देश की राजनीतिक व्यवस्था में काले धन को सफेद करने और टैक्स बचाने के नाम पर किस तरह बड़े पैमाने पर जालसाजी चल रही है, इसका एक हैरान करने वाला मामला सामने आया है। आयकर विभाग की लंबी और गहरी छानबीन के बाद एक ऐसा वित्तीय घोटाला बेनकाब हुआ है, जिसमें कागजी राजनीतिक दलों ने हजारों करोड़ रुपये के फर्जी चंदे का जाल बुना था। इन दलों का चुनावी मैदान में वजूद भले ही नाममात्र का रहा हो और इनके हर उम्मीदवार की जमानत जब्त हुई हो, लेकिन चंदा जुटाने के मामले में इन्होंने बड़े-बड़े दिग्गजों को पीछे छोड़ दिया।
फर्जी कंपनियों और कमीशन का खेल
जांच एजेंसियों के अनुसार, इस पूरे फर्जीवाड़े को बेहद शातिर तरीके से अंजाम दिया गया। आयकर अधिनियम की एक खास धारा के तहत राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे पर पूरी तरह से टैक्स छूट मिलती है। इसी कानूनी प्रावधान का फायदा उठाने के लिए इन पार्टियों ने फर्जी शेल कंपनियों का एक विशाल नेटवर्क तैयार किया। दानदाताओं से चेक या डिजिटल माध्यमों से बड़ी रकम अपने खातों में मंगाई जाती थी और फिर उसे अलग-अलग फर्जी फर्मों में ट्रांसफर कर दिया जाता था। इसके बाद फर्जी खरीद बिल तैयार करके बैंक से सारा पैसा नकद निकाल लिया जाता था।
नकद राशि निकालने के बाद यह गिरोह अपना चार से दस प्रतिशत तक का कमीशन काटकर बाकी की पूरी रकम असली दानदाताओं को वापस कैश में लौटा देता था। इस पूरी प्रक्रिया में चार्टर्ड एकाउंटेंट्स (सीए) की भूमिका भी संदिग्ध पाई गई है, जिन्होंने बिना किसी वित्तीय दस्तावेजों की जांच किए महज कुछ रुपयों के लालच में इन फर्जी बैलेंस शीट पर अपने डिजिटल हस्ताक्षर कर दिए और सरकारी पोर्टल पर अपलोड कर दिया।
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चुनाव में जमानत जब्त, पर करोड़ों का चंदा
अधिकारियों के मुताबिक, जिन तीन गैर-मान्यता प्राप्त पंजीकृत राजनीतिक दलों के खिलाफ यह शिकंजा कसा गया है, उनका चुनावी रिकॉर्ड बेहद चौंकाने वाला है। ये दल पिछले कई सालों से लगातार चुनाव लड़ रहे हैं, लेकिन इनका वोट शेयर एक प्रतिशत के भी हजारवें हिस्से से कम रहा है। इनके उम्मीदवारों को स्थानीय चुनावों से लेकर लोकसभा और विधानसभा चुनावों तक में महज कुछ सौ वोट ही मिले और नियम के तहत हर बार उनकी जमानत जब्त हो गई। इसके बावजूद इनके खातों में अरबों रुपये का चंदा आना इस बात का सबसे बड़ा सबूत था कि यह पूरा खेल सिर्फ और सिर्फ टैक्स चोरी और काले धन को वैध बनाने के लिए चलाया जा रहा था।
उदाहरण के लिए, इस रैकेट में शामिल एक प्रमुख दल ने करीब चौदह सौ करोड़ रुपये से अधिक का फर्जी चंदा दिखाया, जिससे सरकारी खजाने को भारी नुकसान पहुंचा। अन्य दो पार्टियों ने भी पांच सौ करोड़ से अधिक की रकम को कागजों पर घुमाया और नियमों की धज्जियां उड़ाईं। जमीनी स्तर पर इन दलों का कोई जनआधार नहीं था और न ही इनके पास कोई राजनीतिक कार्यालय या कार्यकर्ता थे। ये पार्टियां केवल कागजों पर जिंदा थीं और इनका मुख्य उद्देश्य सिर्फ कमीशन कमाना था।
मास्टरमाइंड और सीए पर शिकंजा
इस सनसनीखेज खुलासे के बाद कानून प्रवर्तन एजेंसियों ने ताबड़तोड़ कार्रवाई शुरू कर दी है। संबंधित राज्यों की पुलिस और सीआईडी ने कई प्रमुख पदाधिकारियों, पार्टी अध्यक्षों और सीए के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की विभिन्न गंभीर धाराओं के तहत मामले दर्ज किए हैं। जांच अधिकारियों का कहना है कि इस सिंडिकेट के मुख्य साजिशकर्ताओं की पहचान कर ली गई है और उनके ठिकानों की छानबीन की जा रही है।
"हम इस पूरे मामले में डिजिटल और फोरेंसिक साक्ष्य जुटा रहे हैं। आरोपियों के बैंक खातों के उपयोग पर रोक लगाने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है और अवैध कमाई से बनाई गई संपत्तियों को भी कुर्क किया जाएगा, ताकि ऐसे मामलों में कड़ा संदेश दिया जा सके।" — वरिष्ठ पुलिस अधिकारी, जांच दल
आगे की कानूनी कार्रवाई और प्रशासनिक चुनौती
यह मामला देश की चुनावी और वित्तीय प्रणाली की सुरक्षा पर एक बड़ा सवालिया निशान खड़ा करता है। विशेषज्ञ मानते हैं कि छोटे और गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों के वित्त पोषण की निगरानी के लिए निर्वाचन आयोग और आयकर विभाग को और अधिक सख्त नियम बनाने की जरूरत है। वर्तमान में जिस तरह से फर्जी कंपनियों के जरिए काले धन को राजनीतिक चंदे के रूप में वैध बनाया जा रहा है, वह लोकतंत्र की पारदर्शिता के लिए एक गंभीर चुनौती है।
फिलहाल, जांच एजेंसियां इस सिंडिकेट के अन्य सहयोगियों और बड़े चेहरों की तलाश में जुटी हैं। आने वाले दिनों में इस मामले में कई और बड़े खुलासे होने की उम्मीद है, क्योंकि पूछताछ के दौरान कई और फर्जी कंपनियों के नाम सामने आ रहे हैं जो इस काले कारोबार से जुड़ी हो सकती हैं।








