान होगा।
  • ब्रिटेन की प्रमुख एजेंसियों द्वारा समर्थित इस नई पहल का मुख्य उद्देश्य मरीजों के रेफरल के 18 सप्ताह के भीतर निदान की दर को 60% से बढ़ाकर 92% तक पहुंचाना है।
  • शोधकर्ताओं के अनुसार, यह नई तीव्र स्कैनिंग पद्धति मौजूदा एमआरआई मशीनों की क्षमता को प्रति घंटे दो से बढ़ाकर तीन से चार मरीजों तक कर सकती है।
  • विशेषज्ञों का कहना है कि याददाश्त कमजोर होने के पीछे हमेशा अल्जाइमर नहीं होता, बल्कि थायराइड, विटामिन बी12 की कमी या तनाव जैसी ठीक होने योग्य समस्याएं भी हो सकती हैं।

अल्जाइमर और डिमेंशिया की जांच में क्रांतिकारी बदलाव की शुरुआत

चिकित्सा जगत में एक बेहद अहम विकास के तहत, वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं ने अल्जाइमर रोग के निदान की प्रक्रिया को अत्यधिक तेज और सुगम बनाने की दिशा में कदम बढ़ाए हैं। सामान्य तौर पर मस्तिष्क से जुड़ी गंभीर बीमारियों का पता लगाने में काफी लंबा समय लग जाता है, जिससे मरीजों और उनके परिवारों को भारी मानसिक और शारीरिक परेशानियों का सामना करना पड़ता है। लेकिन अब आधुनिक तकनीकों के सहारे इस पूरी प्रक्रिया को कुछ ही मिनटों में समेटने की कोशिश की जा रही है। हाल ही में सामने आए शोध परिणामों के मुताबिक, लगभग 7 मिनट की प्रक्रिया वाले मैग्नेटिक रेजोनेंस इमेजिंग यानी एमआरआई स्कैन और बायोमार्कर आधारित रक्त परीक्षण अल्जाइमर के निदान के समय को नाटकीय रूप से कम करने का रास्ता खोल रहे हैं। हालांकि विशेषज्ञ यह भी स्पष्ट करते हैं कि ये आधुनिक विधियां डॉक्टरों को रोग का त्वरित आकलन करने में तो पूरी मदद करती हैं, लेकिन ये पूरी तरह से पारंपरिक संज्ञानात्मक परीक्षणों और विस्तृत नैदानिक आकलन का विकल्प नहीं हैं।

अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इस दिशा में बड़े पैमाने पर काम शुरू हो चुका है। ब्रिटेन की एक प्रमुख अनुसंधान और नवाचार एजेंसी मनोभ्रंश के निदान में तेजी लाने के लिए भारी-भरकम वित्तीय सहायता के साथ एक व्यापक कार्यक्रम का समर्थन कर रही है। इस योजना के तहत सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली के भीतर रक्त परीक्षण, तीव्र मस्तिष्क स्कैन और दूरस्थ संज्ञानात्मक आकलन जैसी कुल नौ नवीन प्रौद्योगिकियों का परीक्षण किया जा रहा है। इस पूरी कवायद का प्राथमिक लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि अस्पताल में रेफरल मिलने के 18 सप्ताह के भीतर निदान किए जाने वाले रोगियों का प्रतिशत मौजूदा 60 फीसदी से उछलकर सीधे 92 फीसदी तक पहुंच जाए। चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े लोगों का मानना है कि यदि यह परीक्षण सफल रहता है, तो दुनिया भर के स्वास्थ्य तंत्र पर से निदान का बोझ काफी हद तक कम हो जाएगा।

अल्जाइमर जांच में बड़ी कामयाबी: अब मात्र 7 मिनट के एमआरआई स्कैन और रक्त परीक्षण से जल्द पकड़ में आएगी गंभीर बीमारी
📷 अल्जाइमर और मस्तिष्क संबंधी विकારों की जांच के लिए अत्याधुनिक एमआरआई स्कैन तकनीक का उपयोग करते चिकित्सा विशेषज्ञ।

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एमआरआई स्कैन की समयसीमा सिमटी, डॉक्टरों के लिए बढ़ी सहूलियत

लंदन स्थित यूनिवर्सिटी कॉलेज (यूसीएल) के एक प्रतिष्ठित अध्ययन में तीव्र स्कैनिंग प्रक्रिया और पारंपरिक स्कैनिंग प्रक्रिया के बीच के अंतर का बारीकी से विश्लेषण किया गया। इस शोध के दौरान लगभग 92 स्वयंसेवकों को शामिल किया गया और दोनों विधियों के परिणामों की तुलना की गई। पारंपरिक तौर पर जहां एक एमआरआई स्कैन में काफी वक्त लगता था, वहीं इस नई तीव्र विधि ने स्कैनिंग के समय को लगभग 18 मिनट से घटाकर मात्र 6.5 से 7 मिनट के आसपास ला दिया। सबसे खास बात यह रही कि इस अध्ययन के दौरान छवियों को पढ़ने वाले डॉक्टरों को इस बात की कोई जानकारी नहीं दी गई थी कि कौन सी छवि किस विशेष प्रक्रिया के तहत तैयार की गई है। इसके बावजूद परिणामों ने यह साबित कर दिया कि यह तीव्र विधि नैदानिक ​​मूल्यांकन और मस्तिष्क शोष की मात्रा के आकलन में अपनी पूर्ण विश्वसनीयता और सटीकता बनाए रखती है।

इस नई तकनीक का एक और सबसे बड़ा व्यावहारिक फायदा यह है कि इसके लिए किसी भी अस्पताल को नई और भारी-भरकम मशीनें खरीदने की आवश्यकता नहीं पड़ती है। यह तकनीक मौजूदा और पारंपरिक एमआरआई मशीनों का ही इस प्रकार से अनुकूलतम उपयोग करती है कि उनकी कार्यक्षमता स्वतः बढ़ जाती है। यूसीएल के आंकड़ों के अनुसार, इस प्रक्रिया को अपनाने के बाद अस्पताल अपनी दैनिक जांच क्षमता को प्रति घंटे दो मरीजों से बढ़ाकर सीधे तीन से चार मरीजों तक ले जा सकते हैं। हालांकि, शोधकर्ताओं ने यह भी स्पष्ट किया है कि लगभग 7 मिनट का यह समय केवल मशीन के भीतर स्कैनिंग प्रक्रिया का है, जिसमें मरीज की अस्पताल में तैयारी, परामर्श और परिवहन का समय शामिल नहीं है। इसके बावजूद, यह चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में एक बहुत बड़ी छलांग मानी जा रही है।

याददाश्त कमजोर होने के पीछे हमेशा अल्जाइमर नहीं, अन्य कारणों पर भी दें ध्यान

आम तौर पर जब भी किसी व्यक्ति की याददाश्त थोड़ी बहुत भी कमजोर होने लगती है, तो परिवार और समाज में यह डर बैठ जाता है कि वह व्यक्ति अल्जाइमर या डिमेंशिया जैसी लाइलाज बीमारी की चपेट में आ रहा है। लेकिन न्यूरोलॉजी और चिकित्सा विशेषज्ञों का कहना है कि यह धारणा हमेशा सही नहीं होती है। कई बार याददाश्त में कमजोरी के पीछे ऐसे कई सामान्य और आसानी से ठीक किए जाने वाले कारण छिपे होते हैं, जिनका समय पर निदान और उपचार संभव है। हैदराबाद के यशोदा हॉस्पिटल्स के वरिष्ठ सलाहकार न्यूरो और स्पाइन सर्जन तथा क्लिनिकल डायरेक्टर डॉ. बाला राजा शेखर चंद्र यतुकुरी के अनुसार, हर बार भूलने की बीमारी डिमेंशिया का संकेत नहीं होती। बढ़ती उम्र में कभी-कभार छोटी-मोटी चीजें भूल जाना एक स्वाभाविक प्रक्रिया हो सकती है, लेकिन जब यह समस्या लगातार बढ़ने लगे और दैनिक जीवन के कामकाज प्रभावित होने लगें, तब डॉक्टर से परामर्श लेना अनिवार्य हो जाता है।

"हर बार याददाश्त कमजोर होना डिमेंशिया या अल्जाइमर का संकेत नहीं होता। उम्र बढ़ने पर कभी-कभार नाम या चीजें भूलना सामान्य हो सकता है, लेकिन यदि यह समस्या लगातार बनी रहे और रोजमर्रा के काम प्रभावित होने लगें, तो विशेषज्ञ डॉक्टर से तुरंत जांच करानी चाहिए। कई बार इसके पीछे थायराइड या पोषण संबंधी कमियां होती हैं जिनका इलाज पूरी तरह संभव है।" — डॉ. बाला राजा शेखर चंद्र यतुकुरी, वरिष्ठ न्यूरो सर्जन

चिकित्सा साहित्यों और हार्वर्ड मेडिकल स्कूल के शोध लेखों के मुताबिक, उम्र बढ़ने के साथ हमारे मस्तिष्क के फ्रंटल लोब की कार्यप्रणाली में कुछ स्वाभाविक बदलाव आ सकते हैं, जिसके कारण छोटी-छोटी बातें भूलने की घटनाएं सामने आती हैं। इसके अलावा अत्यधिक मानसिक तनाव, शारीरिक थकान, नींद की पूरी न होना और डिप्रेशन जैसी स्थितियां भी हमारी याददाश्त को सीधे तौर पर प्रभावित करती हैं। इसके अलावा हाइपोथायराइडिज्म यानी थायराइड ग्रंथि का सुस्त पड़ना भी शरीर में थकान, सुस्ती और सोचने की गति को धीमा कर सकता है। इसी तरह शरीर में विटामिन बी12 की कमी तंत्रिका तंत्र को कमजोर करती है, जिससे मूड स्विंग, हाथ-पांव में सुन्नपन या झनझनाहट और याददाश्त में गिरावट जैसी समस्याएं पैदा होने लगती हैं। इन सभी शारीरिक समस्याओं का निदान और उपचार आधुनिक चिकित्सा पद्धति में पूरी तरह से उपलब्ध है।

मस्तिष्क के कॉर्टेक्स में छिपे शुरुआती संकेतों को पकड़ रही है नई तकनीक

अल्जाइमर रोग को लेकर हाल ही में सामने आए एक अन्य महत्वपूर्ण अध्ययन से यह भी पता चला है कि एमआरआई स्कैन के जरिए इस बीमारी के स्पष्ट और गंभीर लक्षण शरीर में प्रकट होने से लगभग 7 साल पहले ही मस्तिष्क के भीतर चल रहे सूक्ष्म परिवर्तनों को भांपा जा सकता है। शोधकर्ताओं ने एक हजार से अधिक लोगों के स्वास्थ्य रिकॉर्ड और एमआरआई चित्रों का लंबे समय तक अध्ययन किया। उन्होंने पाया कि जिन लोगों के शरीर में बाद में एमिलॉयड-बीटा प्रोटीन का स्तर अत्यधिक उच्च पाया गया, उनके मस्तिष्क का सबसे बाहरी हिस्सा यानी सेरेब्रल कॉर्टेक्स उन लोगों की तुलना में थोड़ा अलग और अधिक मोटा था, जो इस बीमारी से सुरक्षित रहे। कॉर्टेक्स की मोटाई महज कुछ मिलीमीटर होने के बावजूद, अत्याधुनिक एमआरआई तकनीक अब इन सूक्ष्म अंतरों को भी सटीकता से पहचानने लगी है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक अल्जाइमर के पारंपरिक और गंभीर लक्षण जैसे कि अत्यधिक भूलने की आदत या व्यवहार में अमूल्य परिवर्तन सतह पर आते हैं, तब तक मस्तिष्क को काफी नुकसान पहुंच चुका होता है। ऐसे में यदि नए रक्त परीक्षणों और इस 7 मिनट लंबी तीव्र एमआरआई स्कैनिंग तकनीक को बड़े पैमाने पर अस्पतालों में लागू कर दिया जाए, तो डॉक्टरों को शुरुआती चरण में ही बीमारी के जोखिम का अंदाजा लग जाएगा। शुरुआती दौर में बीमारी की पहचान होने से मरीजों को समय रहते बेहतर उपचार, लाइफस्टाइल में बदलाव और उचित परामर्श देने का पर्याप्त अवसर मिल सकेगा। आने वाले समय में दुनिया भर के स्वास्थ्य तंत्र के लिए यह तकनीक एक वरदान साबित हो सकती है, जो मनोभ्रंश के खिलाफ जंग में मील का पत्थर बनेगी।

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