सार्वजनिक वितरण प्रणाली में बड़ा बदलाव: निष्क्रिय राशन कार्डों पर कस रहा शिकंजा
देश की सबसे बड़ी कल्याणकारी योजनाओं में शुमार सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) को लेकर केंद्र सरकार ने एक बेहद अहम और सख्त फैसला लिया है। यदि आपके पास भी राशन कार्ड है और आप या आपके परिवार का कोई सदस्य लंबे समय से इसका इस्तेमाल करके सरकारी सस्ते गल्ले की दुकान से राशन नहीं ले रहे हैं, तो यह खबर आपके लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, देश भर में ऐसे करीब 1.58 करोड़ राशन कार्डों की पहचान की गई है जिनका पिछले छह महीनों से कोई उपयोग नहीं हुआ है। इन सभी कार्डों को अब तकनीकी भाषा में 'साइलेंट राशन कार्ड' की श्रेणी में रखा गया है और सरकार इनकी वास्तविकता की जांच करने जा रही है।
खाद्य और नागरिक आपूर्ति मंत्रालय से जुड़े सूत्रों के मुताबिक, इस पूरी कवायद का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि देश का बहुमूल्य खाद्यान्न केवल और केवल वास्तविक और जरूरतमंद लोगों तक ही पहुंचे। अक्सर ऐसा देखा जाता है कि लोग नौकरी या अन्य कारणों से अपना निवास स्थान बदल लेते हैं, या फिर कार्डधारक की मृत्यु हो जाने के बावजूद उसके नाम पर राशन उठता रहता है। ऐसे तमाम फर्जीवाड़े और अनियमितताओं को रोकने के लिए सरकार अब डिजिटल माध्यमों का सहारा ले रही है और डेटाबेस को पूरी तरह से दुरुस्त करने के लिए प्रतिबद्ध है।
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अचानक बंद नहीं होंगे नाम: मिलेगा मौका और पूरी करनी होगी औपचारिकताएं
आम जनता के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या बिना किसी पूर्व सूचना के उनके राशन कार्ड हमेशा के लिए रद्द कर दिए जाएंगे? इस संबंध में स्पष्ट किया गया है कि सरकार किसी भी पात्र नागरिक के अधिकार सीधे तौर पर नहीं छीनेगी। जिन कार्डों से पिछले छह महीनों में कोई अनाज नहीं खरीदा गया है, उन्हें एकदम से हटाने के बजाय कुछ समय के लिए अस्थायी रूप से निष्क्रिय किया जाएगा। इसके बाद संबंधित लाभार्थियों को अपनी पात्रता साबित करने और अपना पक्ष रखने के लिए तीन महीने का पर्याप्त समय दिया जाएगा।
इस निर्धारित तीन महीने की अवधि के दौरान कार्डधारकों को अपनी ई-केवाईसी (e-KYC) प्रक्रिया को सफलतापूर्वक पूरा करना होगा। यदि कोई व्यक्ति यह साबित कर देता है कि वह वास्तव में योजना का हकदार है और किन्हीं कारणों से वह पिछले कुछ महीनों में राशन नहीं ले पाया था, तो उसका कार्ड तुरंत बहाल कर दिया जाएगा। संशोधित 'टारगेटेड पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम (कंट्रोल) ऑर्डर' के तहत यह प्रावधान किया गया है ताकि किसी भी गरीब और बेसहारा व्यक्ति का हक न मारा जाए, साथ ही सिस्टम में मौजूद खामियों को भी दूर किया जा सके।
विशेषज्ञों की राय और जवाबदेही को लेकर उठ रहे गंभीर सवाल
सरकारी की इस नई नीति पर शिक्षाविदों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की तरफ से मिली-जुली प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। कई जानकारों का मानना है कि तकनीकी सुधार के नाम पर इस तरह के कदम उठाने से कई बार जमीनी स्तर पर जरूरतमंद लोग योजनाओं के लाभ से वंचित हो जाते हैं। अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी के जाने-माने एसोसिएट प्रोफेसर राजेंद्रन नारायणन ने इस पूरी प्रक्रिया पर तीखी आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि पहले लोगों के नाम सिस्टम से हटा देना और फिर उन्हें अपनी पात्रता साबित करने के लिए लंबी प्रशासनिक प्रक्रियाओं से गुजरने के लिए मजबूर करना पूरी तरह से अनुचित है।
"किसी व्यक्ति का नाम डेटाबेस से हटाकर उसे अपनी पहचान और पात्रता साबित करने के लिए ई-केवाईसी या अन्य तकनीकी माध्यमों से दोबारा जुड़ने के लिए कहना, असल में शासन की जवाबदेही का बोझ सीधे नागरिकों के कंधों पर डालने जैसा है। कल्याणकारी योजनाओं में हमारा रुख लोगों को बाहर करने के बजाय उन्हें शामिल करने और उनकी सहायता करने का होना चाहिए।" — राजेंद्रन नारायणन, एसोसिएट प्रोफेसर, अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी
विशेषज्ञों का तर्क है कि डिजिटल तकनीक और आधार सीडिंग के जरिए पारदर्शिता लाना तो ठीक है, लेकिन कई बार ग्रामीण इलाकों में इंटरनेट कनेक्टिविटी की समस्या या जागरूकता के अभाव में आम लोग समय पर औपचारिकताएं पूरी नहीं कर पाते हैं। ऐसे में सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि कोई भी असली लाभार्थी तकनीकी जटिलताओं की वजह से भुखमरी या राशन से वंचित होने की स्थिति में न पहुंचे।
डिजिटल इंडिया और डेटाबेस की सफाई का पुराना इतिहास
यह पहला मौका नहीं है जब केंद्र सरकार ने सार्वजनिक वितरण प्रणाली के डेटाबेस को शुद्ध करने के लिए कोई बड़ा कदम उठाया हो। इससे पहले भी आधार सीडिंग, बायोमेट्रिक सत्यापन और डिजिटाइजेशन के जरिए बड़े पैमाने पर फर्जीवाड़े रोकने का काम किया जा चुका है। खाद्य मंत्रालय द्वारा साझा किए गए पिछले आंकड़ों के अनुसार, विभिन्न डिजिटल प्रक्रियाओं के माध्यम से देश भर से लगभग 5.8 करोड़ फर्जी और डुप्लीकेट राशन कार्डों को सिस्टम से बाहर का रास्ता दिखाया गया था। मंत्रालय ने इस पूरी प्रक्रिया को 'डी-डुप्लीकेशन' अभियान का नाम दिया था।
सरकार का हमेशा से यह पक्ष रहा है कि सार्वजनिक धन का दुरुपयोग रोका जाए और यह सुनिश्चित किया जाए कि टैक्सपेयर्स के पैसों से चलने वाली इन योजनाओं का लाभ केवल पात्र नागरिकों तक ही पहुंचे। हालांकि, जैसे-जैसे सरकार इस दायरे को और सख्त कर रही है, वैसे-वैसे आम नागरिकों के लिए भी यह जरूरी हो गया है कि वे समय रहते अपने दस्तावेज अपडेट रखें और सरकार द्वारा तय किए गए नियमों का पालन करें ताकि भविष्य में किसी भी प्रकार की असुविधा से बचा जा सके।
आम नागरिकों के लिए जरूरी निर्देश और आगे की राह
यदि आप या आपके परिवार का कोई सदस्य लंबे समय से कोटे की दुकान से राशन लेने नहीं गया है, तो आपको बिल्कुल भी घबराने की जरूरत नहीं है, बशर्ते आप इस योजना के वास्तविक पात्र हों। अपनी इस सुविधा को सुरक्षित रखने के लिए आपको तुरंत अपने नजदीकी राशन डीलर या खाद्य आपूर्ति विभाग के कार्यालय से संपर्क करना चाहिए। इसके अलावा, अपने राज्य के खाद्य विभाग के पोर्टल पर जाकर ऑनलाइन माध्यम से भी अपनी ई-केवाईसी स्थिति की जांच की जा सकती है।
भविष्य में ऐसी किसी भी समस्या से बचने के लिए यह सलाह दी जाती है कि सभी राशन कार्ड धारक समय-समय पर अपने आधार कार्ड को राशन कार्ड से लिंक रखें और यदि परिवार में कोई बदलाव हुआ है तो उसकी जानकारी समय पर विभाग को दें। सरकार के इस अभियान का मुख्य उद्देश्य व्यवस्था को सुदृढ़ बनाना है, और यदि नागरिक जागरूक रहते हैं तो वे बिना किसी परेशानी के इस प्रक्रिया को पूरा कर सकते हैं और अपनी खाद्यान्न सुरक्षा सुनिश्चित कर सकते हैं।








