सितंबर के आखिरी दिनों में क्यों मंडरा रहा है बैंक हड़ताल का खतरा?
सितंबर महीने का आखिरी हफ्ता आम जनता, कारोबारियों और बैंक ग्राहकों के लिए बड़ी मुश्किलें लेकर आ सकता है। देश भर में बैंकिंग सेवाओं को लेकर एक बार फिर बड़ी हलचल शुरू हो गई है। यूनाइटेड फोरम ऑफ बैंक यूनियंस (UFBU) और विभिन्न बैंक कर्मचारी संगठनों ने मिलकर आगामी 28, 29 और 30 सितंबर को तीन दिन की राष्ट्रव्यापी हड़ताल का ऐलान किया है। इस प्रस्तावित हड़ताल के चलते बैंकिंग सेक्टर में भारी व्यवधान की आशंका जताई जा रही है, जिससे ग्राहकों के जरूरी वित्तीय कार्य अटक सकते हैं।
स्थिति की गंभीरता को देखते हुए केंद्र सरकार और संबंधित प्राधिकारियों ने बैंक कर्मचारियों और यूनियनों के प्रतिनिधियों से कड़ी अपील की है। सरकार का कहना है कि किसी भी समस्या या मांग का समाधान हड़ताल के रास्ते पर चलने के बजाय आपसी बातचीत के जरिए निकाला जाना चाहिए। चूंकि बैंकिंग सेवाएं देश की रीढ़ की हड्डी मानी जाती हैं, इसलिए अचानक कामकाज ठप होने से आम आदमी की जेब और कारोबारियों के लेन-देन पर सीधा असर पड़ता है।
इससे पहले भी कर्मचारी संगठनों ने 11 सितंबर को एक दिन की सांकेतिक हड़ताल की थी, जिसके बाद अब बड़े स्तर पर तीन दिन का शटडाउन करने की तैयारी है। इतना ही नहीं, यदि सरकार उनकी मांगें नहीं मानती है, तो आने वाले दिनों में और भी कड़े कदम उठाने की चेतावनी दी गई है, जिससे स्थिति और अधिक गंभीर हो सकती है।
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5-डे वर्किंग और पीएलआई योजना पर क्या है सरकार का नया रुख?
बैंक कर्मचारियों की मुख्य मांगों में सबसे ऊपर '5-डे बैंकिंग' यानी हफ्ते में पांच दिन काम करने का नियम लागू करना शामिल है। कर्मचारी संगठनों का तर्क है कि आधुनिक कार्य संस्कृति और मानसिक स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए शनिवार और रविवार दोनों दिन अवकाश घोषित किया जाना चाहिए। सरकार ने इस मांग पर स्पष्ट किया है कि यह मुद्दा अभी विचाराधीन है और इस पर अंतिम निर्णय लिया जाना बाकी है।
इसके अलावा कर्मचारियों की दूसरी बड़ी आपत्ति परफॉर्मेंस लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) योजना को लेकर थी, जिसे यूनियनों ने बंद करने की मांग की थी। सरकार ने इस मामले में लचीला रुख अपनाते हुए यूनियनों के साथ बातचीत के बाद पीएलआई योजना को फिलहाल स्थगित रखने का बड़ा फैसला किया है। यानी कर्मचारियों की दो प्रमुख मांगों में से एक पर सरकार ने सकारात्मक कदम उठाया है, लेकिन पांच दिन के वर्किंग वीक पर अभी मंथन जारी है।
"बैंक कर्मचारियों की चिंताओं और उनकी मांगों पर सरकार पूरी संवेदनशीलता के साथ विचार कर रही है। देश की आर्थिक गतिविधियों को सुचारू बनाए रखने के लिए सभी पक्षों को संवाद का मार्ग अपनाना चाहिए।" — वरिष्ठ वित्त मंत्रालय अधिकारी
30 सितंबर की हाफ-ईयरली क्लोजिंग और बैंकिंग सेवाओं पर बड़ा संकट
सरकार द्वारा हड़ताल से बचने की अपील के पीछे सबसे बड़ा कारण 30 सितंबर की 'हाफ-ईयरली क्लोजिंग' (अर्धवार्षिक लेखा बंद) है। सितंबर का महीना वित्तीय वर्ष का आधा हिस्सा पूरा होने का समय होता है। इस दौरान बैंकों में खातों के मिलान, प्रोविजन्स, ट्रेजरी संचालन और वित्तीय बाजार से जुड़े अनगिनत संवेदनशील कार्य निपटाए जाते हैं।
यदि इस व्यस्ततम अवधि में लगातार तीन दिनों तक बैंक बंद रहते हैं, तो वित्तीय प्रणाली पर अत्यधिक दबाव पड़ सकता है। जानकारों का मानना है कि यदि हड़ताल से ठीक पहले के सप्ताहांत (वीकेंड) को भी जोड़ लिया जाए, तो बैंकिंग सेवाएं लगभग पांच दिनों तक बुरी तरह प्रभावित हो सकती हैं। इसका असर न केवल आम नागरिकों के रोजमर्रा के लेन-देन पर होगा, बल्कि सरकारी भुगतानों, अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग और बड़े व्यावसायिक उद्योगों पर भी गहरा प्रभाव पड़ेगा।
कारोबारियों और व्यापारियों के लिए यह समय टैक्स, लोन और बिल भुगतान का होता है, ऐसे में हड़ताल होने से उनका वित्तीय संतुलन बिगड़ सकता है। यही कारण है कि सरकार चाहती है कि कर्मचारी इस नाज़ुक मोड़ पर हड़ताल का रास्ता छोड़कर अपने काम पर डटे रहें।
सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में भर्तियों और कल्याणकारी कदमों का ब्योरा
हड़ताल के माहौल के बीच सरकार ने यह भी रेखांकित किया है कि बीते कुछ वर्षों में पब्लिक सेक्टर के बैंकों (PSBs) में कर्मचारियों के हितों और कार्यकुशलता को बढ़ाने के लिए कई ऐतिहासिक कदम उठाए गए हैं। आंकड़ों के मुताबिक, वित्त वर्ष 2014-15 से लेकर 2025-26 के बीच सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में करीब 4.82 लाख नए कर्मचारियों की बंपर भर्तियां की गई हैं। पिछले तीन वर्षों में इन भर्तियों की रफ्तार में उल्लेखनीय तेजी आई है ताकि बैंकों पर काम का बोझ कम हो सके।
इसके अलावा कर्मचारियों के वेतन और भत्तों में समय-समय पर बढ़ोतरी की गई है, प्रमोशन और ट्रांसफर की प्रक्रियाओं को काफी हद तक पारदर्शी बनाया गया है। महिला कर्मचारियों के लिए विशेष अवकाश के प्रावधान, पारिवारिक पेंशन नियमों में संशोधन और रिटायर्ड कर्मचारियों के लिए मेडिकल इंश्योरेंस जैसी सुविधाएं भी सुनिश्चित की गई हैं ताकि कर्मचारियों का कार्य-जीवन संतुलन बेहतर हो सके।
यदि मांगें नहीं मानी गईं तो आगे क्या होगा?
बैंक यूनियनों ने स्पष्ट कर दिया है कि यदि उनकी लंबे समय से लंबित पड़ी 5-डे बैंकिंग की मांग पर सरकार जल्द ही कोई ठोस और सकारात्मक फैसला नहीं लेती है, तो उनका आंदोलन और अधिक तेज होगा। प्रस्तावित तीन दिन की हड़ताल के अलावा यूनियनों ने आगामी 26 अक्टूबर से अनिश्चितकालीन देशव्यापी हड़ताल पर जाने की चेतावनी भी दे रखी है।
यदि अक्टूबर के आखिर में अनिश्चितकालीन हड़ताल होती है, तो यह भारतीय बैंकिंग इतिहास के सबसे बड़े संकटों में से एक साबित हो सकता है। फिलहाल गेंद सरकार और बैंक यूनियनों के पाले में है। देखना यह होगा कि आने वाले दिनों में होने वाली बैठकों में क्या कोई बीच का रास्ता निकलता है या फिर ग्राहकों को एक बार फिर लंबी छुट्टियों और बैंकिंग ठप होने की समस्या का सामना करना पड़ेगा।






