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अमिताभ बच्चन की फिल्म 'बागबान' के लिए क्यों करना पड़ा था 20 साल लंबा इंतजार, दिलचस्प है किस्सा

हिंदी सिनेमा की क्लासिक फिल्म 'बागबान' को बड़े पर्दे पर आने के लिए दो दशक का लंबा इंतजार करना पड़ा था। इस फिल्म की कहानी मूल रूप से दिग्गज अभिनेता दिलीप कुमार के लिए लिखी गई थी, लेकिन बात न बनने के बाद जब यह अमिताभ बच्चन के पास आई तो इसने इतिहास रच दिया।
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नेशनल डेस्क, द फ्रीलांस
राष्ट्रीय संपादकीय ब्यूरो•4 अक्टूबर 2026 • अपडेटेड•30
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अमिताभ बच्चन की फिल्म 'बागबान' के लिए क्यों करना पड़ा था 20 साल लंबा इंतजार, दिलचस्प है किस्सा
📷 अमिताभ बच्चन की फिल्म 'बागबान' के लिए क्यों करना पड़ा था 20 साल लंबा इंतजार, दिलचस्प है किस्सा — मुख्य घटनाक्रमफोटो साभार: रॉयटर्स / एजेंसीज़ / सोशल मीडिया

खबर की बड़ी बातें (Key Highlights)

  • दिग्गज निर्देशक बीआर चोपड़ा ने 1980 के दशक में फिल्म 'बागबान' की पटकथा तैयार की थी।
  • यह फिल्म शुरू में ट्रेजेडी किंग दिलीप कुमार को ध्यान में रखकर लिखी गई थी, लेकिन कुछ कारणों से बात आगे नहीं बढ़ पाई।
  • करीब 20 साल बाद जब यह प्रोजेक्ट अमिताभ बच्चन और हेमा मालिनी के पास आया, तब जाकर यह बड़े पर्दे पर उतरी।
  • रिलीज के बाद इस पारिवारिक ड्रामे ने बॉक्स ऑफिस पर सफलता के नए रिकॉर्ड बनाए और दर्शकों के दिलों को छू लिया।

दिलीप कुमार के नाम से बुनी गई थी 'बागबान' की नींव

हिंदी सिनेमा के इतिहास में कुछ ऐसी फिल्में दर्ज हैं, जिनका सफर आसान नहीं रहा। इन फिल्मों को सिनेमाघरों तक पहुंचने के लिए कड़ा संघर्ष करना पड़ा और कई बार तो मुख्य कलाकारों के बदलाव के बाद ही इन्हें नया जीवन मिल सका। ऐसी ही एक सदाबहार और भावुक फिल्म का नाम है 'बागबान'। आज भले ही इस फिल्म का जिक्र आते ही सदी के महानायक अमिताभ बच्चन और ड्रीम गर्ल हेमा मालिनी की जोड़ी जेहन में आती है, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि इस प्रोजेक्ट की मूल परिकल्पना किसी और अभिनेता के लिए की गई थी।

अस्सी के दशक का दौर हिंदी सिनेमा में बदलाव का गवाह बन रहा था। उस वक्त पर्दे पर अभिनय के मानक तय करने वाले दिलीप कुमार का दबदबा था। अपनी गंभीर अदायगी और भावुक दृश्यों में जान फूंकने की क्षमता के कारण उन्हें 'ट्रेजेडी किंग' कहा जाता था। इंडस्ट्री के दिग्गज फिल्मकार बीआर चोपड़ा एक ऐसा पारिवारिक ड्रामा बनाना चाहते थे, जो माता-पिता और बच्चों के बीच के जटिल रिश्तों और पीढ़ी के अंतर को गहराई से बयां कर सके। इस मजबूत कहानी का ताना-बाना उन्होंने खास तौर पर दिलीप कुमार के अभिनय कौशल को ध्यान में रखकर ही बुना था।

बीआर चोपड़ा और दिलीप कुमार के बीच आपसी तालमेल भी बेहतरीन था। निर्देशक चाहते थे कि इस सामाजिक विषय पर आधारित फिल्म में मुख्य भूमिका वही निभाएं, क्योंकि उम्र के उस पड़ाव पर उनका ठहराव और अनुभव इस किरदार के साथ पूरी तरह न्याय कर सकता था। हालांकि, किस्मत को कुछ और ही मंजूर था और योजनाएं कागजों से आगे बढ़कर धरातल पर नहीं उतर पा रही थीं।

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दो दशक तक क्यों ठंडे बस्ते में पड़ी रही फिल्म की कहानी

किसी भी फिल्म निर्माण में पटकथा और कलाकारों का चयन सबसे अहम होता है। 'बागबान' की पटकथा तो तैयार हो चुकी थी, लेकिन वक्त के साथ हालात बदलते चले गए। नब्बे का दशक आते-आते फिल्म इंडस्ट्री का मिजाज बदलने लगा। एक्शन और नए जॉनर की फिल्में बॉक्स ऑफिस पर हावी होने लगीं। ऐसे में इस तरह के भारी-भरकम पारिवारिक और संवेदनात्मक ड्रामे के लिए निर्माताओं को सही समय और सही बजट का इंतजार करना पड़ रहा था।

दिन, महीने और साल गुजरते गए। दो दशक का लंबा समय बीत चुका था। इस दौरान हिंदी सिनेमा की पीढ़ी पूरी तरह बदल चुकी थी। जो दर्शक अस्सी के दौर में युवा थे, वे अब परिवार वाले बन चुके थे। सामाजिक ताने-बाने में भी बदलाव आ रहा था। इसके बावजूद, इस कहानी की प्रासंगिकता कम नहीं हुई थी। बीआर चोपड़ा के परिवार और उनकी टीम इस बात को लेकर आश्वस्त थी कि यह विषय आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना दो दशक पहले था, बस जरूरत थी एक ऐसे कलाकार की जो इस भारी-भरकम किरदार के साथ पूरा न्याय कर सके।

तभी इस प्रोजेक्ट की कमान बीआर चोपड़ा के बेटे रवि चोपड़ा ने संभाली। उन्होंने इस पुरानी स्क्रिप्ट को फिर से खंगाला और समय के हिसाब से इसमें कुछ जरूरी बदलाव किए। अब सवाल यह था कि उस दौर में कौन सा अभिनेता बुजुर्ग माता-पिता के दर्द और आत्मसम्मान की इस लड़ाई को पर्दे पर जीवंत कर सकता था।

अमिताभ बच्चन के जुड़ते ही बदल गई तस्वीर

जब साल 2000 के शुरुआती दौर में इस फिल्म पर दोबारा काम शुरू हुआ, तो निर्माताओं की नजरें अमिताभ बच्चन पर टिकीं। उस समय अमिताभ बच्चन अपने करियर के एक नए और परिपक्व दौर से गुजर रहे थे। छोटे पर्दे पर 'कौ बनेगा करोड़पति' की सफलता और फिल्मों में चरित्र भूमिकाओं के जरिए उन्होंने दर्शकों के दिलों में फिर से एक खास जगह बना ली थी। जब यह कहानी अमिताभ बच्चन को सुनाई गई, तो उन्होंने बिना देर किए इसके लिए हामी भर दी।

फिल्म में उनके साथ हेमा मालिनी को मुख्य अभिनेत्री के रूप में चुना गया। दोनों कलाकारों की ऑन-स्क्रीन केमिस्ट्री और उनके अभिनय के परिपक्व अंदाज ने फिल्म की पटकथा में जान फूंक दी। बुजुर्ग माता-पिता के रूप में उनके संघर्ष और बच्चों की बेरुखी की कहानी ने हर देखने वाले की आंखें नम कर दीं।

"सिनेमा समाज का आईना होता है और कुछ कहानियां ऐसी होती हैं जो सीधे दिल पर असर करती हैं। 'बागबान' जैसी फिल्म पीढ़ियों के बीच के उस संवादहीनता को उजागर करती है, जिससे हर घर का कोई न कोई सदस्य कभी न कभी रूबरू होता है।" — रवि चोपड़ा, निर्देशक

रिलीज के बाद बॉक्स ऑफिस पर रचा इतिहास

साल 2003 में जब 'बागबान' सिनेमाघरों में रिलीज हुई, तो शुरुआत में इसे लेकर बहुत ज्यादा चर्चा नहीं थी। लेकिन माउथ पब्लिसिटी यानी दर्शकों की जुबानी प्रचार ने इस फिल्म को बॉक्स ऑफिस पर एक लंबी रेس का घोड़ा बना दिया। जिन लोगों ने इसे देखा, उन्होंने अपने माता-पिता के प्रति अपने नजरिए पर विचार किया। फिल्म के गाने, इसके संवाद और विशेष रूप से क्लाइमैक्स का वह दृश्य जहां अमिताभ बच्चन अपनी बात रखते हैं, आज भी लोगों को याद है।

दो दशक तक फाइलों में बंद रहने वाली और कई उतार-चढ़ाव देखने वाली यह फिल्म आखिरकार ब्लॉकबस्टर साबित हुई। इसने साबित कर दिया कि अच्छी कहानी और मजबूत अभिनय कभी पुराने नहीं होते। आज भले ही दिलीप कुमार इस फिल्म का हिस्सा नहीं बन पाए, लेकिन अमिताभ बच्चन ने इस किरदार को अमर कर दिया और भारतीय सिनेमा के इतिहास में इसे एक मील का पत्थर बना दिया।

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