बिहार विधान परिषद चुनाव की रणभेरी और सियासी घमासान
बिहार की राजनीति में विधान परिषद (MLC) की स्नातक और शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों की सीटों को हमेशा से काफी प्रतिष्ठापूर्ण माना जाता रहा है। राज्य की कुल 8 सीटों पर होने वाले आगामी चुनावों की घोषणा के साथ ही राजनीतिक दलों के भीतर और बाहर हलचल तेज हो चुकी है। इस बार चुनाव का मैदान न केवल प्रशासनिक और चुनावी तैयारियों के लिहाज से महत्वपूर्ण है, बल्कि विभिन्न नेताओं के बीच व्यक्तिगत और राजनीतिक अदावत के कारण भी खासी चर्चा का केंद्र बना हुआ है। चुनाव की तारीख नजदीक आते ही तमाम राजनीतिक दल अपनी पूरी ताकत झोंक रहे हैं, लेकिन अंदरूनी कलह और बयानबाजी ने समीकरणों को उलझा दिया है।
खास तौर पर पटना स्नातक निर्वाचन क्षेत्र का मुकाबला बेहद दिलचस्प और तनावपूर्ण हो गया है। इस सीट से जेडीयू के टिकट पर मैदान में उतरे नीरज कुमार और अन्य दलों के उम्मीदवारों के बीच कड़ा मुकाबला तय माना जा रहा है। हालांकि, सबसे बड़ा राजनीतिक ड्रामा तब शुरू हुआ जब सत्ताधारी दल के ही एक बाहुबली विधायक ने अपनी ही पार्टी के प्रत्याशी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। इस स्थिति ने राजनीतिक विश्लेषकों को भी हैरान कर दिया है कि कैसे चुनावी समर में अपने ही अपनों के खिलाफ ताल ठोकते नजर आ रहे हैं।
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बाहुबली विधायक की खुली बगावत और तीखे हमले
मोकामा के मौजूदा विधायक अनंत सिंह ने पटना स्नातक निर्वाचन क्षेत्र से पार्टी उम्मीदवार नीरज कुमार के खिलाफ बेहद आक्रामक रुख अपना रखा है। उन्होंने सार्वजनिक रूप से ऐलान किया है कि वह किसी भी कीमत पर नीरज कुमार को विजयी नहीं होने देंगे और उन्हें हराने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक देंगे। अनंत सिंह का आरोप है कि उनके पुराने राजनीतिक जीवन में उन्हें फंसाने और जेल भिजवाने के पीछे बड़ी साजिशें थीं, जिसमें नीरज कुमार की भी अहम भूमिका रही है।
विवाद यहीं नहीं थमता, दोनों नेताओं के बीच जुबानी जंग भी लगातार तीखी होती जा रही है। अनंत सिंह ने तो खुलेआम चुनौती देते हुए कहा है कि यदि उनके और संबंधित उम्मीदवार के बीच चुनावी हार-जीत को लेकर कोई संशय है, तो वह बड़ी शर्त लगाने और सार्वजनिक मंच पर बहस करने के लिए भी तैयार हैं। उन्होंने प्रतिद्वंद्वी नेता के राजनीतिक सफर और शैक्षणिक पृष्ठभूमि पर भी तंज कसने से गुरेज नहीं किया। दूसरी ओर, जेडीयू के नेता नीरज कुमार ने भी इन तमाम आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कड़ा पलटवार किया है और बाहुबली विधायक की मानसिक स्थिति पर सवाल खड़े किए हैं।
"राजनीति में कोई किसी को जन्म नहीं देता, लेकिन जो लोग पार्टी और नेतृत्व के खिलाफ अनर्गल बयानबाजी करते हैं, जनता और वक्त खुद उनका हिसाब कर देता है। ऐसे तेवर दिखाने वालों की असलियत सब जानते हैं।" — नीरज कुमार, जेडीयू एमएलसी
जनसुराज पार्टी के भीतर भी फूट और आंतरिक विरोधाभास
इस पूरे चुनावी घटनाक्रम में केवल सत्ताधारी दल ही नहीं, बल्कि नई राजनीतिक जमीन तलाश रही जनसुराज पार्टी के भीतर भी अंतर्विरोध खुलकर सामने आ रहे हैं। मोकामा विधानसभा क्षेत्र से जनसुराज के टिकट पर पिछला चुनाव लड़ चुके नेता पियूष प्रियदर्शी ने पार्टी के फैसलों से असहमति जताते हुए बगावत का बिगुल फूंक दिया है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में सोशल मीडिया के माध्यम से घोषणा की है कि वह पार्टी समर्थित उम्मीदवार का समर्थन नहीं करेंगे।
पियूष प्रियदर्शी का यह कदम इस बात की ओर इशारा करता है कि स्थानीय स्तर पर राजनीतिक समीकरण कितने जटिल हो चुके हैं। उन्होंने अपने पिछले चुनावों के दौरान हुई हिंसक घटनाओं और एक समर्थक की मौत के मामले को भी फिर से तूल दिया है। उनका कहना है कि जिन लोगों और परिवारों ने संघर्ष का सामना किया है, वे स्थानीय राजनीतिक चरित्र को भली-भांति समझते हैं। इस तरह के बयानों ने जनसुराज के केंद्रीय नेतृत्व के सामने भी असहज स्थिति पैदा कर दी है, जिससे पार्टी की अंदरूनी एकता पर सवाल उठने लगे हैं।
आपराधिक मामले, पुरानी रंजिश और चुनावी समीकरण
मोकामा और आसपास के इलाकों में पिछले कुछ महीनों के दौरान हुई आपराधिक घटनाएं और झड़पें इस चुनाव की पृष्ठभूमि में एक बड़ा मुद्दा बनी हुई हैं। कुछ समय पहले हुई एक चर्चित हत्या के मामले और उसके बाद पुलिसिया कार्रवाई ने इलाके की आबोहवा को पूरी तरह बदल दिया था। इस मामले में बाहुबली विधायक और उनके समर्थकों पर लगे गंभीर आरोपों के बाद से ही इलाके की राजनीति में तनाव की स्थिति बनी हुई है।
पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट और कानूनी लड़ाइयों के पन्नों ने इस चुनावी मुकाबले को और अधिक संवेदनशील बना दिया है। पीड़ित पक्ष और उनके समर्थक लगातार न्याय की मांग कर रहे हैं, वहीं दूसरी, राजनीतिक मंचों से इन मामलों को लेकर एक-दूसरे पर तोहमत लगाने का दौर जारी है। चुनावी सरगर्मी के बीच इन पुरानी फाइलों का खुलना और अदालती लड़ाइयों का हवाला देना मतदाताओं के बीच चर्चा का प्रमुख विषय बन गया है।
निष्कर्ष: क्या होगा आगामी मतदान का परिणाम
बिहार विधान परिषद के इन चुनावों में जिस तरह से व्यक्तिगत द्वेष, राजनीतिक महत्वकांक्षाएं और दलगत सीमाओं से परे जाकर बयानबाजी हो रही है, उसने आम मतदाताओं को भी असमंजस में डाल दिया है। एक तरफ जहां प्रशासनिक मशीनरी शांतिपूर्ण और निष्पक्ष मतदान कराने की तैयारियों में जुटी है, वहीं दूसरी ओर दिग्गजों के बीच की यह आपसी जंग चुनाव के नतीजों को बेहद रोमांचक बना रही है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि जनता किसके पक्ष में अपना जनादेश देती है और कौन सा नेता अपनी राजनीतिक प्रतिष्ठा बचाने में कामयाब होता है।









