वैश्विक अर्थव्यवस्था पर मंडरा रहा बड़ा कर्ज का संकट
दुनियाभर के बाजारों और अर्थव्यवस्थाओं के लिए एक बहुत बड़ी चेतावनी सामने आई है। धरती पर इंसानी आबादी जिस तेजी से बढ़ रही है, उससे भी कहीं ज्यादा रफ्तार से देशों और कंपनियों पर वित्तीय देनदारियों का बोझ बढ़ता जा रहा है। प्रतिष्ठित वित्तीय कमेंट्री प्लेटफॉर्म 'द कोबेसी लेटर' ने इंस्टीट्यूट ऑफ इंटरनेशनल फाइनेंस (IIF) के बिल्कुल ताजा आंकड़ों के हवाले से एक डरावनी तस्वीर पेश की है। इसके मुताबिक, दुनिया भर का कुल कर्ज अब आसमान छूते हुए 365 ट्रिलियन डॉलर के आंकड़े तक पहुंच चुका है।
आर्थिक विश्लेषकों का मानना है कि यह स्थिति किसी भी सामान्य मंदी से कहीं अधिक खतरनाक साबित हो सकती है। पिछले कुछ वर्षों के दौरान दुनिया के वित्तीय ताने-बाने में जिस तरह का बदलाव आया है, उसने सरकारों की नींद उड़ा दी है। हालात यह हैं कि अब केवल मूल कर्ज का आंकड़ा ही नहीं डरा रहा, बल्कि उस कर्ज के एवज में चुकाया जाने वाला भारी-भरकम ब्याज भी वैश्विक अर्थव्यवस्था की जड़ों को खोखला कर रहा है।
विशेषज्ञों का कहना है कि अगर इस बेकाबू रफ्तार पर लगाम नहीं कसी गई, तो आने वाले दिनों में कई विकासशील और उभरते हुए देश गंभीर वित्तीय बदहाली का शिकार हो सकते हैं। सरकारों द्वारा लगातार लिए जा रहे ऋण ने पूरी वैश्विक वित्तीय व्यवस्था को एक अदृश्य चक्रव्यूह में उलझा दिया है, जिससे बाहर निकलना आसान नहीं होगा।
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महज छह महीनों में दर्ज हुआ 10 ट्रिलियन डॉलर का बड़ा उछाल
आर्थिक मोर्चे पर आई इस ताजा रिपोर्ट के अनुसार, कर्ज के आंकड़े में यह विस्फोटक वृद्धि बेहद कम समय में देखने को मिली है। साल 2026 की पहली छमाही के आते-आते वैश्विक ऋण अपने सबसे उच्चतम स्तर पर जा पहुंचा है। चौंकाने वाली बात यह है कि केवल छह महीनों के छोटे से अंतराल में ही कुल वैश्विक कर्ज में 10 ट्रिलियन डॉलर से ज्यादा की भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
अगर थोड़ा पीछे मुड़कर देखें तो वित्त वर्ष 2018 के दौरान दुनिया का कुल कर्ज लगभग 250 ट्रिलियन डॉलर के आसपास सिमटा हुआ था। लेकिन उसके बाद से इसमें लगातार रिकॉर्ड तोड़ तेजी आती चली गई। कोरोना महामारी के दौर में सरकारों ने राहत पैकेजों और सार्वजनिक खर्चों के नाम पर अंधाधुंध उधार लिया, जो सिलसिला महामारी के बाद भी थामने का नाम नहीं ले रहा है।
इस निरंतर बढ़ोतरी ने यह साबित कर दिया है कि दुनिया के तमाम देश अपनी बुनियादी जरूरतों और राजकोषीय घाटे को पाटने के लिए पूरी तरह से कर्ज के पहिए पर निर्भर हो चुके हैं। जब तक यह चक्र थमेगा नहीं, तब तक वैश्विक अर्थव्यवस्था को स्थिरता मिलना लगभग नामुमकिन सा नजर आता है।
उभरते बाजारों और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं की बढ़ी मुश्किलें
इस पूरे वित्तीय संकट के केंद्र में सबसे ज्यादा उभरते हुए बाजार और विकासशील देश नजर आ रहे हैं। कोबेसी लेटर की रिपोर्ट बताती है कि उभरती अर्थव्यवस्थाओं का कुल कर्ज अकेले 2026 की पहली छमाही में 6.5 ट्रिलियन डॉलर बढ़कर रिकॉर्ड 110 ट्रिलियन डॉलर के आंकड़े को छू चुका है। इसमें सबसे बड़ा योगदान विभिन्न सरकारों और गैर-वित्तीय कंपनियों का रहा है, जिन्होंने धड़ल्ले से बाजार से उधार उठाया है।
खास तौर पर चीन को छोड़कर अन्य उभरते बाजारों और विकासशील देशों का कुल ऋण लगभग 38 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच गया है। यह इस बात का साफ प्रमाण है कि विकसित देशों के बाहर भी पैसों की जरूरतें और वित्तीय दबाव कितनी तेजी से फैल रहा है। इन देशों की सबसे बड़ी समस्या यह है कि वे अपने बुनियादी ढांचे और लोक कल्याणकारी योजनाओं को चलाने के लिए लगातार विदेशी और घरेलू ऋण पर आश्रित होते जा रहे हैं।
"उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए यह कर्ज का जाल तब और भी अधिक घातक साबित हो सकता है जब उधारी विदेशी मुद्राओं में ली गई हो। स्थानीय मुद्रा के कमजोर होते ही डॉलर या यूरो में चुकाए जाने वाले कर्ज का बोझ कई गुना बढ़ जाता है।" — वित्तीय बाजार विशेषज्ञ
कर्ज चुकाने में लगने वाला ब्याज बना सरकारों के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द
मौजूदा वित्तीय संकट का सबसे चिंताजनक पहलू केवल कुल कर्ज की भारी-भरकम राशि नहीं है, बल्कि उस कर्ज पर चुकाई जाने वाली भारी-भरकम ब्याज की रकम है। रिपोर्ट के अनुसार, विकसित अर्थव्यवस्थाओं ने पिछले साल केवल सरकारी ऋण पर 3.3 ट्रिलियन डॉलर से अधिक की रकम केवल ब्याज के रूप में चुका डाली है। यह आंकड़ा दुनिया भर के कई बड़े क्षेत्रों में होने वाले कुल खर्च से भी कहीं ज्यादा बड़ा है।
तुलना करें तो दुनिया भर में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) पर होने वाला कुल खर्च लगभग 2.6 ट्रिलियन डॉलर, रक्षा और सैन्य साजो-सामान पर 3.1 ट्रिलियन डॉलर और क्लीन एनर्जी पर 2.3 ट्रिलियन डॉलर है। यानी इन सभी बेहद अहम सेक्टरों के कुल बजट को पीछे छोड़ते हुए केवल ब्याज चुकाने का खर्च शीर्ष पर पहुंच चुका है। जी-7 देशों के वार्षिक सरकारी ब्याज भुगतान में साल-दर-साल आधार पर करीब 85 प्रतिशत की अभूतपूर्व वृद्धि दर्ज की गई है।
इस भयानक स्थिति का सीधा असर आम नागरिकों की जेब और सरकारी नीतियों पर पड़ रहा है। जब सरकारों की कमाई का एक बहुत बड़ा हिस्सा केवल पुराने कर्ज का ब्याज चुकाने में ही खर्च हो जाएगा, तो देश के विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचे के लिए खजाने में कुछ नहीं बचेगा।
घटता ऋण-से-जीडीपी अनुपात क्या किसी बड़े भ्रम का हिस्सा है?
एक तरफ जहां वैश्विक कर्ज का आंकड़ा लगातार नए रिकॉर्ड बना रहा है, वहीं दूसरी तरफ एक दिलचस्प तकनीकी पहलू भी सामने आया है। वैश्विक ऋण-से-जीडीपी अनुपात (Global Debt-to-GDP Ratio) महामारी के अपने चरम स्तर से कुछ नीचे आया है। हालांकि, विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि यह सुधार केवल कागजी है और इसके पीछे एक बड़ा आर्थिक भ्रम छुपा हुआ है।
वास्तव में, इस अनुपात में दिखने वाली गिरावट का कारण वैश्विक स्तर पर आई तेज महंगाई है, न कि दुनिया भर के देशों द्वारा अपने कर्ज को सफलतापूर्वक चुका देना। जब बाजार में चीजों की कीमतें बढ़ती हैं, तो नॉमिनल जीडीपी का आंकड़ा ऊपर उठ जाता है, भले ही वस्तुओं और सेवाओं का वास्तविक उत्पादन उसी अनुपात में न बढ़ा हो। इससे ऋण-से-जीडीपी का अनुपात आंकड़ों में थोड़ा कम और संभला हुआ नजर जरूर आता है।
कोबेसी लेटर के मुताबिक, मौजूदा समय में वैश्विक जीडीपी का लगभग 310 प्रतिशत हिस्सा ऋण भार के बराबर है, जो कि अभी भी बेहद खतरनाक स्तर पर है। इसका मतलब साफ है कि दुनिया कर्ज मुक्त नहीं हुई है, बल्कि महंगाई के पर्दले के पीछे भारी-भरकम उधारी अब भी जस की तस बरकरार है।
निष्कर्ष और आगे की राह
वैश्विक अर्थव्यवस्था आज एक ऐसे दोराहें पर खड़ी है जहां से आगे का रास्ता बेहद कठिन और चुनौतियों से भरा हुआ दिखाई देता है। 365 ट्रिलियन डॉलर का यह विशालकाय कर्ज केवल एक वित्तीय आंकड़ा नहीं है, बल्कि यह आने वाले समय के आर्थिक तूफानों की एक स्पष्ट चेतावनी है। सरकारों और नीति निर्माताओं को अब अपनी राजकोषीय नीतियों में बड़े बदलाव करने होंगे ताकि इस बढ़ते वित्तीय बोझ से निपटा जा सके।
यदि समय रहते अंधाधुंध उधारी और बेकाबू खर्चों पर नियंत्रण नहीं पाया गया, तो दुनिया भर के बाजारों में एक ऐसी मंदी दस्तक दे सकती है जिससे उबरना किसी भी देश के लिए आसान नहीं होगा। आम जनता से लेकर वैश्विक महाशक्तियों तक, सभी को इस बढ़ते हुए कर्ज के जाल के दूरगामी परिणामों के प्रति सतर्क होने की सख्त जरूरत है।








