नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — भारतीय चुनाव आयोग को लेकर देश का सियासी तापमान अचानक चढ़ गया है। चुनाव प्रक्रिया और मतदाता सूची को लेकर चारों तरफ से सवाल उठ रहे हैं। आयोग ने अब मतदाता सूची से नाम कटवाने के नियमों में बड़ा बदलाव किया है। फॉर्म-7 के थोक इस्तेमाल पर आयोग ने कड़ा पहरा बैठा दिया है। राजनीतिक दलों द्वारा एक साथ सैकड़ों नाम कटवाने की शिकायतों के बाद यह कदम उठाया गया है। लेकिन इस तकनीकी सुधार के साथ ही सियासी बवाल भी तेज हो गया है। दिल्ली से लेकर केरल तक विपक्षी दल आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल दाग रहे हैं।
संसद के गलियारों से लेकर राज्यों की विधानसभाओं तक चुनाव सुधारों पर चर्चा हो रही है। आयोग की निष्पक्षता को लेकर विपक्षी दल लगातार मोर्चा खोले हुए हैं। कांग्रेस कार्यसमिति ने अपनी अहम बैठक में चुनाव आयोग के रवैये को मुख्य मुद्दा बनाया है। वहीं दक्षिण भारत, खासकर केरल में भी विपक्षी नेताओं ने आयोग के खिलाफ तीखे तेवर दिखाए हैं। हैरानी की बात यह है कि केवल विपक्ष ही नहीं, बल्कि सत्ता पक्ष के कुछ साथी दल भी स्पष्टीकरण मांग रहे हैं। इन तमाम सवालों के बीच चुनाव आयोग ने साफ किया है कि उसके सभी फैसले पूरी तरह एकजुट होकर लिए गए हैं।
फॉर्म-7 के थोक इस्तेमाल पर क्यों लगी रोक?
चुनाव आयोग के ताजा आदेश के मुताबिक अब कोई भी व्यक्ति थोक में फॉर्म-7 जमा नहीं कर पाएगा। फॉर्म-7 का इस्तेमाल मतदाता सूची से किसी व्यक्ति का नाम हटाने या आपत्ति दर्ज कराने के लिए होता है। पिछले कई चुनावों में यह गंभीर शिकायत मिली थी कि फर्जी तरीके से थोक में आवेदन किए जाते हैं। शरारती तत्व और कुछ राजनीतिक कार्यकर्ता विरोधी समर्थकों के नाम कटवाने की साजिश रचते हैं। एक ही व्यक्ति दर्जनों मतदाताओं के नाम हटाने के लिए फॉर्म भर देता था। इससे असली मतदाता को पता भी नहीं चलता था और उसका वोट कट जाता था।
आयोग ने अब साफ कर दिया है कि व्यक्तिगत तौर पर केवल सीमित संख्या में ही फॉर्म जमा होंगे। अगर किसी को एक से ज्यादा आपत्ति दर्ज करानी है, तो उसे पुख्ता सबूत देने होंगे। संबंधित अधिकारी को खुद मौके पर जाकर जांच करनी होगी। बिना जमीनी सत्यापन के किसी भी जीवित व्यक्ति का नाम सूची से बाहर नहीं किया जाएगा। आयोग का मानना है कि इस सख्त कदम से मतदाता सूची में हेराफेरी पूरी तरह रुकेगी। इस फैसले से आम मतदाताओं को बड़ी राहत मिलने की उम्मीद जताई जा रही है।
विपक्ष की लामबंदी और कांग्रेस कार्यसमिति का रुख
दूसरी तरफ चुनाव आयोग की निष्पक्षता को लेकर विपक्षी खेमा पूरी तरह हमलावर है। राजधानी दिल्ली में कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में चुनाव प्रक्रिया पर विस्तृत चर्चा हुई। पार्टी नेताओं का आरोप है कि चुनाव आयोग सत्ताधारी दल के दबाव में काम कर रहा है। हालिया चुनावों में मशीनों और मतदान के आंकड़ों को लेकर विपक्ष ने कई सवाल उठाए थे। विपक्ष का कहना है कि आयोग को सभी दलों के लिए समान मैदान तैयार करना चाहिए। बैठक में आगे की रणनीति और संसद के भीतर इस मुद्दे को जोरदार तरीके से उठाने का फैसला लिया गया है।
केरल में भी विपक्षी दलों ने आयोग के खिलाफ तीखे बयान दिए हैं। वहां के नेताओं ने आरोप लगाया कि चुनाव व्यवस्था को कमजोर किया जा रहा है। विपक्षी नेताओं ने मुख्य चुनाव आयुक्त और आयुक्तों से अपनी जिम्मेदारी निष्पक्ष तरीके से निभाने की मांग की है। कुछ नेताओं ने तो यहां तक कह दिया कि अगर आयोग निष्पक्ष नहीं रह सकता, तो अधिकारियों को पद छोड़ देना चाहिए। इस कड़े रुख से साफ है कि आने वाले दिनों में चुनाव आयोग और विपक्षी दलों के बीच टकराव और बढ़ेगा।
सहयोगी दलों के सवाल और आयोग का औपचारिक जवाब
चुनाव प्रक्रिया को लेकर उठ रही चिंताओं की आंच केवल विपक्ष तक सीमित नहीं है। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के अहम सहयोगी चिराग पासवान ने भी चुनाव व्यवस्था को लेकर कुछ सवाल उठाए थे। उनके बाद एनडीए के कुछ अन्य घटक दलों ने भी चुनाव आयोग से स्थिति स्पष्ट करने की मांग की है। छोटे दलों को डर है कि मतदाता सूची में किसी भी तरह की गड़बड़ी से उनके आधार को नुकसान पहुंच सकता है। सहयोगियों द्वारा सफाई मांगने से आयोग पर दोनों तरफ से दबाव बन गया है।
इस पूरे घटनाक्रम पर चुनाव आयोग ने अपनी स्थिति पूरी तरह स्पष्ट कर दी है। आयोग के भीतर किसी तरह के मतभेद की खबरों को आयोग ने सिरे से खारिज किया है। आयोग ने एक बयान जारी कर कहा कि आयोग की पूरी पीठ हर फैसला सर्वसम्मति से लेती है। चुनाव प्रक्रिया में पारदर्शिता बनाए रखने के लिए सभी तकनीकी मानकों का पालन किया जा रहा है। आयोग ने भरोसा दिलाया है कि मतदाता सूची को एकदम शुद्ध और पारदर्शी बनाया जाएगा। देश के हर योग्य नागरिक का मताधिकार सुरक्षित रखना आयोग की सर्वोच्च प्राथमिकता है।







