बिहार में अप्रशिक्षित शिक्षकों की मुश्किलें बढ़ीं, शिक्षा विभाग का कड़ा रुख
बिहार के प्राथमिक और मध्य विद्यालयों में लंबे समय से चली आ रही शिक्षक पात्रता और प्रशिक्षण की प्रक्रिया पर एक बार फिर से प्रशासनिक चाबुक चल गया है। शिक्षा विभाग ने राज्य के सभी जिलों में उन प्रारंभिक शिक्षकों की पहचान करने का आदेश दिया है, जिन्होंने तय समयसीमा के बाद नौकरी तो ज्वाइन कर ली लेकिन उनके पास अनिवार्य शैक्षणिक एवं व्यावसायिक प्रशिक्षण नहीं था। इस ताजा प्रशासनिक कदम के बाद हजारों शिक्षकों के भविष्य पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं।
विभागीय निर्देशों के मुताबिक, सबसे कड़ी कार्रवाई उन शिक्षकों पर की जानी है जिनकी नियुक्ति 31 मार्च 2015 के बाद हुई थी। सरकार और शिक्षा विभाग का मानना है कि इस तिथि के पश्चात बिना मानक प्रशिक्षण के नियुक्त किए गए शिक्षकों की नियुक्तियों को वैध नहीं ठहराया जा सकता है। बाद के दिनों में यदि ऐसे शिक्षकों ने दूरस्थ माध्यम या अन्य तरीकों से डीएलएड (डी.एल.एड.) की डिग्री हासिल भी कर ली है, तो भी शुरुआती नियुक्ति के समय पात्रता पूरी न होने के कारण उन्हें नियमों के दायरे से बाहर नहीं माना जाएगा।
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कैमूर जिले में तीन दिनों के भीतर सूची तैयार करने का सख्त फरमान
शिक्षा विभाग के इस तीखे तेवर का असर राज्य के सभी जिलों में दिखने लगा है। कैमूर जिले में भी जिला प्रशासन और शिक्षा महकमे ने युद्धस्तर पर तैयारियां शुरू कर दी हैं। जिले के तमाम प्रखंड शिक्षा पदाधिकारियों को स्पष्ट आदेश दिया गया है कि वे अपने-अपने क्षेत्र के स्कूलों से जुड़े अभिलेखों की गहनता से जांच करें। इसके बाद बिना प्रशिक्षित योग्यता के सेवा दे रहे शिक्षकों की पूरी सूची मात्र तीन दिनों के भीतर जिला मुख्यालय को उपलब्ध कराई जाए।
इस पूरी प्रक्रिया की निगरानी कर रहे अधिकारियों का कहना है कि सूची प्राप्त होते ही जिला स्तर से आगे की विधिवत कार्रवाई अमल में लाई जाएगी। अधिकारियों के अनुसार, यह पूरी कवायद पारदर्शिता के साथ पूरी की जा रही है ताकि किसी भी पात्र शिक्षक के साथ अन्याय न हो, लेकिन नियमों की धज्जियां उड़ाकर नौकरी पाने वालों को किसी भी सूरत में बख्शा नहीं जाएगा। प्रखंड स्तर पर गठित जांच दल दस्तावेजों का मिलान करने में जुट गए हैं।
जिला कार्यक्रम पदाधिकारी ने दी मामले पर आधिकारिक जानकारी
मामले की गंभीरता को स्पष्ट करते हुए जिला कार्यक्रम पदाधिकारी (स्थापना) शंभू कुमार सिंह ने मीडिया से बातचीत में बताया कि मुख्यालय से मिले निर्देशों का पूरी कड़ाई से पालन कराया जा रहा है। उन्होंने कहा कि सभी प्रखंडों के शिक्षा अधिकारियों को पत्र भेजकर तय समयसीमा के भीतर अप्रशिक्षित शिक्षकों का पूरा ब्योरा तलब किया गया है।
"विभाग के स्पष्ट दिशानिर्देश प्राप्त हो चुके हैं। जिले के सभी प्रखंड शिक्षा पदाधिकारियों को निर्देशित किया गया है कि वे तीन दिनों के अंदर अप्रशिक्षित शिक्षकों की सत्यापित सूची उपलब्ध कराएं। सूची मिलने के बाद विभागीय नियमों के अनुरूप ही अगली और निर्णायक कार्रवाई की जाएगी।" — शंभू कुमार सिंह, जिला कार्यक्रम पदाधिकारी स्थापना
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि प्रशासन पूरी तरह से निष्पक्ष और नियमों के दायरे में रहकर काम कर रहा है। जिन शिक्षकों के रिकॉर्ड में तकनीकी खामियां पाई जाएंगी या जो तय मानकों पर खरे नहीं उतरेंगे, उनके खिलाफ नियमानुसार सेवा समाप्ति की अंतिम कार्रवाई की जाएगी।
31 मार्च 2015 से पहले नियुक्त शिक्षकों को मिली बड़ी राहत
इस पूरी कार्रवाई के बीच राज्य सरकार ने पुराने शिक्षकों को एक बड़ी राहत भी दी है। वे शिक्षक जिनकी नियुक्ति 31 मार्च 2015 से पहले हो चुकी थी, उन्हें इस नई और सख्त गाज से सुरक्षित रखा गया है। नियमों के अनुसार, कटऑफ तिथि से पहले सेवा में आए अप्रशिक्षित शिक्षकों को अपनी योग्यता साबित करने और डीएलएड का कोर्स पूरा करने के लिए सरकार ने पर्याप्त समय दिया है।
इन पुराने शिक्षकों के लिए अंतिम समयसीमा 31 अगस्त 2028 तय की गई है। इसका मतलब यह है कि यदि कोई शिक्षक 31 मार्च 2015 से पहले नियुक्त हुआ है और वह अभी भी अप्रशिक्षित है, तो उसकी नौकरी तुरंत नहीं जाएगी, बशर्ते वह निर्धारित मियाद के भीतर अपनी ट्रेनिंग पूरी कर ले। इस प्रावधान से हजारों पुराने शिक्षकों ने राहत की सांस ली है, जो लंबे समय से अपनी नौकरी को लेकर असमंजस में थे।
पुराने मामलों की समीक्षा और सेवा बहाली की उम्मीद
इस नीतिगत निर्देश के आने के बाद पिछले कुछ वर्षों में यानी साल 2024 के दौरान अप्रशिक्षित होने के कारण सेवा से हटाए गए कुछ शिक्षकों के मामलों में भी नया मोड़ आ गया है। विभाग के नए रुख के बाद ऐसे शिक्षकों के लिए भी अपनी नौकरी वापस पाने की उम्मीद जग गई है। यदि किसी शिक्षक को पूर्व में सिर्फ अप्रशिक्षित होने के आधार पर बाहर कर दिया गया था, लेकिन उसकी नियुक्ति 31 मार्च 2015 से पहले की थी, तो उनके मामलों की दोबारा समीक्षा की जा सकती है।
शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार का यह कदम शिक्षा की गुणवत्ता को सुधारने के लिए बेहद जरूरी है, क्योंकि प्राथमिक स्तर पर बच्चों को पढ़ाने वाले शिक्षकों का प्रशिक्षित होना अनिवार्य शर्त है। हालांकि, जिन शिक्षकों की नौकरी खतरे में पड़ी है, वे कानूनी विकल्पों और प्रशासनिक अपीलों पर भी विचार कर रहे हैं। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि कैमूर सहित पूरे बिहार में शिक्षा विभाग इस प्रक्रिया को किस प्रकार अंतिम रूप देता है।







