नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — देश के सबसे बड़े न्यायालय यानी सुप्रीम कोर्ट में इस वक्त कुल 37 जज काम कर रहे हैं। इन सभी जजों में से सिर्फ तीन महिला जज हैं। यह आंकड़ा देश की न्याय व्यवस्था पर बड़ा सवाल खड़ा करता है। क्या इतनी कम संख्या के साथ भारत को अपनी पहली महिला मुख्य न्यायाधीश मिल पाएगी? यह सवाल अब कानूनी गलियारों से निकलकर आम आदमी की जुबान पर भी आ गया है।
सुप्रीम कोर्ट में जजों के कुल पदों की संख्या और खाली सीटों को भरने की प्रक्रिया लंबे समय से चर्चा में रही है। कॉलेजियम प्रणाली के जरिए जजों की नियुक्ति होती है। पिछले कुछ सालों में महिला जजों की संख्या बढ़ाने की मांग लगातार उठी है। इसके बावजूद उच्च न्यायपालिका में महिलाओं का प्रतिनिधित्व अभी भी बहुत कम है। देश की आधी आबादी को न्याय के सर्वोच्च पद पर देखने का इंतजार लंबा होता जा रहा है।
सुप्रीम कोर्ट में महिलाओं की मौजूदा स्थिति और आंकड़े
मौजूदा समय में सुप्रीम कोर्ट में जो तीन महिला जज काम कर रही हैं, उनके नाम और वरिष्ठता का क्रम न्यायपालिका के भविष्य तय करेगा। वरिष्ठता के नियमों के मुताबिक ही देश के मुख्य न्यायाधीश यानी सीजेआई की कुर्सी तय होती है। अगर समय और वरिष्ठता का गणित सही बैठा, तभी देश को पहली महिला मुख्य न्यायाधीश मिल सकती है। जानकारों का मानना है कि जजों की नियुक्ति में सामाजिक विविधता और लैंगिक संतुलन का ध्यान रखना बेहद जरूरी है।
सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में अब तक कोई भी महिला मुख्य न्यायाधीश नहीं बनी है। फातिमा बीवी देश की पहली महिला जज थीं जो साल 1989 में सुप्रीम कोर्ट पहुंची थीं, लेकिन वे मुख्य न्यायाधीश के पद तक नहीं पहुंच पाई थीं। इसके बाद से कई महिला जजों ने सुप्रीम कोर्ट में अपनी सेवाएं दीं, पर शीर्ष पद पर पहुंचने का मौका किसी को नहीं मिला। वर्तमान में जो तीन महिला जज हैं, उनमें से कुछ के पास वरिष्ठता के हिसाब से भविष्य में यह मौका आने की थोड़ी उम्मीद बची है।
कॉलेजियम प्रणाली और जजों की नियुक्ति पर बहस
देशभर के कानून के जानकार और वकील मानते हैं कि उच्च अदालतों में महिलाओं की नियुक्ति की प्रक्रिया को तेज करना चाहिए। निचली अदालतों से लेकर हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक महिलाओं का अनुपात बढ़ाने के लिए विशेष प्रयास होने चाहिए। जब तक हाईकोर्ट स्तर पर बड़ी संख्या में महिला जज नियुक्त नहीं होंगी, तब तक सुप्रीम कोर्ट तक उनका पहुंचना और सीजेआई बनना बहुत मुश्किल होगा।
इस बीच, देश की राजधानी दिल्ली और अन्य जगहों पर राजनीतिक हलचल के बीच कानूनी सुधारों को लेकर भी आवाजें उठ रही हैं। हाल ही में चुनाव आयोग के अधिकारियों को हटाने के नियम और झारखंड में पुलिस महानिदेशक की नियुक्ति जैसे मामलों को लेकर भी सुप्रीम कोर्ट के आदेश चर्चा में रहे हैं। लेकिन इन सब के बीच महिला न्यायविदों को बराबरी का हक दिलाने का मुद्दा सबसे अहम बनता जा रहा है।
भיविष्य की उम्मीदें और न्यायपालिका में सुधार की जरूरत
आम जनता और मानवाधिकार संगठन लगातार यह मांग कर रहे हैं कि न्यायपालिका में पारदर्शिता और विविधता बढ़ाई जाए। सुप्रीम कोर्ट में जजों की कुल क्षमता 34 की है, लेकिन कई बार पद खाली रहते हैं। अगर सरकार और कॉलेजियम मिलकर महिला वकीलों और जजों को सीधे सर्वोच्च न्यायालय में प्रमोट करने का ठोस फैसला लें, तो तस्वीर बदल सकती है।
द फ्रीलान्स की इस ग्राउंड पड़ताल से यह साफ होता है कि भारत की पहली महिला सीजेआई का सपना तभी पूरा होगा जब नियुक्ति प्रक्रिया में बड़ा बदलाव आएगा। आने वाले कुछ वर्षों में जब मौजूदा वरिष्ठ जज रिटायर होंगे, तब यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या कोई महिला इस ऐतिहासिक पद की कुर्सी तक पहुंच पाती है या देश को अभी और इंतजार करना होगा।






