मुंबई हमले के जख्म और न्याय की लंबी कानूनी लड़ाई
देश की आर्थिक राजधानी मुंबई पर 26 नवंबर 2008 को हुए कायराना आतंकी हमले के घाव आज भी देशवासियों के जेहन में ताजा हैं। इस खौफनाक वारदात को अंजाम देने वाले आतंकवादियों में से एकमात्र जिंदा पकड़ा गया अजमल आमिर कसाब देश और दुनिया की नजरों में खूंखार चेहरा बन चुका था। हालांकि, उसे उसके किए की सजा के तौर पर फांसी के फंदे तक पहुंचाने में पूरे चार साल का लंबा समय लगा। इस देरी को लेकर अक्सर यह सवाल उठाया जाता है कि आखिर एक खूंखार और रंगे हाथों पकड़े गए आतंकी को सजा मिलने में इतनी लंबी प्रक्रिया क्यों अपनाई गई?
इसी सवाल का जवाब देने के लिए देश के जाने-माने विशेष अभियोजक उज्जवल निकम ने हाल ही में एक लोकप्रिय टेलीविजन शो में शिरकत की। इस कार्यक्रम में महानायक अमिताभ बच्चन भी मौजूद थे। बातचीत के दौरान कसाब के मुकदमे से जुड़े कई ऐसे अनसुने और हैरान करने वाले किस्से सामने आए, जिनके बारे में आम लोग शायद ही कभी जानते होंगे। उज्जवल निकम ने बताया कि भारतीय संविधान और कानून की मजबूती ही थी कि हर पैंतरे के बावजूद अंततः न्याय की ही जीत हुई।
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अदालत के कटघरे में कसाब की अजीबोगरीब चालें
उज्जवल निकम ने उस दौर को याद करते हुए साझा किया कि जब अजमल कसाब को पहली बार अदालत के सामने पेश किया गया था, तो उनका मुख्य उद्देश्य एक वकील के तौर पर उसकी बॉडी लैंग्वेज और मनोविज्ञान को समझना था। हर अपराधी की तरह कसाब भी जांच एजेंसियों और अदालत को गुमराह करने के लिए अलग-अलग हथकंडे अपना रहा था। वह कभी खुद को इस घटना से पूरी तरह बेकसूर बताता तो कभी अपनी उम्र को लेकर झूठे दावे पेश करता था ताकि कानूनी पेंच में मामला उलझ जाए।
न्यायालय की कार्यवाही के दौरान कसाब ने अजीबोगरीब बयान देने शुरू कर दिए थे। शुरुआत में उसने यह तक कह दिया कि वह 26 नवंबर के हमले वाले दिन उस जगह पर मौजूद ही नहीं था, बल्कि उसे किसी और तारीख को जुहू चौपाटी से पकड़ा गया था। कानूनी जानकारों के मुताबिक, आतंकवादियों को यह बाकायदा ट्रेनिंग दी जाती है कि अगर वे कभी पकड़े जाएं तो जांच अधिकारियों को किस तरह से भ्रमित करना है और कोर्ट में कौन सी कहानियां गढ़नी हैं ताकि सुनवाई लंबी खिंच सके।
जब कसाब ने अमिताभ बच्चन का नाम लेकर चौंकाया
सुनवाई के दौरान कसाब ने एक ऐसा दावा किया जिसने अदालत में मौजूद हर शख्स को हैरान कर दिया। उज्जवल निकम ने बताया कि कसाब ने कोर्ट में तंज कसते हुए कहा था कि वह तो सिर्फ बॉलीवुड अभिनेता अमिताभ बच्चन को देखने के लिए मुंबई आया था, और उसका इस हमले से कोई लेना-देना नहीं है। इस अजीब और बेतुके बयान पर शो में बैठे महानायक अमिताभ बच्चन ने तुरंत और बेहद आक्रामक प्रतिक्रिया दी।
बिग बी ने गुस्से भरे अंदाज में कहा कि अगर वो वाकई उनके पास आता, तो उसे वहां से जिंदा वापस जाने का मौका नहीं मिलता।
"नहीं-नहीं, सर अगर वो आया होगा तो वो हमारे घर से जाने वाला नहीं था। वहीं हम गोली मार देता उसे।" — अमिताभ बच्चन, अभिनेता
इस प्रतिक्रिया से साफ जाहिर होता है कि देश के आम नागरिकों की तरह ही फिल्मी हस्तियों के मन में भी उस हमले के प्रति कितना आक्रोश और गुस्सा भरा हुआ था। हालांकि, एक लोकतांत्रिक देश में न्याय की प्रक्रिया व्यक्तिगत भावनाओं से ऊपर उठकर चलती है।
कानून के दायरे और सबूतों की पक्की दीवार
कसाब और उसके बचाव पक्ष के वकीलों ने अदालती प्रक्रिया को लंबा खींचने के लिए हर मुमकिन कोशिश की थी। उसने यहां तक दावा किया कि वह नाबालिग है और उसके खिलाफ मुकदमा नहीं चलाया जा सकता। इसके अलावा उसने अपने एक साथी पर सारा इल्जाम मढ़ने की कोशिश भी की। लेकिन उज्जवल निकम और उनकी लीगल टीम ने पुख्ता सबूतों, सीसीटीवी फुटेज और अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी संगठनों की सूचियों को अदालत में पेश कर उसके हर झूठ का पर्दाफाश कर दिया। जब मासूमों पर गोली चलाते हुए कसाब की तस्वीरें सीसीटीवी में दिखाई गईं, तब भी उसके चेहरे पर कोई पछतावा नहीं बल्कि अजीब सी हंसी थी।
भारतीय न्याय प्रणाली की यही खूबी रही है कि दोष साबित होने तक हर अपराधी को अपना पक्ष रखने का पूरा अधिकार मिलता है। पाकिस्तान की तरफ से भी इस मामले में कोई सहयोग नहीं मिल रहा था, इसके बावजूद भारतीय कानून और अभियोजन पक्ष की मजबूती ने यह साबित कर दिया कि रूल ऑफ लॉ से बढ़कर कुछ नहीं है। चारों साल चली लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद आखिरकार कसाब को उसके अंजाम तक पहुंचाया गया, जो देश के लोकतंत्र और संविधान की बड़ी जीत थी।







