नई दिल्ली/कठुआ: भारतीय सुरक्षा बलों की रीढ़ कहे जाने वाले केंद्रीय अर्धसैनिक बलों (CAPF) में 'सहायक कमांडेंट' (Assistant Commandant) का पद किसी भी युवा अधिकारी के लिए गर्व और जिम्मेदारी का प्रतीक होता है। संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) की कठिन परीक्षा पास कर इस पद तक पहुंचना लाखों युवाओं का सपना होता है। हाल ही में जहां एक तरफ देश के विभिन्न हिस्सों से युवाओं के सीआईएसएफ में असिस्टेंट कमांडेंट बनने पर जश्न और गर्व की खबरें आ रही हैं, वहीं दूसरी ओर कठुआ से लेकर शहीद अंकित पांडेय को दी गई अंतिम विदाई तक की घटनाओं ने इस रैंक से जुड़े मानवीय, प्रशासनिक और सुरक्षात्मक पहलुओं को कटघरे में खड़ा कर दिया है।
कठुआ का खूनी सच: जब अनुशासन और मानसिक तनाव टकराए
जम्मू-कश्मीर के कठुआ जिले से सामने आई हालिया घटना ने पूरे सुरक्षा तंत्र को हिलाकर रख दिया। एक सीआईएसएफ कांस्टेबल द्वारा किए गए खूनी संघर्ष में सहायक कमांडेंट समेत चार जवानों की जान चली गई। हमारी फील्ड पड़ताल और शुरुआती रिपोर्टों के मुताबिक, इस सनसनीखेज वारदात की जड़ में ड्यूटी के दौरान अनुशासन और व्यक्तिगत प्राथमिकताओं का टकराव था। आरोपी कांस्टेबल अपनी ड्यूटी पर पत्नी और बच्चे को लाने की मनाही से नाराज था। यह घटना दर्शाती है कि फ्रंटलाइन पर तैनात कमांडेंट और अधिकारियों पर अपने जवानों के बीच अनुशासन बनाए रखने के साथ-साथ उनके मानसिक स्वास्थ्य को संभालना कितना बड़ा और संवेदनशील जिम्मा बन चुका है।
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शहादत और विदाई: अंकित पांडेय की अंतिम यात्रा
इस खूनी संघर्ष और विभिन्न ड्यूटी के दौरान अपनी जान गंवाने वाले CISF के सहायक कमांडेंट अंकित पांडेय का पार्थिव शरीर जब उनके पैतृक आवास पहुंचा, तो पूरा माहौल गमगीन हो गया। राजकीय सम्मान के साथ उनकी अंतिम विदाई ने यह याद दिलाया कि आंतरिक सुरक्षा की रक्षा करते हुए इन अधिकारियों को कितनी भारी कीमत चुकानी पड़ती है। एक फील्ड रिपोर्टर के तौर पर जब हम जमीनी हकीकत टटोलते हैं, तो पाते हैं कि सहायक कमांडेंट का पद केवल एक प्रशासनिक रैंक नहीं, बल्कि कमान संभालने वाले उस युवा अधिकारी की कहानी है जो हर पल अप्रत्याशित खतरों के बीच जीता है।
उम्मीदों की नई किरण: सुदूर गांवों से असिस्टेंट कमांडेंट तक का सफर
एक तरफ जहां त्रासदियों के साये हैं, वहीं दूसरी तरफ देश के छोटे-छोटे गांवों से निकलकर सीआईएसएफ और अन्य सीएपीएफ बलों में असिस्टेंट कमांडेंट बनने वाले युवाओं की सफलता भी कम प्रेरणादायक नहीं है। हाल ही में संदीप जैसे युवाओं के चयन पर उनके गांवों में जिस तरह का जश्न मना, वह इस बात का प्रमाण है कि आज भी देश की युवा पीढ़ी वर्दी पहनकर देश सेवा करने को अपनी सर्वोच्च प्राथमिकता मानती है। यह विरोधाभास ही इस पेशे की यूएसपी है—जहां एक तरफ जान का जोखिम है, तो दूसरी तरफ करियर का स्वर्णिम शिखर भी।
शारीरिक परीक्षा और आगे की राह
भविष्य की तैयारियों की बात करें तो, सशस्त्र सीमा बल (SSB) और अन्य केंद्रीय बलों द्वारा सीएपीएफ सहायक कमांडेंट की शारीरिक दक्षता परीक्षा (PET/PST) के एडमिट कार्ड जारी कर दिए गए हैं। 13 अक्टूबर से शुरू होने वाली इन परीक्षाओं में हजारों युवा शामिल हो रहे हैं। यह प्रक्रिया इस बात को रेखांकित करती है कि बलों में नेतृत्व की कमान सौंपने का सिलसिला निरंतर जारी है। हालांकि, सिस्टम के भीतर प्रशासनिक सुधार, जवानों की मानसिक काउंसलिंग और अधिकारियों के लिए सुरक्षित कार्य वातावरण सुनिश्चित करना अब पहले से कहीं अधिक आवश्यक हो गया है।
'सहायक कमांडेंट' का पद केवल एक रैंक नहीं, बल्कि वर्दी के भीतर सुलगते तनाव और देश सेवा के जज्बे के बीच का एक बेहद बारीक संतुलन है। जब तक इस संतुलन को जमीनी स्तर पर नहीं समझा जाएगा, ऐसी त्रासदियों से बचना मुश्किल होगा।








