रिफंड के नाम पर दूसरा धोखा: कैसे जालसाजों ने बनाया नया हथियार
देशभर में डिजिटल ठगी के मामले लगातार बढ़ते जा रहे हैं, लेकिन अब इन अपराधियों ने एक ऐसा खतरनाक रास्ता चुन लिया है जो हैरान करने वाला है। जो लोग पहले से ही साइबर ठगी का शिकार होकर अपनी मेहनत की कमाई गंवा चुके हैं, ये शातिर उन्हें दोबारा अपना निशाना बना रहे हैं। ठगी का शिकार हुए लोगों को यह उम्मीद होती है कि उनकी डूबी हुई रकम शायद वापस मिल जाएगी, और इसी उम्मीद का फायदा ये अपराधी उठा रहे हैं। वे पीड़ितों से संपर्क कर उनकी रकम रिफंड कराने का झांसा देते हैं और फिर एक नई ठगी को अंजाम देते हैं।
इस सनसनीखेज मामले का खुलासा हाल ही में पुलिस की विशेष कार्रवाई के दौरान हुआ। अपराधियों ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल कर लोगों को अपने जाल में फंसाना शुरू किया था। वे खुद को केंद्रीय एजेंसियों और पुलिस के बड़े अधिकारी बताकर लोगों का विश्वास जीतते थे। जब पीड़ित उनके झांसे में आ जाते थे, तो उनसे सत्यापन शुल्क या प्रक्रिया के नाम पर और पैसे ट्रांसफर करवा लिए जाते थे।
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फेसबुक और व्हाट्सएप पर तैयार किया गया था फर्जी तंत्र
इस पूरे खेल को अंजाम देने के लिए जालसाजों ने बाकायदा एक नेटवर्क तैयार किया था। वे फेसबुक और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर दिल्ली पुलिस और दिल्ली साइबर क्राइम ब्रांच के नाम से फर्जी अकाउंट और आईडी चलाते थे। इन फर्जी प्रोफाइल के जरिए वे उन लोगों की तलाश करते थे जो पहले कभी ऑनलाइन धोखाधड़ी का शिकार हो चुके हैं। पीड़ितों से संपर्क साधने के बाद उन्हें वाट्सएप पर फर्जी दस्तावेज, पुलिस के लेटर पैड और डिजिटल परिचय पत्र भेजे जाते थे ताकि सामने वाले को पूरी तरह पुख्ता भरोसा हो जाए।
भरोसा जीतने के बाद शातिर लोग रिफंड की प्रक्रिया शुरू करने के नाम पर अलग-अलग तरह के शुल्क, टैक्स या वेरिफिकेशन फीस मांगने लगते थे। इसके लिए वे पीड़ितों को क्यूआर कोड भेजते थे और जैसे ही पीड़ित उस कोड के जरिए रकम ट्रांसफर करते थे, आरोपी तुरंत उन्हें ब्लॉक कर देते थे। इस तरह एक ही व्यक्ति को दो बार ठगी का शिकार बनाया जाता था, और उसे संभलने का मौका तक नहीं मिलता था।
पुलिस की रडार पर आए शातिर, सात गिरफ्तार और भारी मात्रा में सामान जब्त
मामले की गंभीरता को देखते हुए स्थानीय पुलिस ने तकनीकी निगरानी और पुख्ता साक्ष्यों के आधार पर इस गिरोह के खिलाफ बड़ा अभियान चलाया। पुलिस टीम ने जालसाजों के ठिकानों पर दबिश देकर सात प्रमुख आरोपियों को धर दबोचा। पकड़े गए आरोपियों की पहचान धीरज शर्मा, युवराज वर्मा, राजवीर सिंह, गोविंद प्रताप सिंह, राहुल कैरवाल, गुलशन सिंह चौहान और रूप शेखावत के रूप में हुई है। ये सभी आरोपी जयपुर और आसपास के इलाकों के रहने वाले बताए जा रहे हैं।
"साइबर अपराध के पीड़ितों को रिफंड दिलाने के नाम पर ठगी करने वाले इस गिरोह ने अब तक सैकड़ों लोगों को अपना शिकार बनाया है। आरोपियों के कब्जे से डिजिटल साक्ष्य और अन्य सामग्रियां बरामद की गई हैं, जिनकी तकनीकी जांच की जा रही है।" — प्रशांत किरण, डीसीपी (पश्चिम)
पुलिस ने आरोपियों के पास से 11 मोबाइल फोन, 16 सिम कार्ड, पांच एटीएम कार्ड, दो बैंक चेक बुक और दो लग्जरी कारें बरामद की हैं। प्रारंभिक पूछताछ में यह बात सामने आई है कि इस गिरोह ने अब तक 500 से अधिक लोगों को अपनी ठगी का शिकार बनाया है। पुलिस अब इनके बैंक खातों और अन्य सहयोगियों की तलाश में जुटी है ताकि इस पूरे नेटवर्क की जड़ तक पहुंचा जा सके।
म्यूल खातों का काला कारोबार और देशव्यापी नेटवर्क
जांच में यह भी खुलासा हुआ है कि साइबर ठगी की इस पूरी प्रक्रिया में केवल एक गिरोह शामिल नहीं है, बल्कि इसके तार देश के कई अन्य राज्यों से जुड़े हुए हैं। ठगी की गई रकम को सीधे मुख्य सरगना के खाते में जाने के बजाय कमीशन के लालच में अन्य लोगों के खातों में भेजा जाता है, जिन्हें म्यूल अकाउंट कहा जाता है। हाल ही में पुलिस ने विश्वकर्मा थाना क्षेत्र से एक ऐसे ही व्यक्ति को गिरफ्तार किया जिसने कमीशन के लालच में अपना बैंक खाता साइबर अपराधियों को उपलब्ध कराया था। ऐसे खातों में लाखों रुपए के संदिग्ध लेन-देन का खुलासा हुआ है।
देश के विभिन्न हिस्सों जैसे अलवर, नासिक, चंडीगढ़, बंगाल बॉर्डर और अन्य इलाकों से इस तरह के नेटवर्क संचालित होने के प्रमाण मिले हैं। पुलिस और केंद्रीय एजेंसियां इन खातों की कड़ियों को आपस में जोड़ने का प्रयास कर रही हैं। हालांकि, करोड़ों रुपए होल्ड भी कराए गए हैं, लेकिन कानूनी प्रक्रियाओं के चलते पीड़ितों को वह रकम वापस मिलने में समय लगता है।
आम जनता के लिए जरूरी चेतावनी और बचाव के उपाय
इस तरह की घटनाओं से यह साफ हो जाता है कि साइबर अपराधी आम आदमी की हर कमजोरी और उम्मीद का फायदा उठाने के लिए तैयार बैठे हैं। पुलिस और साइबर विशेषज्ञों ने स्पष्ट रूप से अपील की है कि यदि कोई व्यक्ति ऑनलाइन धोखाधड़ी का शिकार हो जाता है, तो उसे सोशल मीडिया पर मिलने वाले रिफंड के दावों पर कभी भरोसा नहीं करना चाहिए। न तो दिल्ली पुलिस और न ही कोई अन्य साइबर क्राइम ब्रांच सोशल मीडिया के माध्यम से संपर्क कर पैसे जमा कराने के लिए कहती है।
यदि आपके साथ किसी भी प्रकार की वित्तीय धोखाधड़ी होती है, तो तुरंत आधिकारिक राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल पर जाएं या फिर साइबर हेल्पलाइन नंबर 1930 पर बिना किसी देरी के अपनी शिकायत दर्ज कराएं। जितनी जल्दी शिकायत दर्ज कराई जाएगी, ठगी गई रकम को बैंक स्तर पर होल्ड कराकर वापस पाने की संभावना उतनी ही अधिक होगी। सतर्कता ही इस दौर में साइबर अपराधियों से बचने का सबसे बड़ा उपाय है।







