बैंक कर्मचारियों की पांच दिन की मांग पर क्यों मचा है बवाल
देशभर के बैंकिंग सेक्टर में एक बार फिर कर्मचारियों और सरकार के बीच तनातनी का माहौल बनता नजर आ रहा है। लंबे समय से बैंककर्मी यह मांग उठा रहे थे कि हफ्ते में केवल पांच दिन ही काम होना चाहिए और शनिवार तथा रविवार को अवकाश रहना चाहिए। लेकिन हाल ही में वित्त मंत्रालय के एक बयान ने इस पूरी चर्चा को नया मोड़ दे दिया है। सरकार की तरफ से यह साफ कर दिया गया है कि इस तरह के किसी भी प्रस्ताव पर कोई अंतिम सहमति नहीं बनी थी और न ही कभी ऐसा कोई वादा किया गया था। इस अचानक आए रुख के बाद बैंक यूनियनों और सरकार के बीच दूरियां बढ़ती दिख रही हैं।
यह पूरा विवाद ऐसे वक्त में गहराया है जब बैंकिंग सेक्टर के विभिन्न संगठनों ने अपनी मांगों के समर्थन में राष्ट्रव्यापी स्तर पर हड़ताल पर जाने का ऐलान कर दिया है। कर्मचारियों का कहना है कि उनकी लंबे समय से चली आ रही जायज मांग को अब नजरअंदाज किया जा रहा है, जबकि अधिकारियों और कर्मचारियों का एक बड़ा वर्ग इस बदलाव की उम्मीद लगाए बैठा था। वित्तीय क्षेत्र के जानकारों का मानना है कि यदि इस गतिरोध को जल्द बातचीत के जरिए हल नहीं किया गया, तो आने वाले दिनों में आम जनता को बैंकिंग सेवाओं के मोर्चे पर भारी परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है।
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वेतन समझौते और यूनियंस के दावों की असलियत
बैंक यूनियनों का यह कड़ा दावा रहा है कि इसी साल मार्च महीने में जब वेतन संशोधन को लेकर बातचीत चल रही थी, तब इंडियन बैंक्स एसोसिएशन और यूनाइटेड फोरम ऑफ बैंक यूनियंस के बीच पांच दिन के वर्किंग वीक पर सकारात्मक चर्चा हुई थी। ऑल इंडिया बैंक ऑफिसर्स कन्फेडरेशन के प्रमुख नेताओं की ओर से भी यह बात जोर-शोर से कही गई थी कि शनिवार की छुट्टी को सैद्धांतिक मंजूरी मिल चुकी है और केवल औपचारिकताएं बाकी हैं।
दूसरी तरफ, वित्त मंत्रालय के सूत्रों का नज़रिया इसके बिल्कुल उलट है। मंत्रालय का स्पष्ट कहना है कि यह मुद्दा कभी भी आधिकारिक बातचीत का मुख्य एजेंडा नहीं था और इसे यूनियंस द्वारा एकतरफा तरीके से उठाया गया था। सरकार का पक्ष है कि बिना किसी ठोस समझौते के इस तरह के बदलाव को लागू करना संभव नहीं है। इस दोतरफा बयानबाजी ने बैंक कर्मियों के बीच नाराजगी को और अधिक बढ़ा दिया है, जिससे माहौल लगातार गरमाता जा रहा है।
परफॉर्मेंस-लिंक्ड इंसेंटिव और नए नियमों पर तनातनी
सिर्फ शनिवार की छुट्टी ही नहीं, बल्कि वरिष्ठ बैंक अधिकारियों के लिए तैयार की गई परफॉर्मेंस-लिंक्ड इंसेंटिव योजना भी विवाद के केंद्र में बनी हुई है। वित्तीय सेवा विभाग की ओर से इस नई योजना को लेकर दिशा-निर्देश जारी किए गए थे, जो आने वाले वित्त वर्ष के लिए प्रभावी होने वाली है। इस योजना के दायरे में स्केल-फोर और उससे ऊपर के अधिकारी आते हैं, जिनके लिए प्रदर्शन के आधार पर इंसेंटिव तय करने का प्रावधान किया गया है।
बैंक यूनियनों का एक धड़ा इस नई प्रोत्साहन व्यवस्था के कुछ प्रावधानों के विरोध में खड़ा हो गया है। उनका तर्क है कि इस तरह की नीतियों से कार्यस्थल पर अनावश्यक दबाव बढ़ता है और अधिकारियों के बीच अनावश्यक प्रतिस्पर्धा पैदा होती है। बैंकिंग सेक्टर के जानकारों का कहना है कि वेतन और छुट्टियों के साथ-साथ इन इंसेंटिव योजनाओं ने कर्मचारियों के भीतर असंतोष को और ज्यादा गहरा कर दिया है, जो आने वाले दिनों में बड़े आंदोलन का रूप ले सकता है।
हड़ताल की आशंका के बीच सरकार के कड़े निर्देश
बैंक कर्मचारियों के प्रमुख संगठनों के साझा मंच यूनाइटेड फोरम ऑफ बैंक यूनियंस ने अपनी मांगों के समर्थन में देशव्यापी हड़ताल का बिगुल फूंक दिया है। इस स्थिति से निपटने और आम जनता को किसी भी तरह की असुविधा से बचाने के लिए वित्त मंत्रालय और भारतीय रिजर्व बैंक ने कमर कस ली है। सरकार ने एहतियातन यह निर्देश जारी किए हैं कि हड़ताल के दौरान भी सार्वजनिक क्षेत्र की बैंक शाखाएं और करेंसी चेस्ट पूरी क्षमता के साथ संचालित किए जाएं ताकि वित्तीय व्यवस्था पर इसका असर न पड़े।
इस संयुक्त मंच के अंतर्गत देश के तमाम बड़े बैंक कर्मचारी और अधिकारी संगठन शामिल हैं, जिनकी देश के कोने-कोने में मजबूत पकड़ है। यही वजह है कि जब ये सभी संगठन एकजुट होकर किसी आंदोलन का ऐलान करते हैं, तो बैंकिंग कामकाज ठप होने का खतरा पैदा हो जाता है। सरकार और रिजर्व बैंक की पूरी कोशिश यही है कि वैकल्पिक व्यवस्थाओं के जरिए बैंकिंग सेवाओं को सुचारू बनाए रखा जाए, ताकि ग्राहकों को किसी प्रकार की दिक्कत न हो।
"हमने बैंकों में पांच दिन काम करने का कोई वादा नहीं किया था। यह बातचीत का कोई मुद्दा नहीं था और न ही इस पर कोई ठोस समझौता हुआ था।" — वित्त मंत्रालय का आधिकारिक सूत्र
निष्कर्ष और आगे की राह
फिलहाल जिस प्रकार की स्थिति बैंक सेक्टर में बनती दिख रही है, उसमें दोनों पक्षों के बीच संवादहीनता साफ तौर पर महसूस की जा रही है। एक तरफ जहां कर्मचारी संगठन अपनी जिद पर अड़े हैं और हड़ताल के जरिए अपनी ताकत दिखाने की तैयारी में हैं, वहीं दूसरी तरफ सरकार भी अपने रुख पर कायम नजर आ रही है। इस खींचतान के बीच सबसे ज्यादा पिसने का अंदेशा आम बैंकिंग ग्राहकों का है, जिन्हें छुट्टी के दिनों और हड़ताल की अवधि में अपने वित्तीय लेन-देन के लिए परेशानियों से जूझना पड़ सकता है।
आने वाले दिनों में यह देखना बेहद दिलचस्प और महत्वपूर्ण होगा कि क्या सरकार और बैंक यूनियनों के बीच किसी मध्यम मार्ग पर सहमति बन पाती है या फिर बैंकिंग सेक्टर एक बड़े टकराव की ओर बढ़ता है। देश के करोड़ों ग्राहकों की नजरें इस पूरे घटनाक्रम पर टिकी हुई हैं, क्योंकि डिजिटल युग में भी कई जरूरी कामों के लिए बैंक शाखाओं की भौतिक उपस्थिति अनिवार्य बनी हुई है।







