नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — दुनिया के नक्शे पर कई ऐसे देश हैं जिनकी आर्थिक सेहत पूरी तरह से अमेरिका के बाजार पर टिकी हुई है। हाल ही में सामने आए वैश्विक व्यापार के आंकड़े इस बात की तस्दीक करते हैं कि मेक्सिको, वियतनाम और कनाडा जैसे देशों की बड़ी दुकानें और फैक्ट्रियां अमेरिकी भरोसे चल रही हैं। जब अमेरिका में मांग बढ़ती है, तो इन देशों का निर्यात भी तेजी से ऊपर चढ़ जाता है। इसके विपरीत, यदि अमेरिकी अर्थव्यवस्था में जरा भी सुस्ती आती है, तो इन देशों के कारोबार पर सीधा असर पड़ता है।
इन वैश्विक व्यापारिक समीकरणों के बीच भारत अपनी स्वतंत्र और स्पष्ट नीतियों के जरिए आगे बढ़ रहा है। हाल ही में मुक्त व्यापार समझौतों यानी एफटीए को लेकर केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने भारत का रुख एकदम साफ कर दिया है। भारत सरकार का सीधा फॉर्मूला यह है कि व्यापार समझौतों में हमारी संवेदनशीलता का पूरा सम्मान होना चाहिए। भारत अन्य देशों के साथ व्यापार करने को तैयार है, लेकिन वह अपने स्थानीय उद्योगों और किसानों के हितों से कोई समझौता नहीं करेगा। यह रुख वैश्विक मंच पर भारत की बढ़ती हुई आर्थिक ताकत को दिखाता है।
वैश्विक व्यापार में अमेरिका की केंद्रीय भूमिका
आंकड़ों पर गौर करें तो मेक्सिको और कनाडा का सबसे बड़ा व्यापारिक साझीदार अमेरिका ही है। इन दोनों देशों का कुल निर्यात का एक बहुत बड़ा हिस्सा अकेले अमेरिकी बाजार में खप जाता है। वाहन निर्माण से लेकर इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों तक, हर क्षेत्र में ये देश अमेरिकी उपभोक्ताओं पर निर्भर हैं। एशियाई देश वियतनाम ने भी पिछले कुछ सालों में अपनी विनिर्माण क्षमता को बढ़ाया है, लेकिन उसकी इस सफलता के पीछे भी अमेरिकी बाजार की बड़ी मांग का ही हाथ है। अमेरिका की नीतियां तय करती हैं कि इन देशों में फैक्ट्रियों की रफ्तार धीमी होगी या तेज।
दूसरी ओर, दुनिया के दूसरे हिस्सों में आर्थिक और भू-राजनीतिक उथल-पुथल लगातार जारी है। पश्चिम एशिया में ईरान और अमेरिका के बीच समझौतों और शर्तों को लेकर नई चर्चाएं गर्म हैं। दुनिया भर के देश अपनी रणनीतिक स्थिति को मजबूत करने के लिए कूटनीतिक चालें चल रहे हैं। इसी कड़ी में अर्थशास्त्र के क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर हो रहे नए शोध और बदलाव भी चर्चा में हैं, जहां अर्थशास्त्रियों के नए सिद्धांतों से वैश्विक मंदी और महंगाई को समझने में मदद मिल रही है।
कारपोरेट जगत और शेयर बाजार के नए समीकरण
वैश्विक बाजार के साथ-साथ घरेलू स्तर पर भी बड़े आर्थिक फेरबदल देखने को मिल रहे हैं। देश के कारपोरेट जगत में रिलायंस इंडस्ट्रीज से जुड़े जियो आईपीओ की चर्चाएं जोरों पर हैं। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि इस कदम से जियो देश की दूसरी सबसे मूल्यवान कंपनी बन जाएगी और मुकेश अंबानी के व्यापारिक साम्राज्य को और मजबूती मिलेगी। एक तरफ जहां वैश्विक बाजार अमेरिका के इशारे पर सांस ले रहा है, वहीं दूसरी तरफ भारतीय कॉरपोरेट सेक्टर अपनी घरेलू ताकत के दम पर नए मुकाम हासिल कर रहा है।
आम आदमी और छोटे कारोबारियों के लिए यह समय बहुत कुछ सीखने और समझने का है। वैश्विक बाजारों में होने वाले उतार-चढ़ाव का सीधा असर कच्चे तेल की कीमतों, आयातित सामान और घरेलू महंगाई पर पड़ता है। भारत जैसे विकासशील देश के लिए जरूरी है कि वह बाहरी झटकों से अपनी अर्थव्यवस्था को बचाकर रखे। सरकार की नीतियां इस बात पर जोर दे रही हैं कि देश आत्मनिर्भर बने ताकि वैश्विक अनिश्चितताओं का घरेलू बाजार पर कम से कम असर पड़े।
स्वतंत्र आर्थिक नीतियों की ओर बढ़ता भारत
अंत में यह साफ हो जाता है कि दुनिया के कई देश भले ही अमेरिकी बाजार की बैसाखियों पर टिके हों, लेकिन भारत जैसी बड़ी अर्थव्यवस्थाएं अपने दम पर फैसले ले रही हैं। भारत का रुख साफ है कि अंतरराष्ट्रीय समझौते आपसी सम्मान और बराबरी के स्तर पर होने चाहिए। आने वाले दिनों में वैश्विक व्यापार के ये आंकड़े और समझौते तय करेंगे कि दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं का रुख किस दिशा में जाएगा। 'द फ्रीलान्स' की यह पड़ताल बताती है कि आने वाला समय आर्थिक कूटनीति और आत्मनिर्भरता का ही रहने वाला है।









