नई दिल्ली से 'द फ्रीलान्स' की विशेष ग्राउंड रिपोर्ट। देश की राजधानी में चुनावी हलचल के बीच चुनाव आयोग (ECI) और सर्वोच्च अदालत के बीच का एक तकनीकी व प्रशासनिक पेंच अब सीधे तौर पर राजनीतिक भूचाल का रूप ले चुका है। नया विवाद वोटर रजिस्ट्रेशन से जुड़े 'फॉर्म-6' (Form-6) में किए गए बदलावों को लेकर है। मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार एक बार फिर विपक्ष के तीखे सवालों के घेरे में खड़े हैं। मामला तब गरमाया जब सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान यह साफ हो गया कि फॉर्म-6 में किए गए बदलावों को सर्वोच्च अदालत ने कोई मंजूरी नहीं दी थी।
न्यायालय की दो टूक और आयोग के दावों की पोल
हमारी खोजी टीम द्वारा जुटाई गई जानकारी के अनुसार, मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की बेंच के समक्ष जब यह मामला पहुंचा, तो एक बड़ा विरोधाभास सामने आया। इससे पहले चुनाव आयोग ने अप्रत्यक्ष या प्रत्यक्ष तौर पर यह दावा किया था कि इन प्रशासनिक और सॉफ्टवेयर स्तर के बदलावों को लेकर कानूनी प्रक्रिया का पालन किया गया है। लेकिन CJI की खंडपीठ की तीखी टिप्पणी ने इन दावों की हवा निकाल दी। अदालत ने स्पष्ट किया कि फॉर्म-6 के ढांचे या उसमें किए गए संशोधनों को न्यायालय द्वारा कोई पूर्व या औपचारिक मंजूरी नहीं दी गई थी। इस खुलासे के बाद न्यायिक गलियारों से लेकर राजनीतिक हलकों तक खलबली मच गई है।
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विपक्ष का आक्रामक रुख: 'किसके आदेश पर हुआ बदलाव?'
सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी के तुरंत बाद राजनीतिक दलों ने आयोग पर हमला बोल दिया है। विपक्ष के तमाम वरिष्ठ नेताओं ने मुख्य रूप से CEC ज्ञानेश कुमार को घेरते हुए यह सवाल पूछा है कि जब अदालत की कोई मंजूरी नहीं थी, तो आखिर किसके गुप्त या एकतरफा आदेश पर यह बदलाव किया गया? क्या चुनाव आयोग किसी बाहरी दबाव में काम कर रहा है? विपक्ष का आरोप है कि इस तरह के सॉफ्टवेयर बदलाव और SIR (Special Information/Intimation Routine या संबंधित निर्वाचन प्रक्रिया से जुड़ी प्रणालियां) में फेरबदल से चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सीधा असर पड़ता है।
सॉफ्टवेयर बदलाव और SIR प्रक्रिया पर गहराते संदेह
ग्राउंड ज़ीरो से रिपोर्टिंग के दौरान तकनीकी विशेषज्ञों से बातचीत में यह बात सामने आई कि मतदाता सूची से जुड़े फॉर्म-6 में जरा सा भी बदलाव सीधे तौर पर लाखों मतदाताओं के पंजीकरण को प्रभावित कर सकता है। एसआईआर (SIR) और अन्य डिजिटल टूल्स में किए गए हालिया संशोधनों को लेकर चुनाव आयोग पहले भी विपक्षी दलों के निशाने पर रहा है। अब जब सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया है कि न्यायिक मुहर जैसी कोई बात नहीं थी, तो आयोग की प्रशासनिक स्वायत्तता और निर्णय लेने की प्रक्रिया पर गंभीर सवालिया निशान लग गए हैं।
भविष्य का असर और जवाबदेही का सवाल
- CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ दायर विभिन्न याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई लगातार जारी है।
- आयोग के अंदरूनी फैसलों और एकतरफा नीतिगत बदलावों पर अब संसद के भीतर भी तीखा विरोध देखने को मिल सकता है।
- नागरिक समाज और चुनाव सुधार की मांग करने वाले संगठनों ने भी इस मामले में पारदर्शी जांच की मांग उठाई है।
- यह विवाद आने वाले चुनावों में इलेक्ट्रॉनिक और कागजी मतदाता डेटा की विश्वसनीयता को भी प्रभावित कर सकता है।
कुल मिलाकर, 'द फ्रीलान्स' की इस पड़ताल से यह साफ है कि चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था के लिए पारदर्शिता केवल एक शब्द नहीं, बल्कि उसकी साख की धुरी है। फॉर्म-6 पर सुप्रीम कोर्ट की इस बेबाक टिप्पणी ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि देश के लोकतंत्र में स्वतंत्र संस्थाओं की हर एक कार्रवाई अब बेहद सूक्ष्म न्यायिक और सार्वजनिक निगरानी के दायरे में है। ज्ञानेश कुमार और उनके सहयोगियों के लिए आने वाले दिन आसान नहीं होने वाले हैं, क्योंकि विपक्ष और न्यायपालिका दोनों ही अब हर एक डिजिटल और प्रशासनिक फैसले की बारीक परतें उधेड़ने को तैयार बैठे हैं।







