मासूम बच्ची की गुहार और अदालत का संवेदनशील फैसला
देश की राजधानी से एक बेहद झकझोर देने वाला और मानवीय संवेदनाओं को छूने वाला मामला सामने आया है। अपने ही एक रिश्तेदार की दरिंदगी का शिकार बनी एक दस साल की बच्ची ने अदालत से जो गुहार लगाई, उसने सबको हिलाकर रख दिया। इस नन्ही पीड़िता ने दिल्ली हाईकोर्ट के सामने अपनी बात रखते हुए कहा कि जिस शख्स को वह भरोसे के साथ 'अंकल' कहकर पुकारती थी, उसे तब तक जेल की सलाखों के पीछे रखा जाए जब तक वह बूढ़ा न हो जाए। बच्ची की इस मासूम लेकिन दर्द से भरी पुकार ने न्यायपालिका को गहराई से प्रभावित किया।
अदालत ने इस मामले की गंभीरता को समझते हुए कानूनी दांवपेच से इतर जाकर पूरी संवेदनशीलता के साथ फैसला सुनाया। ट्रायल कोर्ट से लेकर हाईकोर्ट तक ने इस बात पर जोर दिया कि इस तरह के जघन्य अपराध करने वाले अपराधियों के लिए नरमी की कोई गुंजाइश नहीं होनी चाहिए। बच्ची के जख्मों पर मरहम लगाने के लिए अदालत ने न सिर्फ सख्त सजा तय की, बल्कि उसके भविष्य और पुनर्वास को ध्यान में रखते हुए वित्तीय सहायता यानी मुआवजे को भी सुनिश्चित किया है।
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जज का वह खास खत जिसे पढ़कर किसी का भी दिल पसीज जाए
रोहिणी स्थित एडिशनल सेशंस जज (पॉक्सो कोर्ट) रजनी रंगा ने अपने फैसले के अंत में कानूनी शब्दावली के भारी-भरकम शब्दों को दरकिनार करते हुए सीधे उस पीड़ित बच्ची को संबोधित करते हुए एक पत्र लिखा। यह संदेश उस बच्ची के भीतर जीने की उम्मीद जगाने और उसे यह अहसास कराने के लिए था कि देश का कानून और न्याय व्यवस्था उसके साथ पूरी मजबूती से खड़ी है। इस खत में लिखी गई हर एक पंक्ति में एक जज के भीतर छिपी ममता और न्याय के प्रति निष्ठा साफ झलकती है।
अदालत के इस अनूठे कदम की चहुंओर सराहना हो रही है, क्योंकि अक्सर अदालती फैसले आम लोगों की समझ से बाहर होते हैं और उनमें भावनाओं के लिए कोई जगह नहीं होती। लेकिन इस मामले में न्याय की देवी की आंखों पर बंधी पट्टी के पीछे एक मानवीय चेहरा भी दिखाई दिया, जिसने बच्ची के आंसुओं को पोछने की एक ईमानदार कोशिश की है। यह फैसला इस बात की मिसाल है कि न्याय केवल सजा देना नहीं, बल्कि पीड़ित के टूटे हुए भरोसे को वापस जोड़ना भी है।
दिल्ली हाईकोर्ट का कड़ा निर्देश: दो हफ्ते में बच्ची तक पहुंचे संदेश और मुआवजा
मामले की सुनवाई करते हुए दिल्ली हाईकोर्ट की बेंच ने नॉर्थ-वेस्ट दिल्ली डिस्ट्रिक्ट लीगल सर्विसेज अथॉरिटी (DLSA) को बहुत स्पष्ट निर्देश जारी किए हैं। अदालत ने कहा है कि जज द्वारा लिखे गए इस विशेष संदेश को विधिवत प्रिंट किया जाए और मुआवजे की तयशुदा राशि के साथ इसे सीधे बच्ची तथा उसके परिवार तक पहुंचाया जाए। यह प्रक्रिया अगले दो हफ्तों के भीतर पूरी करने के सख्त आदेश दिए गए हैं, ताकि पीड़िता को समय पर राहत मिल सके।
न्यायमूर्ति प्रतिभा एम. सिंह और न्यायमूर्ति दिनेश भुट्ट की बेंच ने स्पष्ट किया कि इस मामले में किसी भी स्तर पर लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी। अदालत ने दोषी की सजा पर रोक लगाने या उसे जमानत पर रिहा करने की किसी भी याचिका को सिरे से खारिज कर दिया। अदालत का मानना है कि उपलब्ध फोरेंसिक और अन्य पुख्ता सबूतों को देखते हुए इस स्तर पर आरोपी को कोई राहत देना न्याय के हित में नहीं होगा।
घटना की पृष्ठभूमि और सात साल की बच्ची का वह काला दिन
यह दर्दनाक वाकया 23 जुलाई 2023 का है, जब यह बच्ची महज सात साल की थी। उस समय उसकी नासमझी का फायदा उठाकर उसके ही एक करीबी रिश्तेदार सुमित शाक्य ने उसके साथ गंभीर यौन उत्पीड़न किया और उसे डराया-धमकाया। आज वह बच्ची दस साल की हो चुकी है, लेकिन उस घटना का काला साया आज भी उसके मन में डर बनकर बैठा है। अदालत ने इस बात का खास संज्ञान लिया कि इतनी कम उम्र में इस तरह की त्रासदी झेलने वाले बच्चे पर इसका मानसिक रूप से कितना गहरा और दूरगामी असर पड़ता है।
ट्रायल कोर्ट ने मामले की सुनवाई पूरी करते हुए दोषी को पॉक्सो एक्ट के तहत उम्रकैद यानी शेष जीवन के लिए कठोर कारावास और एक लाख रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई। इसके अलावा आपराधिक धमकी के आरोप में पांच साल की अतिरिक्त सजा और बीस हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया गया है। अदालत ने यह भी साफ किया कि दोनों सजाएं एक साथ चलेंगी, जिससे दोषी को कानून के शिकंजे से बचने का कोई मौका न मिले।
मुआवजे की राशि और आगे की कानूनी कार्यवाही पर नजर
न्यायालय ने पीड़िता और उसके परिवार की पीड़ा, अपराध की भयावहता तथा बच्चे के भविष्य पर पड़ने वाले मनोवैज्ञानिक प्रभावों का आकलन करते हुए कुल 10.50 लाख रुपये का मुआवजा निर्धारित किया है। दिल्ली हाईकोर्ट ने डीएलएसए के सचिव से इस मुआवजे के भुगतान की वर्तमान स्थिति पर विस्तृत रिपोर्ट भी तलब की है। अदालत इस मामले की निगरानी बेहद बारीकी से कर रही है ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि पीड़िता के परिवार को समय पर आर्थिक मदद मिल सके।
आगामी सुनवाई के संबंध में अदालत ने तारीखें भी तय कर दी हैं। डीएलएसए की स्टेटस रिपोर्ट पर अब इस मामले की अगली सुनवाई 4 नवंबर 2026 को होगी, जबकि मुख्य आपराधिक अपील पर विस्तृत सुनवाई 20 जनवरी 2027 के लिए सूचीबद्ध की गई है। न्यायिक गलियारों में इस फैसले को बच्चों के खिलाफ होने वाले अपराधों में संवेदनशीलता और सख्ती का एक अनूठा संतुलन माना जा रहा है।
"जिसे तुम 'अंकल' कहती थी, वह अब कानून के शिकंजे में है और उसे तब तक सलाखों के पीछे रहना होगा जब तक वह बूढ़ा नहीं हो जाता। न्याय तुम्हारी रक्षा के लिए हमेशा खड़ा है, तुम्हें डरने की कोई जरूरत नहीं है।" — विशेष संदेश, ट्रायल कोर्ट और दिल्ली हाईकोर्ट
यह फैसला समाज के लिए एक बड़ा संदेश है कि बच्चों की सुरक्षा से खिलवाड़ करने वालों को बख्शा नहीं जाएगा। न्यायपालिका ने न केवल कानून का डंडा चलाया है, बल्कि पीड़ित बच्ची के सिर पर हाथ रखकर उसे यह भरोसा भी दिलाया है कि पूरा समाज और कानून उसके साथ है।





