दर्दनाक हादसा: प्रशासनिक लापरवाही ने ली मासूम की जान
देश के विभिन्न हिस्सों से अक्सर बोरवेल में बच्चों के गिरने की खौफनाक तस्वीरें सामने आती रहती हैं, लेकिन इसके बावजूद जिम्मेदार महकमे सबक लेने को तैयार नहीं हैं। ताजा मामला हरियाणा के औद्योगिक शहर से जुड़ा है, जहां एक नासमझ मासूम प्रशासनिक सुस्ती और लापरवाही की भेंट चढ़ गई। करीब ढाई साल की एक छोटी बच्ची खेलते-खेलते मौत के कुएं में समा गई। इस घटना के बाद से स्थानीय लोगों में गहरा आक्रोश व्याप्त है और वे सीधे तौर पर नगर निगम के अधिकारियों पर गंभीर सवाल खड़े कर रहे हैं।
प्राप्त जानकारी के मुताबिक, यह पूरी घटना रविवार शाम के वक्त सामने आई जब हर तरफ ছুटी और अपने घरों में लोग सुकून के पल बिता रहे थे। अचानक चीख-पुकार मच गई क्योंकि एक मासूम परिवार की नजरों से ओझल होकर गहरे गड्ढे में जा गिरी थी। घटना की जानकारी मिलते ही आसपास के लोग बदहवास होकर मौके की तरफ भागे और फौरन राहत एवं बचाव एजेंसियों को इसकी सूचना दी गई। देखते ही देखते घटनास्थल पर भारी भीड़ जमा हो गई और हर कोई ईश्वर से उस नन्हीं जान के सुरक्षित बाहर आने की प्रार्थना करने लगा।
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दस साल से खुला पड़ा था मौत का यह गड्ढा
जिले के एक ग्रामीण इलाके में स्थित यह बोरवेल कई सालों से बदहाल हालत में था। शुरुआती छानबीन और स्थानीय नागरिकों के बयानों से यह बात सामने आई है कि यह बोरवेल किसी निजी व्यक्ति का नहीं बल्कि नगर निगम का था। पिछले एक दशक से इसका कोई इस्तेमाल नहीं हो रहा था और यह पूरी तरह से बंद पड़ा था। कायदे से ऐसे खतरनाक और खुले पड़े बोरवेल को पूरी तरह से सील कर दिया जाना चाहिए था, ताकि किसी भी तरह की अनहोनी से बचा जा सके।
शुरुआत में इस बोरवेल के मुंह पर सुरक्षा की दृष्टि से एक ढक्कन लगाया गया था, जो समय के साथ गायब हो गया। निगम के कर्मचारियों ने इस बात की जहमत नहीं उठाई कि गायब हुए ढक्कन की जगह दूसरा मजबूत कवर लगाया जाए। नतीजतन, कई फीट गहरा यह गड्ढा खुला रह गया और मौत का जाल बनकर मासूमों की राह देखने लगा। इस तरह की लापरवाही केवल एक विभाग की सुस्ती नहीं बल्कि सीधे तौर पर इंसानी जिंदगियों के प्रति आपराधिक उदासीनता को दर्शाती है, जिसकी कीमत एक परिवार को अपना सब कुछ खोकर चुकानी पड़ी है।
एनडीआरएफ और एसडीआरएफ का मैराथन रेस्क्यू अभियान
जैसे ही घटना की खबर प्रशासनिक अमले तक पहुंची, शासन-प्रशासन हरकत में आ गया। जिला प्रशासन के निर्देश पर राष्ट्रीय आपदा मोचन बल यानी एनडीआरएफ और राज्य आपदा मोचन बल की टीमों को फौरन आपातकालीन स्थिति में मैदान पर उतार दिया गया। इसके अलावा राज्य पुलिस, दमकल विभाग, स्वास्थ्य कर्मियों और नगर निगम के प्रशिक्षित कर्मचारियों ने भी मोर्चा संभाल लिया। बचाव दलों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि बच्ची तक बिना किसी नुकसान के कैसे पहुंचा जाए और उसे सुरक्षित बाहर निकाला जाए।
बचाव अभियान के दौरान विशेषज्ञों ने आधुनिक उपकरणों का सहारा लिया। बोरवेल के समानांतर एक और गड्ढा खोदकर बच्ची तक सुरंग बनाने की कोशिश की गई। इस पूरी प्रक्रिया में यह सुनिश्चित किया गया कि बच्ची को किसी भी तरह की सांस की दिक्कत न हो, इसलिए बोरवेल के अंदर लगातार ऑक्सीजन की सप्लाई पंप के जरिए भेजी जा रही थी। मौके पर उन्नत चिकित्सा उपकरणों से लैस एंबुलेंस और डॉक्टरों की पूरी टीम मुस्तैद खड़ी थी, ताकि जैसे ही रेस्क्यू पूरा हो, फौरन प्राथमिक उपचार देकर अस्पताल पहुंचाया जा सके।
तमाम कोशिशों के बावजूद नहीं बच सकी नन्हीं जान
रात के अंधेरे में चले इस लंबे और थका देने वाले रेस्क्यू ऑपरेशन में सभी एजेंसियों ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी। लगातार दस घंटे से अधिक समय तक चली मशक्कत के बाद आखिरकार बचाव दल उस गहराई तक पहुंचने में कामयाब रहे जहां बच्ची फंसी हुई थी। तड़के के समय जब उसे बाहर निकाला गया, तो वहां मौजूद हर शख्स की सांसें थमी हुई थीं। बिना एक पल गंवाए उसे तुरंत नजदीकी निजी अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उसकी जांच की।
अस्पताल के चिकित्सकों ने तमाम मेडिकल कोशिशों के बाद बच्ची को मृत घोषित कर दिया। डॉक्टरों के इस फैसले ने वहां मौजूद परिजनों की उम्मीदों को हमेशा के लिए तोड़ दिया और पूरे इलाके में मातम पसर गया। इस संबंध में बचाव दल के वरिष्ठ अधिकारियों ने बताया कि टीम ने कम से कम समय में अधिकतम प्रयास किए, लेकिन गहराई और परिस्थितियों के कारण मासूम को बचाया नहीं जा सका।
"हमारी पूरी टीम ने बिना एक सेकंड गंवाए अपनी तरफ से सर्वश्रेष्ठ प्रयास किए। बच्ची को सुरक्षित बाहर निकालकर फौरन अत्याधुनिक मेडिकल ट्रीटमेंट के लिए अस्पताल भेज दिया गया था, लेकिन बदकिस्मती से उसे बचाया नहीं जा सका।" — कुनाल तिवारी, डिप्टी कमांडेंट, एनडीआरएफ
सुरक्षा मानकों पर फिर उठे गंभीर सवाल
इस दुखद घटना ने एक बार फिर से देश भर में खुले पड़े बोरवेलों की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर गंभीर बहस छेड़ दी है। सुप्रीम कोर्ट और तमाम प्रशासनिक गाइडलाइंस के बावजूद धरातल पर नियमों की किस तरह धज्जियां उड़ाई जाती हैं, यह हादसा इसका जीता-जागत सबूत है। देश के विभिन्न कोनों में ऐसे दर्जनों बोरवेल आज भी बिना ढके खुले आसमान के नीचे भगवान भरोसे छोड़े गए हैं, जो किसी भी वक्त बड़े खतरे को दावत दे सकते हैं।
समाज के प्रबुद्ध जनों और जानकारों का मानना है कि केवल हादसे के बाद औपचारिकता निभाना और कुछ समय के लिए लीपापोती करना इस समस्या का समाधान नहीं है। इसके लिए स्थानीय निकायों को कड़े निर्देश जारी करने होंगे और नियमित रूप से अपने क्षेत्रों में पड़े पुराने बोरवेलों का भौतिक सत्यापन करना होगा। यदि समय रहते जिम्मेदार अधिकारियों पर सख्त कानूनी कार्रवाई नहीं की गई, तो ऐसे हादसों की पुनरावृत्ति को रोक पाना असंभव होगा और भविष्य में फिर किसी बेगुनाह बच्चे को अपनी जान गंवानी पड़ेगी।








