ब्रह्मांड के सबसे रहस्यमयी पिंडों की आंतरिक दुनिया का नया सच
आकाशगंगाओं के केंद्र में बैठे सुपरमैसिव ब्लैक होल हमेशा से ही खगोल विज्ञान प्रेमियों और शोधकर्ताओं के लिए कौतूहल का विषय रहे हैं। अंतरिक्ष की गहराइयों में छिपे ये महाकाय पिंड अपने भीतर इतनी भयंकर गुरुत्वाकर्षण शक्ति समेटे होते हैं कि प्रकाश का भी इनसे बच निकलना असंभव होता है। हालांकि, इनके चारों ओर होने वाली हलचलें और इनसे निकलने वाले ऊर्जावान कण ब्रह्मांड के कई बड़े रहस्यों की चाबी खोलते हैं। हाल ही में भारतीय शोधकर्ताओं के नेतृत्व में एक अंतरराष्ट्रीय अध्ययन ने इन ब्लैक होल्स की दुनिया में एक नया पन्ना जोड़ा है, जिससे इनकी कार्यप्रणाली को समझने का नजरिया पूरी तरह बदल गया है।
वैज्ञानिकों ने ब्रह्मांड के सबसे चमकीले और सक्रिय स्रोतों में गिने जाने वाले 'ब्लेज़ार्स' से आने वाले एक्स-रे विकिरणों का बेहद बारीकी से विश्लेषण किया है। इस शोध के जरिए यह जानने की कोशिश की गई है कि ब्लैक होल के आसपास ऊर्जा का उत्पादन आखिर किस प्रकार होता है। जब अंतरिक्ष में इन पिंडों का अध्ययन किया जाता है, तो कई ऐसी परतें सामने आती हैं जो अब तक विज्ञान के लिए अनसुलझी पहेली बनी हुई थीं। इस ताज़ा खुलासे से खगोल भौतिकी के क्षेत्र में एक नई बहस और शोध की दिशा तय हो गई है.
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नैनीताल के शोध संस्थान ने संभाली वैश्विक खगोल अध्ययन की कमान
इस महत्वपूर्ण वैज्ञानिक अनुसंधान का नेतृत्व भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के अधीन आने वाले स्वायत्त संस्थान 'आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान शोध संस्थान' यानी एरीज (ARIES) ने किया है। नैनीताल में स्थित इस प्रतिष्ठित संस्थान के वैज्ञानिकों ने ब्रह्मांड की दूरदराज की गहराइयों में झांकने के लिए अत्याधुनिक तकनीकों का सहारा लिया। शोधकर्ताओं की इस टीम ने ब्रह्मांडीय पिंडों के व्यवहार को समझने के वास्ते अंतरिक्ष में तैनात उन्नत वेधशालाओं के आंकड़ों का गहराई से अध्ययन किया है।
विशेषज्ञों के अनुसार, ब्लेज़ार्स दरअसल सक्रिय आकाशगंगा नाभिकों की वह खास श्रेणी होती है, जिनमें सापेक्षिक जेट सीधे तौर पर हमारी दृष्टि-रेखा की ओर निर्देशित होते हैं। यही मुख्य वजह है कि ये ब्रह्मांड के सबसे अधिक चमकीले और स्थायी ऊर्जा स्रोत माने जाते हैं। जब वैज्ञानिक इनका अध्ययन करते हैं, तो उन्हें एक्स-रे और गामा-रे तरंगदैर्घ्य का सहारा लेना पड़ता है। जब इन पिंडों को टेरा-इलेक्ट्रॉनवोल्ट के उच्च स्तर पर परखा जाता है, तो इन्हें टीईवी ब्लेज़ार के रूप में वर्गीकृत किया जाता है। भारतीय शोधकर्ताओं का यह प्रयास वैश्विक स्तर पर खगोल विज्ञान में देश की बढ़ती साख और क्षमता को मजबूती देता है.
नासा के अंतरिक्ष दूरबीनों से मिले आंकड़ों का हुआ गहन विश्लेषण
इस अध्ययन को अंजाम तक पहुंचाने के लिए शोधकर्ताओं ने अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के अत्याधुनिक अंतरिक्ष दूरबीनों द्वारा जुटाए गए विशाल डेटाबेस का इस्तेमाल किया। इस शोध कार्य में मुख्य रूप से नासा की 'NICER' और 'NuSTAR' वेधशालाओं के आंकड़ों को आधार बनाया गया। शोध टीम ने चार प्रमुख टीईवी ब्लेज़ार्स—Mrk 421, Mrk 501, PG 1553+113 और PKS 2155-304—की कुल 13 एक्स-रे अवलोकन श्रृंखलाओं का बारीकी से हिसाब-किताब लगाया।
शोधकर्ताओं रिया भौमिक और आलोक सी. गुप्ता ने इन सभी आंकड़ों का सांख्यिकीय और भौतिकीय विश्लेषण किया। अंतरिक्ष में मौजूद इन दूरबीनों ने ब्लैक होल के आसपास की हलचलों को इतनी बारीकी से कैद किया, जिससे वैज्ञानिकों के लिए पुरानी थ्योरी को दोबारा जांचने का रास्ता साफ हुआ। पृथ्वी के वायुमंडल की बाधाओं से दूर अंतरिक्ष में तैनात इन वेधशालाओं की बदौलत ही सुदूर आकाशगंगाओं से आने वाली एक्स-रे किरणों का सही आकलन संभव हो पाया है.
जेट उत्सर्जन और अक्रेशन फ्लो के बीच छिपे हैं ऊर्जा के बड़े संकेत
अध्ययन के दौरान वैज्ञानिकों के हाथ एक बेहद दिलचस्प और चौंकाने वाला तथ्य लगा। Mrk 421 और Mrk 501 जैसे ब्लेज़ार्स जब अपने मध्यम से कम सक्रियता के दौर में होते हैं, तो एक्स-रे स्पेक्ट्रम के निचले हिस्से में एक अतिरिक्त घटक साफ तौर पर दिखाई देता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह विशेष संकेत ब्लैक होल के चारों ओर मौजूद 'अक्रेशन फ्लो' यानी पदार्थ के लगातार अंदर की ओर गिरने की प्रक्रिया से पैदा होने वाले विकिरण का हो सकता है। यह स्थिति आमतौर पर तब बनती है जब ब्लैक होल से बाहर की ओर निकलने वाला जेट उत्सर्जन कुछ कमजोर पड़ जाता है।
Mrk 421 के मामले में ऐसा अनोखा संकेत पहले भी वैज्ञानिकों की नजरों में आ चुका था, लेकिन Mrk 501 जैसे पिंड में इस तरह के समान योगदान का पता पहली बार चला है। यह इस बात का पुख्ता प्रमाण है कि ब्लैक होल सिर्फ विनाशकारी ही नहीं, बल्कि अपने आसपास की सामग्री को बेहद जटिल वैज्ञानिक प्रक्रियाओं के तहत ऊर्जा में तब्दील करते हैं।
"जब हम जेट और अक्रेशन फ्लो के संकेतों को अलग-अलग पहचान लेते हैं, तो आकाशगंगा नाभिकों की ऊर्जा-उत्पत्ति और उनके समग्र व्यवहार को समझना बहुत आसान हो जाता है। यह खगोल भौतिकी की कई पुरानी गुत्थियों को सुलझाने में मददगार साबित होगा।" — शोध दल, एरीज (ARIES)
खगोल भौतिकी की दुनिया में क्यों मील का पत्थर है यह नया शोध?
यह पूरा वैज्ञानिक निष्कर्ष इस लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि ब्लेज़ार्स का अध्ययन करना सीधे तौर पर जेट भौतिकी, अक्रेशन प्रक्रियाओं और सुपरमैसिव ब्लैक होल के आसपास उत्पन्न होने वाले उच्च-ऊर्जा विकिरणों को समझने का मार्ग प्रशस्त करता है। ब्रह्मांड में ऊर्जा का संतुलन कैसे बनता है और आकाशगंगाएं अपने केंद्रों से किस प्रकार ऊर्जा प्रसारित करती हैं, इन सवालों के जवाब खोजने में यह अध्ययन एक बड़ी छलांग माना जा रहा है।
चूंकि पृथ्वी का वायुमंडल अंतरिक्ष से आने वाली अधिकांश हानिकारक एक्स-रे किरणों को सोख लेता है, इसलिए जमीन से इनका अध्ययन करना असंभव होता है। ऐसे में अंतरिक्ष-आधारित वेधशालाओं की मदद से किया गया यह शोध सुदूर आकाशगंगाओं के केंद्र में छिपी ऊर्जा-प्रक्रियाओं को बेनकाब करने की दिशा में एक ऐतिहासिक और क्रांतिकारी कदम साबित हो रहा है।








