नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — देश में इन दिनों भारत के चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर सियासी पारा काफी गर्म हो गया है। कर्नाटक के गृह मंत्री प्रियंक खर्गे ने खुलकर देश की शीर्ष चुनावी संस्था पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। उन्होंने सीधे तौर पर पूछा है कि चुनावी माहौल में बड़े नेता और मुख्य चुनाव आयुक्त आखिर कहां गायब हैं। इस तीखे बयान के बाद राजनीतिक गलियारों में खलबली मच गई है और पक्ष-विपक्ष के बीच तीखी बहस शुरू हो गई है।
यह पूरा मामला तब गरमाया जब सार्वजनिक मंचों से चुनावी प्रक्रिया और उस पर प्रशासनिक नजर रखने वाली संस्थाओं की भूमिका पर चर्चा होने लगी। प्रियंक खर्गे ने अपने बयान में कहा कि आज के समय में जब जनता को निष्पक्ष और स्पष्ट फैसलों की सबसे ज्यादा जरूरत है, तब कई जिम्मेदार चेहरे और संस्थाएं अपनी भूमिका निभाते नहीं दिख रहे हैं। उनका यह बयान सीधे तौर पर चुनाव आयोग के कामकाज पर सवालिया निशान लगाता है।
चुनावी संस्थाओं की पारदर्शिता पर उठते सवाल
भारत का चुनाव आयोग हमेशा से एक स्वतंत्र और मजबूत संवैधानिक संस्था माना जाता रहा है। देश के आम नागरिक से लेकर राजनीतिक दलों तक को इस संस्था पर पूरा भरोसा होता है कि चुनाव निष्पक्ष तरीके से कराए जाएंगे। लेकिन जब देश के जिम्मेदार मंत्री स्तर के नेता ही आयोग के कामकाज पर सवाल उठाने लगें, तो लोकतंत्र की नींव पर चर्चा होना लाजिमी हो जाता है। आम जनता भी अब यह सोचने पर मजबूर हो गई है कि क्या चुनाव आयोग का रवैया सच में ढीला पड़ गया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि चुनाव आयोग को इस तरह के राजनीतिक हमलों पर अपनी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। किसी भी लोकतांत्रिक देश में चुनाव कराने वाली संस्था की छवि एकदम साफ और बेदाग होनी चाहिए। यदि नेताओं द्वारा इस तरह के गंभीर आरोप लगाए जाते हैं, तो इससे आम मतदाताओं के मन में भी कई तरह की आशंकाएं जन्म लेने लगती हैं। आने वाले दिनों में यह विवाद और ज्यादा तूल पकड़ सकता है क्योंकि विभिन्न राजनीतिक दल इस मुद्दे को भुनाने में जुट गए हैं।
राजनीतिक दलों की बयानबाजी और जनता का नजरिया
जमीनी स्तर पर बात करें तो आम आदमी इन राजनीतिक बहसों से अलग अपनी रोजमर्रा की समस्याओं में उलझा है। लेकिन लोकतंत्र के महापर्व और उसमें निष्पक्षता बनाए रखने की जिम्मेदारी संभालने वाले आयोग पर जब इस तरह के सवाल उठते हैं, तो चर्चा का दौर हर नुक्कड़ पर शुरू हो जाता है। कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल इस मुद्दे को लेकर लगातार आक्रामक रुख अपना रहे हैं। उनका कहना है कि संवैधानिक संस्थाओं पर दबाव बनाया जा रहा है और वे अपनी तय जिम्मेदारी निभाने से पीछे हट रही हैं।
दूसरी ओर, सत्ता पक्ष की तरफ से अभी तक इन बयानों पर बहुत तीखी प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन अंदरखाने राजनीतिक सरगर्मी काफी बढ़ चुकी है। चुनाव आयोग जैसे महत्वपूर्ण संस्थान पर इस तरह के सवाल उठना किसी भी स्वस्थ लोकतंत्र के लिए एक बड़ा संकेत माना जाता है। द फ्रीलान्स की टीम इस पूरे मामले पर लगातार नजर बनाए हुए है और यह समझने की कोशिश कर रही है कि आने वाले समय में आयोग की तरफ से क्या कदम उठाए जाते हैं।
निष्पक्षता की कसौटी पर लोकतंत्र का पहरेदार
चुनाव आयोग की सबसे बड़ी ताकत उसकी निष्पक्षता और बिना किसी डर के फैसले लेने की क्षमता रही है। इतिहास गवाह है कि भारत के चुनाव आयोग ने कई मौकों पर अपनी मजबूती साबित की है। लेकिन बदलते दौर में राजनीतिक दबाव और नेताओं के बयानों के बीच इस संस्था की परीक्षा हर दिन हो रही है। प्रियंक खर्गे जैसे नेताओं के बयान इस बात की याद दिलाते हैं कि जनता और नेता दोनों ही चुनाव आयोग से पूरी पारदर्शिता और सक्रियता की उम्मीद रखते हैं।
हमारी ग्राउंड रिपोर्ट बताती है कि इस तरह के बयानों से केवल राजनीतिक बयानबाजी ही तेज नहीं होती, बल्कि संस्थाओं के भीतर सुधार की गुंजाइश पर भी बहस शुरू हो जाती है। अब देखना यह होगा कि क्या चुनाव आयोग इन तमाम आलोचनाओं का जवाब देते हुए कोई आधिकारिक बयान जारी करता है या फिर प्रशासनिक खामोशी ही इस पर अंतिम प्रतिक्रिया रहती है। द फ्रीलान्स की पैनी नजर इस बात पर है कि देश की यह सबसे बड़ी चुनावी संस्था आने वाले दिनों में अपनी साख बचाने के लिए क्या ठोस कदम उठाती है।







