भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौते की सुगबुगाहट तेज
नई दिल्ली और वाशिंगटन के बीच लंबे समय से अटके व्यापारिक रिश्तों को एक नया आयाम देने की कोशिशें फिर से परवान चढ़ रही हैं। वैश्विक व्यापार मंचों पर इन दिनों इस बात की चर्चा जोरों पर है कि दुनिया की इन दो बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच एक व्यापक व्यापार समझौता आखिरकार कब तक धरातल पर उतरेगा। उद्योग जगत के जानकारों का मानना है कि यदि इस साल के खत्म होने से पहले यह डील पूरी हो जाती है, तो यह पिछले दो दशकों की सबसे बड़ी द्विपक्षीय आर्थिक सफलताओं में शुमार होगी। अमेरिका और भारत के बीच आर्थिक साझेदारी को मजबूत करने वाले प्रमुख संगठनों ने इस दिशा में अब अपनी आवाज और बुलंद कर दी है।
अमेरिकी-भारतीय व्यापार परिषद यानी यूएसआईबीसी के शीर्ष नेतृत्व ने हाल ही में दोनों देशों की सरकारों के समक्ष एक स्पष्ट संदेश रखा है। उनका कहना है कि अब वक्त आ गया है कि कागजी बहसों और वार्ताओं के दौर को पार करते हुए इस समझौते को अंतिम रूप दिया जाए। परिषद के प्रमुख का मानना है कि जैसे-जैसे समय बीत रहा है, वैसे-वैसे दोनों तरफ की कंपनियों की व्यावसायिक योजनाएं प्रभावित हो रही हैं। जब तक सीमा शुल्क, टैरिफ और बाजार तक सीधी पहुंच के नियम पूरी तरह तय नहीं हो जाते, तब तक बड़े कॉरपोरेट घराने और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर के निवेशक खुलकर बड़े वित्तीय जोखिम उठाने से बच रहे हैं।
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निवेशकों की धड़कनें क्यों बढ़ीं और क्या है उद्योग की मांग?
किसी भी देश की आर्थिक तरक्की में विदेशी प्रत्यक्ष निवेश यानी एफडीआई और घरेलू उद्योगों का आत्मविश्वास रीढ़ की हड्डी का काम करता है। वर्तमान स्थिति यह है कि भारत और अमेरिका के बीच फरवरी के महीने में एक अंतरिम समझौते का खाका जरूर सामने आया था, लेकिन उसके बाद से शुल्क दरों और बाजार के नियमों को लेकर तस्वीर पूरी तरह साफ नहीं हो पाई है। इलेक्ट्रॉनिक्स, ई-कॉमर्स और फॉर्मास्यूटिकल्स जैसे आधुनिक उद्योगों की नजरें इस वक्त सरकारों के अगले बड़े कदम पर टिकी हुई हैं। कंपनियों ने अपनी अंदरूनी रणनीतियां और ब्लूप्रिंट तैयार कर लिए हैं, लेकिन आधिकारिक मुहर न लगने के कारण वे अपने प्रोजेक्ट्स को जमीन पर उतारने से कतरा रही हैं।
विशेषज्ञों का यह भी तर्क है कि यदि इस समझौते को समय पर लागू नहीं किया गया, तो भारत में मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को बढ़ावा देने के लिए जो सकारात्मक माहौल तैयार हुआ है, उसका पूरा लाभ उठाने से देश चूक सकता है। सप्लाई चेन को दुरुस्त करने, आधुनिक तकनीक के आदान-प्रदान और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसे उभरते क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने के लिए यह जरूरी है कि नीतिगत स्पष्टता जल्द से जल्द सामने आए। बाजार के जानकारों का मानना है कि यह केवल दो देशों के बीच सामान बेचने और खरीदने का सौदा भर नहीं है, बल्कि यह दोनों राष्ट्रों के बीच गहरे आर्थिक भरोसे की एक बड़ी इबारत है।
"यदि यह व्यापार समझौता इस साल के अंत तक मुकम्मल हो जाता है, तो यह पिछले बीस वर्षों का सबसे बड़ा कूटनीतिक और आर्थिक मील का पत्थर साबित होगा। इससे न केवल दोनों देशों के कारोबारी संबंध मजबूत होंगे, बल्कि आम कामकाजी परिवारों की आजीविका पर भी इसका बेहद सकारात्मक असर देखने को मिलेगा।" — अतुल केशप, अध्यक्ष, यूएस-इंडिया बिजनेस काउंसिल
वैश्विक प्रतिस्पर्धा और भारत का कड़ा रुख
यह बात किसी से छिपी नहीं है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारत को कई अन्य एशियाई देशों जैसे वियतनाम और थाईलैंड से कड़ी टक्कर मिल रही है। केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल पहले ही यह संकेत दे चुके हैं कि भारत किसी भी ऐसे समझौते पर जल्दबाजी में हस्ताक्षर नहीं करेगा जिससे घरेलू निर्माताओं या निर्यातकों को नुकसान उठाना पड़े। भारत सरकार की यह स्पष्ट नीति रही है कि अमेरिकी बाजार में हमारे उत्पादों को वियतनाम या अन्य प्रतिस्पर्धी देशों के मुकाबले पूरी बराबरी और निष्पक्ष लाभ मिलना चाहिए। इसी वजह से अंतिम दौर की वार्ताओं में कुछ बिंदुओं पर पेच फंसा हुआ है, जिसे दोनों पक्ष बैठकर सुलझाने का प्रयास कर रहे हैं।
सरकार और नीति निर्माताओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि देश के लघु, सूक्ष्म और मध्यम उद्योगों यानी एमएसएमई सेक्टर के हितों पर कोई आंच न आए। साथ ही, अमेरिका जैसी विशाल अर्थव्यवस्था के साथ मिलकर डिजिटल इकॉनमी, हरित ऊर्जा और सेमीकंडक्टर निर्माण के क्षेत्रों में नए अवसरों को कैसे भुनाया जाए, इस पर भी मंथन जारी है। उद्योग विश्लेषकों का मानना है कि यदि भारत अपनी शर्तों पर एक मजबूत और संतुलित समझौता कराने में कामयाब रहता है, तो आने वाले दशकों में देश वैश्विक सप्लाई चेन का एक प्रमुख केंद्र बन सकता है।
अनिश्चितता के बादल छटने की उम्मीद और आगे की राह
कारोबारी गलियारों में इस बात को लेकर राहत की सांस ली जा रही है कि दोनों देशों के वार्ताकार संवाद की प्रक्रिया को लगातार आगे बढ़ा रहे हैं। कंपनियों की ओर से लगातार दबाव बनाया जा रहा है कि वे अपनी दीर्घकालिक योजनाओं को तभी क्रियान्वित कर पाएंगी जब दोनों सरकारों की ओर से स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए जाएंगे। उपभोक्ता सामानों से लेकर भारी मशीनरी तक के निर्माण में जुटी बहुराष्ट्रीय कंपनियां इस बात का इंतजार कर रही हैं कि कब उन्हें टैक्स रियायतों और सुगम लाइसेंसिंग प्रक्रियाओं का स्पष्ट लाभ मिले।
आने वाले कुछ महीने इस व्यापार समझौते के भविष्य तय करने के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण होने वाले हैं। यदि कूटनीतिक स्तर पर दोनों देश आपसी सहमति के अंतिम बिंदुओं को साधने में सफल रहते हैं, तो यह साल के अंत तक वैश्विक व्यापार मंच पर एक बहुत बड़ी खबर बनकर उभरेगा। आम नागरिकों और छोटे कारोबारियों के लिए भी यह समझना जरूरी है कि इस तरह के बड़े समझौते अंततः देश के भीतर रोजगार के नए अवसर पैदा करने और उपभोक्ता उत्पादों के दाम को स्थिर रखने में मददगार साबित होते हैं। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि सरकारी तंत्र इस दिशा में कितनी तेजी से और किस रूप में अपने कदम आगे बढ़ाता है।




