नई दिल्ली के सियासी गलियारों में इन दिनों मुख्य चुनाव आयुक्त यानी सीईसी के इस्तीफे को लेकर घमासान मचा हुआ है। विपक्षी दलों ने सड़क से लेकर संसद तक इस मुद्दे पर सरकार को घेरने की पूरी तैयारी कर ली थी। प्रदर्शनकारियों का साफ कहना था कि यह कदम देश की स्वतंत्र संस्थाओं पर सीधा हमला है। लेकिन जैसे-जैसे इस आंदोलन की तस्वीरें सामने आईं, राजनीतिक जानकारों ने इसके पीछे छिपे असली मंसूबों को भांप लिया। बात सिर्फ इस्तीफे के विरोध की नहीं थी, बल्कि इसके जरिए अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने का बड़ा खेल खेला जा रहा था।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच राहुल गांधी और क्षेत्रीय दलों के रिश्तों में आई दरार भी खुलकर सामने आ गई है। द्रमुक यानी डीएमके के एक बड़े नेता ने तो राहुल गांधी पर सीधा हमला बोलते हुए उन्हें दगाबाज तक कह दिया। जिन लोगों ने पहले राहुल गांधी का साथ दिया था, वे अब ज्ञानेश कुमार मामले में उन्हीं को आईना दिखा रहे हैं। तस्वीरों में साफ देखा जा सकता है कि विरोध प्रदर्शन के मंच पर बैठे नेताओं के सुर किस तरह अलग-अलग दिशा में बह रहे थे। इससे साफ हो गया कि यह विरोध जनता के मुद्दों पर नहीं, बल्कि आपसी राजनीतिक खींचतान का नतीजा था।
शिक्षा व्यवस्था और पेपर लीक पर संसद में उबाल
एक तरफ जहां सीईसी के मुद्दे पर सियासत गर्म थी, वहीं दूसरी तरफ देश की शिक्षा व्यवस्था और परीक्षा प्रणाली को लेकर भी बड़ा हंगामा देखने को मिला। बार-बार होने वाली परीक्षाओं की नाकामी को लेकर विपक्ष ने मोदी सरकार को आड़े हाथों लिया। विपक्षी नेताओं का कहना था कि सरकार अपनी इस बड़ी नाकामी की जिम्मेदारी दूसरों पर नहीं डाल सकती। देश के करोड़ों युवाओं का भविष्य अधर में लटका हुआ है और सरकार सिर्फ लीपापोती करने में जुटी है। युवाओं का गुस्सा इस बात को लेकर था कि उनकी मेहनत बार-बार पेपर लीक जैसी घटनाओं की भेंट चढ़ जाती है।
छात्रों के इस भारी विरोध और बढ़ते दबाव के बीच आखिरकार सरकार को सख्त कदम उठाने पड़े। संसद से पेपर लीक रोकने वाला एक बेहद कड़ा बिल पास कराया गया, ताकि इस तरह की धांधली पर लगाम लगाई जा सके। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद इस बात पर जोर दिया कि इस नए कानून के आने से देश की परीक्षा प्रणाली पर आम जनता और युवाओं का भरोसा फिर से बहाल होगा। सरकार का दावा है कि अब नकल माफियाओं और पेपर लीक कराने वालों पर बुलडोजर जैसी सख्त कार्रवाई की जाएगी, जिससे किसी भी छात्र के भविष्य के साथ खिलवाड़ न हो सके।
शिक्षा मंत्री का इस्तीफा और अंदरूनी चिट्ठी का सच
इस पूरे परीक्षा विवाद के बीच केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे और उनकी एक चिट्ठी ने सियासी तापमान को और बढ़ा दिया। धर्मेंद्र प्रधान ने अपने इस्तीफे के बाद सार्वजनिक की गई चिट्ठी में साफ लिखा कि पिछले दस दिनों से उनका मन बहुत दुखी था। उन्होंने युवाओं की भावनाओं का पूरा सम्मान करने की बात कही और अपनी नाकामी स्वीकार करते हुए पद छोड़ने का फैसला किया। इस चिट्ठी के बाहर आते ही राजनीतिक हलकों में चर्चाओं का बाजार गर्म हो गया कि सरकार के भीतर सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है।
द फ्रीलान्स की जमीनी पड़ताल से यह बात बिल्कुल साफ हो जाती है कि सीईसी के इस्तीफे का विरोध महज एक राजनीतिक स्टंट से ज्यादा कुछ नहीं था। जब कैमरे की नजर इन प्रदर्शनों के पीछे छिपे चेहरों पर पड़ी, तो असली मकसद जनता के सामने आ गया। विपक्ष जहां इस मुद्दे को भुनाने में नाकाम रहा, वहीं सरकार ने परीक्षा कानून लाकर एक बड़ा संदेश देने की कोशिश की है। आने वाले दिनों में इन राजनीतिक उठापटक का असर देश के आगामी चुनावों और चुनावी सुधारों पर पड़ना तय माना जा रहा है।







