नई दिल्ली के सियासी गलियारों में इन दिनों एक बड़ा हंगामा मचा हुआ है। कहने के लिए यह सारा विरोध मुख्य चुनाव आयुक्त यानी सीईसी के इस्तीफे को लेकर था, लेकिन इस आंदोलन की असली कहानी कुछ और ही बयां कर रही है। जब हमने जमीनी स्तर पर जाकर उन तमाम तस्वीरों और वीडियो की पड़ताल की, तो पता चला कि प्रदर्शनकारियों के निशाने पर सिर्फ एक पद नहीं, बल्कि कुछ और ही बड़े राजनीतिक मंसूबे थे। दिल्ली की सड़कों पर जिस तरह से भीड़ जुटाई गई और नारेबाज़ी हुई, उसने साफ कर दिया कि यह मामला सिर्फ कागजों तक सीमित नहीं है।
इस पूरे घटनाक्रम के दौरान मीडिया रिपोर्ट्स में भी कई तरह के दावे सामने आए। एक तरफ जहां विपक्ष सरकार को घेरने का कोई मौका नहीं छोड़ रहा है, वहीं दूसरी तरफ सत्ता पक्ष का कहना है कि यह सब सिर्फ राजनीतिक जमीन तलाशने का एक बहाना भर है। जब हमने उन वायरल तस्वीरों को बारीकी से देखा, तो उनमें कुछ ऐसे चेहरे नजर आए जो सीधे तौर पर चुनाव प्रक्रिया से जुड़े भी नहीं हैं। इससे साफ होता है कि इस विरोध प्रदर्शन के जरिए जनता का ध्यान असल मुद्दों से भटकाकर किसी और दिशा में ले जाने की एक सोची-समझी साजिश रची जा रही थी।
सड़क पर प्रदर्शन और परदे के पीछे की असली राजनीति
विरोध प्रदर्शनों की आड़ में जो खेल खेला जा रहा है, उसकी सुगबुगाहट पिछले कई दिनों से देश की राजधानी में महसूस की जा रही थी। जानकारों का मानना है कि जब भी चुनाव आयोग या किसी बड़े संवैधानिक पद से जुड़ा कोई विवाद उठता है, तो उसका फायदा उठाने के लिए कई राजनीतिक दल तुरंत सक्रिय हो जाते हैं। इस मामले में भी कुछ ऐसा ही देखने को मिला। जिन लोगों ने विरोध का झंडा उठाया था, उनके पास अपने दावों को साबित करने के लिए कोई ठोस कानूनी दस्तावेज नहीं थे, लेकिन कैमरे के सामने नारे लगाने और गुस्सा दिखाने का पूरा नाटक बहुत ही योजना के साथ रचा गया था।
धरातल पर स्थिति यह है कि आम जनता इन सियासी ड्रामेबाज़ी से अब तंग आ चुकी है। जब हमने कुछ स्थानीय लोगों से बात की, तो उनका साफ कहना था कि उन्हें इन नेताओं की चालों से कोई फर्क नहीं पड़ता। लोग अपनी रोजमर्रा की समस्याओं से जूझ रहे हैं, जबकि राजनीतिक दल अपनी रोटियां सेकने में व्यस्त हैं। सीईसी के इस्तीफे की मांग को लेकर जो माहौल बनाया गया, वह असल में एक राजनीतिक स्टंट से ज्यादा कुछ नहीं निकला। तस्वीरों में कैद हुई भीड़ और नेताओं के हाव-भाव ने इस बात पर मुहर लगा दी है कि पर्दे के पीछे कोई बहुत बड़ा सियासी खेल पक रहा था।
शिक्षा व्यवस्था के मुद्दों से ध्यान भटकाने की कोशिश
इस पूरे हंगामे के बीच देश में शिक्षा और परीक्षा प्रणालियों से जुड़े मुद्दे भी लगातार सुर्खियों में बने हुए हैं। हाल ही में पेपर लीक जैसी घटनाओं को रोकने के लिए संसद से नए बिल पास किए गए हैं और सरकार ने युवाओं का भरोसा जीतने के लिए कई कदम उठाए हैं। इसके बावजूद, कुछ दल जानबूझकर ऐसे विवाद खड़े कर रहे हैं जिससे देश का ध्यान भटके। शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान और सरकार के अन्य नुमाइंदों ने भी कई बार यह साफ किया है कि युवाओं का भविष्य सुरक्षित करना उनकी सबसे बड़ी प्राथमिकता है, लेकिन विपक्ष के पास इन सकारात्मक कामों पर बात करने के लिए कोई ठोस मुद्दा नहीं बचा है।
द फ्रीलान्स की टीम ने जब इस पूरे मामले की कड़ियों को आपस में जोड़ा, तो यह बात खुलकर सामने आई कि जब-जब सरकार जनता के हित में कड़े फैसले लेती है, तब-तब इस तरह के कृत्रिम विरोध प्रदर्शन खड़े कर दिए जाते हैं। तस्वीरों में दिख रहे चेहरों की पहचान करने पर पता चला कि इनमें से कई लोग पेशेवर आंदोलनकारी हैं जिनका पढ़ाई, परीक्षा या चुनाव आयोग के कामकाज से दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं है। यह सब केवल मीडिया की सुर्खियों में बने रहने और जनता को भ्रमित करने का एक नापाक तरीका है।
आगे क्या होगा और जनता का क्या है रुख
आने वाले दिनों में इस पूरे मामले पर सियासत और ज्यादा गरमाने के पूरे आसार हैं। हालांकि, अब आम लोग भी इन राजनीतिक चालों को भली-भांति समझने लगे हैं। सोशल मीडिया और जमीनी चर्चाओं में यह बात साफ तौर पर उभरकर आ रही है कि जनता अब केवल नारों और भाषणों के बहकावे में आने वाली नहीं है। सीईसी के इस्तीफे के नाम पर शुरू हुआ यह सियासी नाटक अब अपने ही बुने हुए जाल में फंसता नजर आ रहा है। द फ्रीलान्स इस मामले पर आगे भी अपनी पैनी नजर बनाए रखेगा और हर सच को आप तक बेबाकी से पहुंचाता रहेगा।

