तमिलनाडु की राजनीति में गरमाया नया विवाद
दक्षिण भारत के प्रमुख राज्य तमिलनाडु में सियासी पारा एक बार फिर चढ़ गया है। राज्य सरकार की एक महत्वाकांक्षी योजना को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं, जिससे प्रशासनिक हलकों में भी हलचल तेज हो गई है। मामला राज्य के सरकारी अस्पतालों में जन्म लेने वाले नवजात शिशुओं को कीमती उपहार देने से जुड़ा है। जैसे ही इस योजना के क्रियान्वयन की सुगबुगाहट तेज हुई, वैसे ही इस पर कानूनी और राजनीतिक मोर्चे पर आपत्तियों का दौर शुरू हो गया। चुनावी मौसम के बीच इस प्रकार की योजनाओं का आना विरोधियों और एक्टिविस्टों के निशाने पर आ गया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि जब भी किसी राज्य में उपचुनाव चल रहे होते हैं, तो सरकार की हर नीति और घोषणा पर निर्वाचन आयोग की पैनी नजर रहती है। ऐसे में आम जनता को सीधे लाभ पहुंचाने वाली या भावनात्मक रूप से जोड़ने वाली योजनाओं का आरंभ करना कई बार कानूनी पेचीदगियों को बुलावा दे देता है। इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर चुनावी पारदर्शिता और नैतिक आचार संहिता के पालन पर राष्ट्रीय स्तर पर बहस छेड़ दी है।
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क्या है 'थाई मामन थंगा मोथिरम' योजना का पूरा मामला?
राज्य सरकार द्वारा लाई गई इस अनूठी योजना का नाम 'थाई मामन थंगा मोथिरम' यानी 'मामा का सोने का तोहफा' रखा गया है। योजना के तहत यह प्रावधान किया गया था कि राज्यभर के सरकारी चिकित्सा संस्थानों में जन्म लेने वाले हर नवजात शिशु को एक ग्राम वजन की सोने की अंगूठी मुफ्त भेंट की जाएगी। इस पहल का मुख्य उद्देश्य सरकारी अस्पतालों में प्रसव की संख्या बढ़ाना और गरीब परिवारों को आर्थिक संबल देना बताया गया था।
प्रशासनिक स्तर पर इस योजना के भव्य शुभारंभ की पूरी तैयारी कर ली गई थी। इसके तहत राज्य के एक सौ से अधिक सरकारी अस्पतालों को इस दायरे में शामिल किया जाना था। इस महत्वाकांक्षी पहल का मुख्य मकसद मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य सेवाओं को बढ़ावा देना और सरकारी स्वास्थ्य तंत्र के प्रति लोगों का विश्वास मजबूत करना था। लेकिन इसके समय और तौर-तरीकों को लेकर अब बड़े सवाल खड़े हो रहे हैं, जिससे यह योजना अपने शुरुआती चरण में ही विवादों के घेरे में आ गई है।
चुनाव आयोग तक पहुंचा मामला, आचार संहिता के उल्लंघन का आरोप
इस पूरे प्रकरण को तूल तब मिला जब एक जाने-माने सामाजिक कार्यकर्ता ने इसके खिलाफ सीधा मोर्चा खोल दिया। एक्टिविस्ट सरवनन पलानीसामी ने भारतीय निर्वाचन आयोग के समक्ष औपचारिक शिकायत दर्ज कराते हुए इस योजना पर तुरंत रोक लगाने की मांग की है। उनका तर्क है कि जिन विधानसभा क्षेत्रों में इस समय उपचुनाव की प्रक्रिया चल रही है, वहां इस तरह के लुभावने उपहारों का वितरण मतदाताओं की निष्पक्ष सोच को प्रभावित कर सकता है।
शिकायतकर्ता ने अपने ज्ञापन में यह भी रेखांकित किया है कि जब आचार संहिता लागू हो, तब सरकार को किसी भी ऐसी नई लोकलुभावन योजना को शुरू करने से बचना चाहिए जिसका सीधा असर चुनावी नतीजों पर पड़ सके। चुनाव आयोग के अधिकारियों को सौंपी गई इस शिकायत में मांग की गई है कि इस मामले की गहराई से जांच की जाए और नियमों की अनदेखी करने वालों के खिलाफ उचित प्रशासनिक कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।
"उपचुनाव के बीच इस प्रकार की मुफ्त उपहार योजना का आरंभ करना सीधे तौर पर आदर्श आचार संहिता के नियमों के विरुद्ध है। यह मतदाताओं के विवेक को प्रभावित करने का एक स्पष्ट प्रयास है जिसे चुनाव आयोग को तुरंत रोकना चाहिए।" — सरवनन पलानीसामी, सामाजिक कार्यकर्ता
प्रशासनिक अनुमति और चुनावी पारदर्शिता पर उठ रहे गंभीर सवाल
इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा कानूनी पहलू यह है कि क्या इस योजना को शुरू करने से पहले निर्वाचन आयोग से औपचारिक अनुमति ली गई थी या नहीं। जानकारों का कहना है कि चुनावी राज्यों में किसी भी प्रकार की नई कल्याणकारी घोषणा या उसका धरातल पर क्रियान्वयन करने के लिए चुनाव आयोग की पूर्व स्वीकृति अनिवार्य होती है। यदि बिना अनुमति के ऐसी योजनाएं लागू की जाती हैं, तो इसे प्रशासनिक चूक या नियमों का उल्लंघन माना जा सकता है।
विपक्षी दलों और विश्लेषकों का भी यही मानना है कि सरकार को चुनाव की घोषणा के बाद ऐसी पहलों से पूरी तरह परहेज करना चाहिए था। फिलहाल, सबकी निगाहें चुनाव आयोग के अगले कदम पर टिकी हैं कि वह इस शिकायत पर क्या रुख अपनाता है और क्या इस योजना के विस्तार पर कोई रोक लगाई जाती है या नहीं। राज्य के सियासी गलियारों में यह मुद्दा आने वाले दिनों में और अधिक तूल पकड़ सकता है।






