विरोध प्रदर्शनों के बीच क्यों गायब हो जाते हैं खाकी वर्दी पर लगे नाम के बैज?
राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर पर जब भी कोई बड़ा राजनीतिक आंदोलन या विरोध प्रदर्शन होता है, तो वहां तैनात सुरक्षा बलों की गतिविधियां सुर्खियों में आ जाती हैं। हाल ही के महीनों में नीट पेपर लीक के विरोध में हुआ प्रदर्शन हो या फिर मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ विपक्ष का आंदोलन, इन सभी आयोजनों के दौरान एक बात बेहद आम रही कि ड्यूटी पर तैनात कई पुलिसकर्मियों और त्वरित कार्रवाई बल (आरएएफ) के जवानों की वर्दी से उनके नाम वाले बैज यानी नेम प्लेट नदारद मिले। जब मीडियाकर्मियों या वीडियो बनाने वाले कंटेंट क्रिएटर्स ने इन सुरक्षाकर्मियों से इस बारे में सवाल किया, तो उन्हें या तो कोई स्पष्ट जवाब नहीं मिला या फिर गोलमोल बातें सुनने को मिलीं।
कई जवानों ने अनजाने में बैज गिर जाने की बात कही, तो कुछ ने इसे महज एक चूक बताया। हालांकि, आम नागरिकों और पत्रकारों के मन में यह सवाल लगातार बना हुआ था कि आखिर देश की सबसे सुरक्षित मानी जाने वाली राजधानी की पुलिस अपनी पहचान छिपाने के लिए मजबूर क्यों है। इस रहस्य से पर्दा उठाते हुए अब दिल्ली पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों ने इसके पीछे की असली वजहों का खुलकर खुलासा किया है। अधिकारियों का मानना है कि यह कोई प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि सोची-समझी रणनीति का एक हिस्सा है जिसे बदलते हालातों और सोशल मीडिया के दौर को ध्यान में रखकर अपनाया गया है।
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सोशल मीडिया पर मिल रही धमकियों और टार्गेटिंग से बचाव की रणनीति
पुलिस अधिकारियों के अनुसार, इन दिनों सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स का दायरा और प्रभाव इतना बढ़ गया है कि किसी भी घटना या एक्शन को रातों-रात सनसनीखेज बना दिया जाता है। कुछ समय पहले संसद मार्ग के नजदीक हुए एक प्रदर्शन के दौरान स्थिति को नियंत्रित करने के लिए पुलिस को हल्का बल प्रयोग करना पड़ा था। उस घटना के बाद से ही सोशल मीडिया पर व्यक्तिगत रूप से पुलिसकर्मियों को निशाना बनाने का सिलसिला शुरू हो गया था। ड्यूटी पर तैनात जवानों की तस्वीरें और वीडियो वायरल करके उन पर दबाव बनाने की कोशिश की गई, जिससे उनका निजी जीवन भी प्रभावित होने लगा था।
अधिकारियों ने बताया कि जब इंटरनेट पर किसी पुलिसकर्मी का नाम सार्वजनिक हो जाता है, तो ट्रोलर्स और कुछ खास विचारधारा के लोग उसके परिवार और बच्चों तक को निशाना बनाने लगते हैं। इस प्रकार की ऑनलाइन हरैस्मेंट और धमकियों से अपने बल के मनोबल को बचाने के लिए ही उच्च स्तर पर यह फैसला लिया गया कि संवेदनशील प्रदर्शनस्थलों पर ड्यूटी करते समय सुरक्षाकर्मी अपनी नेम प्लेट हटाकर रख सकते हैं। इससे किसी भी जवान को व्यक्तिगत रूप से सोशल मीडिया पर आसानी से ढूंढ पाना असंभव हो जाता है और वे बिना किसी मानसिक दबाव के अपना पेशेवर दायित्व निभा सकते हैं।
वरिष्ठ अधिकारियों और जूनियर जवानों के लिए तय किए गए अलग-अलग नियम
इस पूरी व्यवस्था के तहत सुरक्षा बलों के भीतर भी स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं। जंतर-मंतर और अन्य धरनास्थलों पर तैनात किए जाने वाले पुलिस बल में वरिष्ठ और कनिष्ठ अधिकारियों के लिए अलग दृष्टिकोण अपनाया जा रहा है। जहां एक ओर कई वरिष्ठ आईपीएस और डीसीपी स्तर के अधिकारी अपनी पहचान छिपाए बिना अपने नेम टैग के साथ ड्यूटी पर नजर आते हैं, क्योंकि उन्हें सार्वजनिक जीवन में लोग पहले से ही पहचानते हैं, वहीं दूसरी ओर कनिष्ठ स्तर के पुलिसकर्मियों और जवानों को बिना नेम प्लेट के तैनात रहने की छूट दी गई है।
"अगर कोई पुलिसकर्मी अपनी ड्यूटी पूरी ईमानदारी और विधि के अनुसार निभा रहा है, तो उसका नाम लिखा हुआ हो या न हो, इससे कामकाज पर कोई असर नहीं पड़ता। हमारा मुख्य उद्देश्य कानून व्यवस्था बनाए रखना और हमारे कर्मियों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है।"— वरिष्ठ पुलिस अधिकारी, दिल्ली पुलिस
अधिकारियों का यह भी कहना है कि कई बार राजनीतिक रैलियों या विरोध प्रदर्शनों में शामिल होने वाले कुछ लोग या सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स जानबूझकर पुलिसकर्मियों के नाम नोट करते हैं ताकि बाद में उन्हें कानूनी या सामाजिक रूप से प्रताड़ित किया जा सके। इस प्रकार की सुनियोजित कोशिशों को नाकाम करने के लिए ही नेम प्लेट हटाने का यह व्यावहारिक कदम उठाया गया है ताकि बल के जवान बिना किसी डर के निष्पक्ष तरीके से कानून का पालन करा सकें।
संवेदनशील इलाकों की तर्ज पर राजधानी में भी सुरक्षा प्रोटोकॉल में बदलाव
सुरक्षा बलों द्वारा अपनी पहचान छिपाने का यह कोई पहला मामला नहीं है। देश के अति-संवेदनशील और आतंकवाद या नक्सलवाद प्रभावित क्षेत्रों जैसे कि छत्तीसगढ़ के बस्तर, झारखंड के कुछ हिस्से और जम्मू-कश्मीर में तैनात सुरक्षा बल के जवान हमेशा से ही अपनी सुरक्षा को सर्वोपरि रखते हुए बिना नाम वाले बैज या बिना पहचान के ड्यूटी करते आए हैं। वहां यह सुरक्षा का एक अनिवार्य हिस्सा माना जाता है ताकि उग्रवादी या असामाजिक तत्व किसी विशेष जवान को व्यक्तिगत रूप से निशाना न बना सकें।
अब इसी तर्ज पर देश की राजधानी दिल्ली में भी कानून-व्यवस्था की ड्यूटी के दौरान इस सुरक्षा प्रोटोकॉल को धीरे-धीरे अपनाया जाने लगा है। जानकारों का मानना है कि जैसे-जैसे डिजिटल युग में सोशल मीडिया का दुरुपयोग बढ़ रहा है, वैसे-वैसे पुलिस प्रशासन को भी अपने कर्मियों की सुरक्षा के लिए पारंपरिक तौर-तरीकों में बदलाव करने पड़ रहे हैं। आने वाले दिनों में जब भी जंतर-मंतर या अन्य स्थानों पर बड़े राजनीतिक प्रदर्शन आयोजित होंगे, तब सुरक्षा बलों की यह रणनीति एक स्थायी सुरक्षा कवच के रूप में नजर आ सकती है, जिससे जवानों का मानसिक तनाव कम होगा और वे अधिक पेशेवर ढंग से भीड़ को नियंत्रित कर सकेंगे।








