बिहार में महिलाओं की सुरक्षा पर उठे बड़े सवाल
देश के कई हिस्सों में कानून व्यवस्था को लेकर बहस जारी है, लेकिन इन दिनों बिहार के हालात सियासत के केंद्र में आ गए हैं। राज्य में हाल के दिनों में सामने आए आपराधिक मामलों ने आम जनता के मन में डर पैदा कर दिया है। खासकर महिलाओं और युवतियों के खिलाफ हो रही हिंसा की वारदातों ने शासन-प्रशासन के दावों की कलई खोलकर रख दी है। जमुई में एक युवती के साथ हुई बदसलूकी और उसके बाद समस्तीपुर में छेड़खानी की घटनाओं ने पूरे महकमे में खलबली मचा दी है। इन घटनाओं को लेकर विपक्षी दलों ने सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है और तीखी बयानबाजी का दौर शुरू हो गया है।
राजनीतिक गलियारों में इन वारदातों को लेकर सुगबुगाहट तेज हो गई है। विपक्षी नेताओं का कहना है कि राज्य में सुशासन के दावे केवल कागजों तक सीमित रह गए हैं, जबकि जमीन पर हालात इसके बिल्कुल उलट हैं। महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराध इस बात का प्रमाण हैं कि अपराधियों के अंदर कानून का खौफ पूरी तरह से समाप्त हो चुका है। पुलिसिया सुस्ती और प्रशासनिक ढिलाई के चलते पीड़ितों को न्याय मिलने में भी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है, जिससे आम नागरिकों में गहरी नाराजगी देखने को मिल रही है।
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राजधानी पटना बनी अपराध का गढ़: कांग्रेस का करारा हमला
कांग्रेस पार्टी ने आक्रामक रुख अपनाते हुए राजधानी पटना की कानून व्यवस्था पर सीधा प्रहार किया है। पार्टी के प्रमुख प्रवक्ताओं ने तीखे शब्दों में कहा कि पटना अब सुरक्षित शहर नहीं रहा, बल्कि यह अपराध का मुख्य केंद्र बनता जा रहा है। सड़कों पर सरेआम हो रही वारदातों ने कानून व्यवस्था की पोल खोल दी है। उन्होंने आंकड़े गिनाते हुए दावा किया कि राज्य में रोजाना हत्या जैसी गंभीर वारदातें हो रही हैं, लेकिन जिम्मेदार अधिकारी और हुक्मरान अपनी नाकामियों को छिपाने में व्यस्त हैं।
प्रवक्ता ने हालिया घटनाओं का जिक्र करते हुए कहा कि अपराधियों के हौसले इतने बुलंद हैं कि उन्हें अब पुलिस या कानून का कोई डर नहीं सता रहा है। वे बेखौफ होकर वारदातों को अंजाम दे रहे हैं और आसानी से फरार हो रहे हैं। राजधानी जैसे सुरक्षित माने जाने वाले इलाके में भी लोग खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। इस स्थिति ने सरकार की प्राथमिकताओं पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं कि आखिर जनता को सुरक्षित माहौल देने का वादा कब पूरा होगा।
अपराधियों में पुलिस का खौफ हुआ छूमंतर
राज्य की कानून व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए विपक्षी नेताओं ने पुलिस महकमे की कार्यप्रणाली पर भी जोरदार तंज कसा है। उनका कहना है कि आज के समय में अपराधी इतने बेखौफ हो चुके हैं कि उन्हें वारदातों को अंजाम देने के लिए किसी बड़ी योजना या संसाधनों की भी जरूरत नहीं महसूस होती। वे साधारण तरीके से आते हैं, घटना को अंजाम देते हैं और आराम से निकल जाते हैं। पुलिस की गश्त और खुफिया तंत्र की विफलता के कारण अपराधियों के हौसले आसमान छू रहे हैं।
एक तीखा बयान देते हुए कांग्रेस के वरिष्ठ नेता ने कहा,
"यह बात सिर्फ जमुई या समस्तीपुर तक सीमित नहीं है, बल्कि मुजफ्फरपुर जा रही छात्रा ने जब छेड़खानी का विरोध किया तो उसे चाकू से गोद दिया गया। जब राजमहल में दुर्योधन बैठेंगे, तो चौक चौराहों पर दुशासन चीरहरण ही करेंगे। आज बिहार की जनता खुद को पूरी तरह असहाय महसूस कर रही है और सरकार गहरी नींद में सोई हुई है।" — असित नाथ तिवारी, कांग्रेस प्रवक्ता
इस प्रकार के बयानों से राज्य का सियासी पारा काफी चढ़ गया है। सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर चरम पर पहुंच चुका है। जनता भी अब यह सोचने पर मजबूर हो गई है कि आखिर इन हालात से कब निजात मिलेगी और कब उन्हें भयमुक्त जीवन जीने का अवसर प्राप्त होगा।
सबूतों के अभाव में थप पड़ जाती है पुलिसिया कार्रवाई
अपराध नियंत्रण के दावों की असलियत तब सामने आती है जब पीड़ित न्याय के लिए थानों के चक्कर काटते हैं। कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि बिहार पुलिस की कार्यशैली ऐसी हो चुकी है कि बिना पुख्ता डिजिटल सबूत या सीसीटीवी फुटेज के थानों में मामले दर्ज करना भी एक कठिन चुनौती बन गया है। यदि घटना का कोई वीडियो या डिजिटल साक्ष्य उपलब्ध नहीं है, तो पीड़ित परिवार दर-दर भटकने को मजबूर हो जाते हैं और कई मामले तो अज्ञात में ही बंद कर दिए जाते हैं।
इस तरह की व्यवस्था से आम जनता का पुलिस प्रशासन पर से भरोसा तेजी से उठ रहा है। न्याय पाने की उम्मीद लेकर थाने पहुंचने वाले लोगों को जब निराशा मिलती है, तो उनका आक्रोश और अधिक बढ़ जाता है। विश्लेषकों का मानना है कि यदि समय रहते पुलिस और प्रशासनिक व्यवस्था में सुधार नहीं किया गया, तो आने वाले दिनों में यह स्थिति सरकार के लिए और अधिक बड़ी मुसीबत बन सकती है। जनता अब सिर्फ आश्वासनों से संतुष्ट होने वाली नहीं है, बल्कि वह जमीन पर ठोस बदलाव चाहती है।







