नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — देश के चार राज्यों की चुनिंदा विधानसभा सीटों पर उपचुनाव के लिए मतदान की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है। इस बार के चुनावी रण में पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु और पुडुचेरी के मतदाता शामिल रहे, जहां सुबह से ही पोलिंग बूथों पर लोगों की लंबी कतारें नजर आईं। चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक मदुरंतकम सीट पर सबसे ज्यादा तिरासी फीसदी से अधिक वोटिंग दर्ज की गई, जबकि कुछ अन्य बूथों पर मतदान का प्रतिशत कम भी रहा। इस पूरी चुनावी प्रक्रिया के दौरान सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए थे ताकि किसी भी अप्रिय घटना से निपटा जा सके।
सबसे ज्यादा हलचल पश्चिम बंगाल के चुनावी मैदान में देखने को मिली जहां नंदीग्राम से लेकर नगांव तक कई जगहों पर राजनीतिक दलों के बीच तीखी तकरार हुई। रेजीनगर विधानसभा सीट पर वोटिंग के दौरान अचानक भारी तनाव फैल गया जब पुलिस ने स्थानीय नेता हुमायूं कबीर को हिरासत में ले लिया और अपने साथ उठा कर ले गई। इस गिरफ्तारी के बाद इलाके में सियासी पारा अचानक चढ़ गया और विपक्षी दलों ने प्रशासन पर पक्षपात करने का खुला आरोप लगाया। इन तमाम झड़पों और विरोध प्रदर्शनों के बीच मतदाताओं ने अपने मताधिकार का इस्तेमाल जारी रखा और लोकतंत्र के इस पर्व में अपनी हिस्सेदारी दर्ज कराई।
सोशल मीडिया और लोकल न्यूज पेजों पर डिजिटल पाबंदियों का साया
मतदान के ठीक पहले बंगाल के राजनीतिक गलियारों में एक और बड़ा विवाद खड़ा हो गया जब सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म फेसबुक पर बड़ी कार्रवाई सामने आई। स्वतंत्र मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक मेटा ने पश्चिम बंगाल उपचुनाव के दौरान विपक्ष के चुनाव प्रचार को कवर कर रहे कई लोकल न्यूज पेजों और अकाउंट्स पर अचानक रोक लगा दी। पत्रकारों और डिजिटल रिपोर्टर्स का कहना था कि ऐन चुनाव के वक्त इस तरह के अकाउंट ब्लॉक होने से जनता तक निष्पक्ष खबरें पहुंचने में बड़ी रुकावट आई। विपक्षी दलों ने इसे सत्ताधारी दल की डिजिटल साजिश करार दिया और कहा कि उनकी आवाज को दबाने के लिए यह सब जानबूझकर किया जा रहा है।
दूसरी तरफ असम और तमिलनाडु के मतदान केंद्रों पर भी छिटपुट घटनाओं को छोड़कर स्थिति कुल मिलाकर नियंत्रण में बनी रही। असम की सीटों पर स्थानीय मुद्दों और विकास के वादों को लेकर मतदाताओं में खासा उत्साह देखा गया, जहां युवाओं और बुजुर्गों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। तमिलनाडु की मदुरंतकम सीट पर रिकॉर्ड तोड़ मतदान ने राजनीतिक दलों के माथे पर चिंता और उम्मीद दोनों की लकीरें खींच दी हैं। स्थानीय जानकारों का मानना है कि इतनी भारी वोटिंग किसी बड़े बदलाव या सत्ता विरोधी लहर का स्पष्ट संकेत हो सकती है, जिसका असल सच नौ अक्टूबर को मतगणना के दिन ही बाहर आएगा।
इतिहास के पन्नों से लेकर वर्तमान राजनीतिक समीकरणों की पड़ताल
भारतीय राजनीति में उपचुनावों का यह इतिहास कोई नया नहीं है और अतीत में भी ऐसे कई मौके आए हैं जब छोटे चुनावों ने बड़े सियासी बदलावों की नींव रखी है। साल 2001 के उस दौर को याद करें जब भुज के भयानक भूकंप और उपचुनावों में मिली हार के बाद भारतीय जनता पार्टी के भीतर बड़ा राजनीतिक उथल-पुथल मचा था। उसी मुश्किल हालात के बीच नरेंद्र मोदी ने पहली बार गुजरात के मुख्यमंत्री की कमान संभाली थी और उसके बाद देश की राजनीति की दिशा ही बदल गई थी। आज के इन उपचुनावों को भी कई सियासी पंडित भविष्य के बड़े बदलावों के ट्रेलर के रूप में देख रहे हैं, भले ही इनका दायरा फिलहाल सीमित सीटों तक ही क्यों न हो।
मैदान पर तैनात हमारे संवाददाताओं ने पाया कि इस बार महंगाई, स्थानीय विकास, कानून व्यवस्था और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे आम जनता के जेहन में सबसे ऊपर रहे। वोट डालने आए आम नागरिकों का कहना था कि वे पार्टी या चेहरे से ज्यादा अपने इलाके की बुनियादी जरूरतों को ध्यान में रखकर बटन दबा रहे हैं। प्रशासन ने भी किसी भी गड़बड़ी से बचने के लिए चप्पे-चप्पे पर पैरामिलिट्री फोर्स और स्थानीय पुलिस बल तैनात कर रखा था ताकि मतगणना के दिन तक शांति बनी रहे।
नौ अक्टूबर को आने वाले नतीजों पर टिकी पूरे देश की निगाहें
अब सभी राजनीतिक दलों, उम्मीदवारों और आम जनता की निगाहें सीधे नौ अक्टूबर की तारीख पर टिकी हैं जब इलेक्शन कमीशन ईवीएम खोलेगा और चुनावी नतीजों की घोषणा करेगा। बंगाल की हिंसा से लेकर तमिलनाडु के रिकॉर्ड मतदान तक, हर एक सीट के परिणाम का अपना अलग राजनीतिक महत्व होने वाला है। क्या जनता मौजूदा सत्ताधारी दलों पर अपना भरोसा बरकरार रखेगी या फिर विपक्ष इन उपचुनावों के जरिए कोई बड़ा उलटफेर करने में कामयाब होगा, इसका जवाब आने वाले कुछ ही दिनों में मिल जाएगा। द फ्रीलान्स की टीम इस पूरी मतगणना प्रक्रिया पर अपनी पैनी नजर बनाए रखेगी और हर ताजा अपडेट आप तक सबसे पहले पहुंचाती रहेगी।






