सड़क की शान रही एंबेसडर कार की वापसी की सुगबुगाहट
भारतीय ऑटोमोबाइल इतिहास के पन्नों को पलटें तो 'एंबेसडर' (Ambassador) का नाम आते ही एक खास रसूख और पुरानी यादें ताजा हो जाती हैं। एक समय था जब यह गाड़ी भारतीय सड़कों पर हुकूमत करती थी। देश के प्रधानमंत्री से लेकर बड़े-बड़े नेता, केंद्रीय मंत्री और आला अफसर इसी कार की सवारी करना अपनी शान समझते थे। आम जनता के दिलों में भी इस गाड़ी के प्रति एक अलग ही दीवानगी हुआ करती थी। इसे 'पावर और प्रेस्टीज' की पहचान माना जाता था। लेकिन बदलते वक्त के साथ आधुनिक कारों के आने और समय पर खुद को न बदल पाने की वजह से इस दिग्गज कार की रफ्तार थम गई और आखिरकार इसका उत्पादन बंद करना पड़ा।
अब पिछले कुछ दिनों से सोशल मीडिया और ऑटोमोबाइल सेक्टर के गलियारों में इस बात की चर्चाएं जोर पकड़ रही हैं कि हिंदुस्तान मोटर्स एक बार फिर अपनी इस ऐतिहासिक कार को नए रूप में बाजार में उतारने की योजना बना रही है। इस खबर के सामने आते ही उन तमाम लोगों के चेहरे पर मुस्कान आ गई है जो इस क्लासिक कार के पुराने दिनों को याद करते हैं। हालांकि, क्या वाकई एंबेसडर उस रूप में लौट रही है या फिर यह सिर्फ एक चर्चा मात्र है, इसके पीछे की सच्चाई कुछ और ही है जिसे समझना बेहद जरूरी है।
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इलेक्ट्रिक व्हीकल के दौर में री-एंट्री की प्लानिंग
सामने आ रही रिपोर्ट्स के मुताबिक, हिंदुस्तान मोटर्स (Hindustan Motors) अपनी खोई हुई विरासत को वापस पाने के लिए वाहन निर्माण के क्षेत्र में फिर से कदम रखने की फिराक में है। इस बार कंपनी का पूरा फोकस आधुनिक तकनीक यानी इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) सेगमेंट पर है। मौजूदा समय में जब देश और दुनिया में इलेक्ट्रिक वाहनों का क्रेज लगातार बढ़ता जा रहा है, ऐसे में पारंपरिक ऑटो कंपनियों का इस ओर रुख करना स्वाभाविक भी है।
कंपनी की योजना पश्चिम बंगाल के उत्तरपारा स्थित अपने पुराने कारखाने में एक बार फिर से व्हीकल मैन्युफैक्चरिंग की शुरुआत करने की है। इसके लिए सीकेए बिरला ग्रुप (CKA Birla Group) ने पश्चिम बंगाल सरकार के साथ अनौपचारिक स्तर पर संपर्क भी साधा है। हालांकि, राज्य सरकार की ओर से अभी तक इस प्रस्ताव पर कोई आधिकारिक और ठोस प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। यदि यह प्रोजेक्ट सिरे चढ़ता है, तो लगभग दो दशकों के लंबे अंतराल के बाद पश्चिम बंगाल के ऑटोमोबाइल इकोसिस्टम में एक बार फिर से किसी बड़े निवेश की वापसी हो सकती है।
टाटा नैनो के बाद पश्चिम बंगाल में ऑटो सेक्टर की सुस्ती
पश्चिम बंगाल के औद्योगिक इतिहास में ऑटोमोबाइल सेक्टर का एक अलग अध्याय रहा है। साल 2008 में टाटा मोटर्स के चर्चित नैनो प्रोजेक्ट के सिंगूर से बाहर चले जाने के बाद से राज्य में ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को कोई बहुत बड़ा निवेश या बूस्ट नहीं मिल पाया था। हालांकि, सीकेए बिरला ग्रुप ऑटोमोटिव कंपोनेंट इंडस्ट्री के जरिए इस क्षेत्र में अब भी सक्रिय रूप से बना हुआ है, लेकिन बड़े पैमाने पर गाड़ियों का उत्पादन लंबे समय से ठप पड़ा है।
ऑटो एक्सपर्ट्स का मानना है कि यदि हिंदुस्तान मोटर्स उत्तरपारा प्लांट में इलेक्ट्रिक वाहनों का उत्पादन शुरू करती है, तो यह किसी विदेशी यानी यूरोपियन या अमेरिकन ऑटोमोबाइल कंपनी के साथ जॉइंट वेंचर (Joint Venture) के रूप में हो सकता है। अकेले दम पर इस पैमाने पर खड़े होना मौजूदा प्रतिस्पर्धी बाजार में किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं होगा। यही वजह है कि कंपनी ग्लोबल प्लेयर्स के साथ मिलकर इस दिशा में आगे बढ़ने की रणनीति पर विचार कर रही है।
कानूनी अड़चन: क्या अब भी 'एंबेसडर' नाम का इस्तेमाल कर सकती है कंपनी?
यह सबसे बड़ा और अहम सवाल है जिस पर हर किसी की नजर टिकी है। क्या कंपनी अपनी उस पुरानी कार को 'एंबेसडर' नाम से ही बाजार में उतार पाएगी? इसका जवाब 'ना' है। रिपोर्ट्स के अनुसार, हिंदुस्तान मोटर्स सीधे तौर पर इस नाम का उपयोग नहीं कर सकती है। इसकी बड़ी वजह यह है कि साल 2017 में कंपनी ने 'एंबेसडर' ब्रांड का ट्रेडमार्क लगभग 80 करोड़ रुपये में फ्रांस की दिग्गज ऑटो कंपनी प्यूजो (Peugeot SA) ग्रुप को बेच दिया था।
चूंकि ट्रेडमार्क अब प्यूजो के पास सुरक्षित है, इसलिए हिंदुस्तान मोटर्स के लिए अपनी आगामी कार का नाम एंबेसडर रखना कानूनी रूप से संभव नहीं होगा। सोशल मीडिया पर इन दिनों एंबेसडर ईवी के कई काल्पनिक डिजाइन और रेंडर खूब वायरल हो रहे हैं, जिन्हें देखकर लोग धोखा खा रहे हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि यदि कंपनी भविष्य में कोई नई कार लॉन्च करती भी है, तो उसका नाम एंबेसडर नहीं होगा, बल्कि उसे किसी नए ब्रांड नेम या ट्रेडमार्क के तहत ही उतारा जाएगा।
पहले भी मिल चुके हैं ऐसे संकेत, लेकिन क्यों लटक गए थे मामले?
यह पहला मौका नहीं है जब हिंदुस्तान मोटर्स के पुनरुत्थान को लेकर बाजार में इस तरह की अटकलें लगाई गई हों। इससे पहले भी कई बार ऐसी खबरें आ चुकी हैं कि कंपनी अपनी पुरानी साख को वापस लाने के लिए किसी विदेशी साझीदार के साथ मिलकर काम करने जा रही है। कुछ साल पहले एक यूरोपियन कंपनी के साथ मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग (MoU) यानी सहमति पत्र पर हस्ताक्षर भी किए गए थे।
लेकिन तमाम औपचारिकताओं के पूरा न होने और उत्तरपारा प्लांट में नए सिरे से प्रोडक्शन शुरू करने के लिए जरूरी सरकारी व प्रशासनिक मंजूरियां न मिलने के कारण वह मामला धीरे-धीरे ठंडे बस्ते में चला गया। आज की तारीख में भी कंपनी की तरफ से आधिकारिक तौर पर कोई बहुत बड़ा और ठोस निवेश प्लान जनता के सामने नहीं रखा गया है।
ऑटोमोबाइल बाजार की चुनौतियां और भविष्य की राह
आज का पैसेंजर व्हीकल मार्केट साल 2010 से पहले के दौर की तुलना में पूरी तरह बदल चुका है। आज बाजार में टाटा, महिंद्रा, हुंडई, मारुति सुजुकी और टेस्ला जैसी कंपनियां आधुनिक तकनीक, सुरक्षा मानकों और शानदार फीचर्स के साथ अपनी पकड़ मजबूत किए हुए हैं। ऐसे में किसी पुरानी ब्रांड वैल्यू के सहारे बिना मजबूत प्रोडक्ट लाइनअप के मार्केट में टिक पाना बेहद कठिन है।
"ऑटोमोबाइल बाजार में सिर्फ पुरानी यादों के सहारे टिके रहना नामुमकिन है। आज ग्राहकों को बेहतरीन ड्राइविंग अनुभव, आधुनिक फीचर्स, चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर और किफायती दाम चाहिए। अगर हिंदुस्तान मोटर्स वापसी करती भी है, तो उसे पूरी तरह से री-इन्वेंट होना पड़ेगा।"— सीनियर ऑटोमोबाइल एक्सपर्ट
कुल मिलाकर, भले ही हिंदुस्तान मोटर्स के इलेक्ट्रिक वाहनों के जरिए वापसी की खबरें रोमांचक लग रही हों, लेकिन हकीकत यही है कि यह अभी शुरुआती चर्चाओं और रणनीतिक स्तर की बैठकों से आगे नहीं बढ़ पाई है। निवेशकों और कार प्रेमियों को अभी इस दिशा में किसी भी ठोस घोषणा का लंबा इंतजार करना पड़ सकता है।







