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सावधान! डिजिटल अरेस्ट के नाम पर हो रही है खतरनाक ठगी: 20 से ज्यादा बैंकों में खपाए जा रहे पीड़ितों के पैसे

देशभर में साइबर ठगों ने 'डिजिटल अरेस्ट' के जरिए ठगी का नया जाल फैलाया है। पीड़ितों से ठगी गई रकम को एक साथ 20 से अधिक अलग-अलग बैंकों के खातों में ट्रांसफर कर ठिकाने लगाया जा रहा है, जिससे पुलिस और जांच एजेंसियों के लिए ट्रैक करना मुश्किल हो रहा है।
The Freelance ब्यूरो
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22 सितंबर 2026 • अपडेटेड
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सावधान! डिजिटल अरेस्ट के नाम पर हो रही है खतरनाक ठगी: 20 से ज्यादा बैंकों में खपाए जा रहे पीड़ितों के पैसे
📷 सावधान! डिजिटल अरेस्ट के नाम पर हो रही है खतरनाक ठगी: 20 से ज्यादा बैंकों में खपाए जा रहे पीड़ितों के पैसे — मुख्य घटनाक्रमफोटो साभार: रॉयटर्स / एजेंसीज़ / सोशल मीडिया

खबर की बड़ी बातें (Key Highlights)

  • डिजिटल अरेस्ट के जरिए होने वाली ठगी में अपराधी अब एक से अधिक यानी 20 से ज्यादा बैंकों के खातों का इस्तेमाल कर रहे हैं।
  • ठगी की रकम को तुरंत अलग-अलग लेयर्स में बांटकर एटीएम, क्रिप्टो या अन्य माध्यमों से निकाल लिया जाता है।
  • सुरक्षा एजेंसियों और आरबीआई के निर्देशों के बाद साइबर पुलिस ऐसे संदिग्ध खातों पर शिकंजा कसने के लिए विशेष अभियान चला रही है।

डिजिटल अरेस्ट का नया जाल: कैसे आम नागरिकों को बनाया जा रहा है निशाना

साइबर अपराध के मामलों में इन दिनों 'डिजिटल अरेस्ट' (Digital Arrest) सबसे खतरनाक और नया हथियार बनकर उभरा है। ठग खुद को सीबीआई, कस्टम, नारकोटिक्स या सुप्रीम कोर्ट का अधिकारी बताकर आम नागरिकों को फोन या वीडियो कॉल करते हैं। इसके बाद उन्हें डराया जाता है कि उनके नाम पर कोई अवैध पार्सल आया है, बैंक खाता मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़ा है या फिर उनके खिलाफ कोई गंभीर वारंट जारी हुआ है। डर के मारे लोग मानसिक रूप से टूट जाते हैं और ठगों के जाल में फंस जाते हैं।

इस पूरी प्रक्रिया में शातिर अपराधी इस तरह का माहौल बनाते हैं कि पीड़ित को घर से बाहर निकलने या किसी से सलाह लेने का मौका तक नहीं मिलता। वे वीडियो कॉल पर बने रहने का निर्देश देते हैं और लगातार निगरानी का नाटक करते हैं। जब पीड़ित पूरी तरह दहशत में आ जाता है, तो उससे विभिन्न मामलों की जांच या सेटलमेंट के नाम पर भारी-भरकम रकम ट्रांसफर करवा ली जाती है। यह अपराध का एक ऐसा रूप है जिसमें शारीरिक कैद के बिना ही इंसान को मानसिक रूप से बंधक बना लिया जाता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के अपराधों में लगातार इजाफा होने की मुख्य वजह लोगों में कानून का डर और तकनीकी जानकारी का अभाव है। ठग तकनीकी रूप से इतने एडवांस हो चुके हैं कि वे हूबहू असली पुलिस थानों या दफ्तरों जैसे सेट-अप का वीडियो कॉल पर इस्तेमाल करते हैं। ऐसे में आम आदमी के लिए यह पहचानना मुश्किल हो जाता है कि कौन असली अधिकारी है और कौन साइबर ठग।

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20 से अधिक बैंकों में पहुंचाई जा रही है ठगी की रकम

साइबर अपराधियों ने अब अपनी कार्यप्रणाली में बड़ा बदलाव किया है। वे ठगी की गई रकम को सीधे एक खाते में मंगवाने के बजाय तुरंत कई हिस्सों में बांट देते हैं। हाल ही में सामने आए मामलों से पता चला है कि एक ही पीड़ित से ऐंठे गए पैसे को एक साथ 20 से अधिक अलग-अलग बैंकों के खातों में ट्रांसफर किया जाता है। इसके लिए फर्जी दस्तावेजों के आधार पर खोले गए म्यूल अकाउंट्स (Mule Accounts) का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया जा रहा है।

जब इतनी बड़ी संख्या में बैंक खातों का इस्तेमाल किया जाता है, तो पैसों की ट्रेल (Money Trail) को ट्रैक करना जांच एजेंसियों के लिए बेहद जटिल हो जाता है। पुलिस जब तक एक खाते की जानकारी जुटाकर उसे फ्रीज करती है, तब तक पैसे कई अन्य खातों से होते हुए एटीएम के जरिए निकाले जा चुके होते हैं या क्रिप्टो करेंसी में बदले जा चुके होते हैं। अपराधियों का यह नेटवर्क देश के अलग-अलग राज्यों और यहां तक कि सीमावर्ती इलाकों में फैले खातों का उपयोग करता है।

बैंकिंग और साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, इतनी बड़ी संख्या में खातों का उपयोग यह साबित करता है कि इसके पीछे एक संगठित गिरोह काम कर रहा है। इसमें कुछ ऐसे लोग भी शामिल होते हैं जो मामूली कमीशन के लालच में अपने बैंक खाते साइबर ठगों को इस्तेमाल करने के लिए दे देते हैं। बैंक और वित्तीय संस्थान अब ऐसे संदिग्ध ट्रांजैक्शन और अचानक सक्रिय हुए खातों पर पैनी नजर रख रहे हैं ताकि समय रहते इन्हें रोका जा सके।

"डिजिटल अरेस्ट जैसी कोई भी कानूनी प्रक्रिया देश के कानून में मौजूद नहीं है। कोई भी सरकारी एजेंसी या पुलिस कभी भी वीडियो कॉल पर पूछताछ या पैसों का लेन-देन नहीं करती। यदि आपके पास ऐसा कोई कॉल आता है, तो तुरंत डरने के बजाय स्थानीय पुलिस या साइबर हेल्पलाइन पर सूचना दें।" — साइबर सेल के वरिष्ठ अधिकारी

जांच एजेंसियों के सामने क्यों आ रही है बड़ी चुनौती?

डिजिटल अरेस्ट के मामलों की जांच करना पुलिस और साइबर सेल के लिए एक बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। इसका सबसे बड़ा कारण अपराधियों द्वारा अपनाई जाने वाली हाई-टेक तकनीक है। वे वर्चुअल प्राइवेट नेटवर्क (VPN), फर्जी आईपी पते और विदेश आधारित कम्यूनिकेशन ऐप्स का उपयोग करते हैं, जिससे उनकी असली लोकेशन का पता लगाना बहुत कठिन हो जाता है। इसके अलावा, जिन खातों में पैसे ट्रांसफर किए जाते हैं, वे अक्सर गरीब या भोले-भाले लोगों के नाम पर होते हैं जिन्हें पता ही नहीं होता कि उनके खातों का इस्तेमाल गलत काम के लिए हो रहा है।

अधिकारियों का कहना है कि जब तक पीड़ित साइबर हेल्पलाइन नंबर (1930) पर कॉल करता है या शिकायत दर्ज कराता है, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। कई मामलों में पीड़ित बदनामी के डर से या मानसिक सदमे के कारण तुरंत शिकायत दर्ज नहीं कराते, जिससे अपराधियों को सबूत मिटाने का पूरा मौका मिल जाता है। राज्यों की पुलिस अब राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल (NCRP) के जरिए अन्य राज्यों की पुलिस के साथ मिलकर इन गिरोहों के इंटर-स्टेट नेटवर्क को तोड़ने का प्रयास कर रही है।

इसके बावजूद, समन्वय की कमी और तकनीकी जटिलताओं के कारण रिकवरी रेट अभी भी पूरी तरह संतोषजनक नहीं कहा जा सकता। यही वजह है कि सरकार और रिजर्व बैंक लगातार जन-जागृति अभियान चला रहे हैं ताकि लोग पहले ही सतर्क हो जाएं और इस तरह के ठगों के झांसे में आने से बच सकें।

बचाव के उपाय: कैसे रखें अपने बैंक खातों और खुद को सुरक्षित?

इस तरह की ठगी से बचने का सबसे बड़ा उपाय जागरूकता और सतर्कता है। यदि आपके पास कभी भी ऐसा फोन या वीडियो कॉल आए जिसमें आपको गिरफ्तार करने की धमकी दी जा रही हो या किसी मामले में पैसे मांगे जा रहे हों, तो सबसे पहले शांत रहें और कॉल काट दें। याद रखें कि देश की कोई भी कोर्ट, सीबीआई, ईडी या पुलिस कभी भी स्काइप, व्हाट्सएप या किसी अन्य वीडियो कॉलिंग ऐप पर जांच या पूछताछ नहीं करती है।

यदि आपके साथ कभी ऐसा हादसा हो जाए या आप अनजाने में ठगी का शिकार हो जाएं, तो घबराएं नहीं। तुरंत राष्ट्रीय साइबर क्राइम हेल्पलाइन नंबर 1930 पर कॉल करें या आधिकारिक वेबसाइट cybercrime.gov.in पर जाकर अपनी शिकायत दर्ज कराएं। घटना के शुरुआती कुछ घंटों (जिन्हें 'गोल्डन ऑवर' कहा जाता है) के भीतर शिकायत करने पर ठगी गई रकम को होल्ड कराने की संभावना सबसे ज्यादा होती है। इसके अलावा, अपने बैंक खातों की गोपनीय जानकारी, ओटीपी या पासवर्ड किसी के साथ भी साझा न करें।

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