बिहार की सड़कों पर गूंजे शिक्षा और रोजगार के सवाल
बिहार के युवाओं और छात्रों के बीच इन दिनों एक नई हलचल देखने को मिल रही है। राज्यभर में शिक्षा व्यवस्था की बदहाली, बेरोजगारी के बढ़ते संकट और लोकतांत्रिक अधिकारों के हनन के खिलाफ बड़े पैमाने पर आवाज उठाई जा रही है। इसी कड़ी में ऑल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन (AISF) और ऑल इंडिया यूथ फेडरेशन (AIYF) के साझा नेतृत्व में एक खास यात्रा निकाली गई है। यह यात्रा राज्य के विभिन्न इलाकों से गुजरते हुए आम नागरिकों और खास तौर पर नौजवानों को उनके अधिकारों के प्रति एकजुट करने का काम कर रही है।
यात्रा के दौरान ग्रामीण और शहरी इलाकों में नुक्कड़ सभाओं का आयोजन किया जा रहा है, जहां वक्ता खुलकर उन मुद्दों पर बात कर रहे हैं जो आम आदमी की रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़े हैं। युवाओं की भारी भीड़ इस यात्रा में शामिल हो रही है और सरकार की नीतियों के खिलाफ अपना रोष प्रकट कर रही है। आयोजकों का कहना है कि यह केवल एक राजनीतिक यात्रा नहीं है, बल्कि यह बिहार के भविष्य को बचाने की एक गंभीर मुहिम है।
विभिन्न पड़ावों पर आयोजित सभाओं में यह बात प्रमुखता से रखी जा रही है कि आज का युवा रोजगार की तलाश में भटकने को मजबूर है। जिन डिग्रियों को हासिल करने के लिए छात्र अपनी जवानी के महत्वपूर्ण साल और पैसे लगाते हैं, वे डिग्रियां आज नौकरी की गारंटी नहीं दे पा रही हैं। इस व्यवस्था के खिलाफ अब युवाओं ने आर-पार की लड़ाई का मन बना लिया है और आने वाले दिनों में इसका असर राजधानी की सड़कों पर साफ दिखाई देगा।
संबंधित खबरें
28 सितंबर को पटना में होगा ऐतिहासिक राजभवन मार्च
इस छात्र-नौजवान यात्रा का मुख्य उद्देश्य आगामी 28 सितंबर को पटना में आयोजित होने वाले विशाल राजभवन मार्च के लिए जमीन तैयार करना है। आयोजकों ने स्पष्ट कर दिया है कि यह मार्च केवल एक प्रतीकात्मक विरोध प्रदर्शन नहीं होगा, बल्कि यह राज्य और केंद्र सरकार की नीतियों के खिलाफ युवाओं का एक बड़ा शक्ति प्रदर्शन होगा। पटना की सड़कों पर हजारों की संख्या में छात्र और नौजवान उतरकर अपनी ताकत का अहसास कराएंगे।
राजभवन मार्च के दौरान मुख्य रूप से शिक्षा के व्यवसायीकरण को रोकने, सभी युवाओं के लिए रोजगार या बेरोजगारी भत्ता सुनिश्चित करने, और सार्वजनिक शिक्षण संस्थानों की रक्षा करने जैसी मांगें बुलंद की जाएंगी। इसके अलावा, छात्रों के लोकतांत्रिक अधिकारों पर हो रहे कथित हमलों के खिलाफ भी जोरदार आवाज उठाई जाएगी। छात्र नेताओं का कहना है कि जब तक हुक्मरानों तक युवाओं की आवाज नहीं पहुंचेगी, तब तक नीतियों में कोई बदलाव नहीं आएगा।
विभिन्न जिलों से लगातार संपर्क साधकर युवाओं को इस मार्च से जोड़ने का काम किया जा रहा है। यात्रा के दौरान गांवों और कस्बों में पर्चे बांटे जा रहे हैं और नुक्कड़ बैठकों के जरिए लोगों को समझाया जा रहा है कि क्यों उनका इस आंदोलन का हिस्सा बनना जरूरी है। आयोजकों का दावा है कि 28 सितंबर का यह मार्च राज्य के राजनीतिक गलियारों में हलचल पैदा कर देगा और सरकार को युवाओं की मांगों पर गंभीरता से विचार करने के लिए मजबूर होना पड़ेगा।
शिक्षा और रोजगार के मोर्चे पर सरकार की नीतियों की आलोचना
यात्रा के दौरान आयोजित सभाओं में वक्ताओं ने सरकार के कामकाज पर तीखे सवाल उठाए। नेताओं का कहना है कि आज शिक्षा इतनी महंगी हो चुकी है कि गरीब और मध्यम वर्ग के मेधावी छात्र उच्च शिक्षा से वंचित होते जा रहे हैं। सरकारी संस्थानों की हालत लगातार बदतर हो रही है और निजीकरण को बढ़ावा दिया जा रहा है, जिससे आम जनता की पहुंच से पढ़ाई दूर होती जा रही है।
रोजगार के मुद्दे पर भी सरकार को आड़े हाथों लिया गया। वक्ताओं ने कहा कि हर साल लाखों युवा पढ़ाई पूरी करके निकलते हैं, लेकिन उनके लिए रोजगार के नए अवसर पैदा करने के बजाय केवल खोखले दावे किए जाते हैं। जब युवा अपने हक के लिए आवाज उठाते हैं, तो उनकी आवाज़ को दबाने की कोशिश की जाती है। छात्र संगठनों ने दो टूक शब्दों में कहा कि अब युवा चुप बैठने वाले नहीं हैं और अपने हक की लड़ाई को अंतिम अंजाम तक पहुंचाएंगे।
"बिहार का छात्र और नौजवान आज शिक्षा, रोजगार और अपने लोकतांत्रिक अधिकारों से जुड़े बेहद गंभीर सवालों का सामना कर रहा है। सरकार को इन समस्याओं का स्थायी समाधान निकालना होगा, केवल कागजी घोषणाओं से काम नहीं चलेगा।" — रौशन कुमार सिन्हा, राष्ट्रीय अध्यक्ष, AIYF
पारदर्शिता और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा का संकल्प
शिक्षा और रोजगार के अलावा, इस यात्रा के दौरान चुनावी प्रक्रिया और लोकतांत्रिक संस्थाओं की पारदर्शिता का मुद्दा भी जोर-शोर से उठाया जा रहा है। वक्ताओं का कहना है कि एक मजबूत लोकतंत्र के लिए जरूरी है कि चुनाव प्रक्रिया पूरी तरह निष्पक्ष और पारदर्शी हो। मतदाता सूची में किसी भी योग्य नागरिक का नाम छूटना सीधे तौर पर उनके लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन है।
संगठन के नेताओं ने यह भी मांग उठाई है कि निर्वाचन आयोग को पूरी तरह निष्पक्षता के साथ काम करना चाहिए ताकि जनता का लोकतांत्रिक व्यवस्था से भरोसा न उठे। इन तमाम मुद्दों को लेकर छात्र-नौजवान न केवल अपने साथियों को बल्कि समाज के हर वर्ग को जागरूक कर रहे हैं। उनका मानना है कि जब तक आम जनता अपने अधिकारों के प्रति जागरूक नहीं होगी, तब तक व्यवस्था में वास्तविक सुधार लाना संभव नहीं है।
आगामी रणनीति और व्यापक जनसमर्थन की तैयारी
जैसे-जैसे 28 सितंबर की तारीख नजदीक आ रही है, छात्र-नौजवान यात्रा का दायरा भी बढ़ता जा रहा है। राज्य के कोने-कोने से युवा इस मुहिम से जुड़ रहे हैं। भाकपा (CPI) और अन्य जन संगठनों के स्थानीय नेता भी इस यात्रा को अपना समर्थन दे रहे हैं और युवाओं के साथ कंधे से कंधا मिलाकर चल रहे हैं।
यह यात्रा इस बात का प्रतीक है कि बिहार की युवा शक्ति एक बार फिर से अपनी पुरानी वैचारिक और सामाजिक प्रतिबद्धता के साथ मैदान में उतर चुकी है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार इन सुलगते सवालों का क्या जवाब देती है और आगामी राजभवन मार्च राज्य की राजनीति पर क्या असर छोड़ता है। फिलहाल, गांवों से लेकर शहरों तक बस एक ही चर्चा है—छात्रों की हुंकार और उनके हक की लड़ाई।



