देश में मतदाता सूची के SIR (Special Intensive Revision) को लेकर चल रहे सियासी घमासान के बीच एक नया मोड़ आ गया है। देश के 272 प्रतिष्ठित नागरिकों और उच्च न्यायपालिका के 42 पूर्व न्यायाधीशों ने एक खुला पत्र (Open Letter) जारी कर चुनाव आयोग का खुलकर समर्थन किया है। इस पत्र में साफ तौर पर कहा गया है कि लोकतंत्र में चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्थाओं पर बार-बार बेबुनियाद सवाल खड़े नहीं किए जाने चाहिए।
पूर्व जजों का तीखा हमला: 'यह जनता का नहीं, राजनीति का शोर है'
पत्र जारी करने वाले पूर्व जजों और बुद्धिजीवियों का मानना है कि विपक्ष का विरोध जनता का विरोध नहीं, बल्कि चुनावी हार से उपजा राजनीतिक असंतोष है। दिल्ली हाई कोर्ट के रिटायर्ड जज जस्टिस शिव नारायण ढींगरा ने इस मुद्दे पर बेबाक राय रखते हुए कहा, 'ये सारा शोर मतदाताओं का नहीं, बल्कि वो राजनीतिक दल मचा रहे हैं जो चुनाव जीतने में नाकाम रहे हैं।'
इस बीच, सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा जज जस्टिस उज्जल भुइयां द्वारा SIR प्रक्रिया की सार्वजनिक आलोचना पर भी तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली है। भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस बी.आर. गवई और अन्य सेवानिवृत्त जजों ने इस बात पर कड़ी आपत्ति जताई कि जो मामला पहले से ही सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है, उस पर किसी मौजूदा जज को सार्वजनिक रूप से ऐसी टिप्पणी करने से बचना चाहिए।
पारदर्शी चुनावी प्रक्रिया पर जोर
पूर्व जजों का तर्क है कि कानून के दायरे में रहकर योग्य और अयोग्य मतदाताओं की छंटनी करना पूरी तरह से चुनाव आयोग का वैधानिक अधिकार है। इस प्रशासनिक प्रक्रिया को लेकर बिना किसी ठोस सबूत के 'वोट चोरी' जैसे गंभीर आरोप लगाना सही नहीं है। पत्र में चेतावनी दी गई है कि संवैधानिक संस्थाओं को बार-बार कमजोर करने से लोकतंत्र में आम जनता का भरोसा डगमगा सकता है।
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