नई दिल्ली/लखनऊ: 'द फ्रीलान्स' की विशेष ग्राउंड रिपोर्ट के अनुसार, उत्तर प्रदेश के प्रशासनिक गलियारों से लेकर राजनीतिक चौपालों तक इन दिनों एक ही नाम की सबसे ज्यादा चर्चा है—दिव्या मित्तल। आईआईटी (IIT) और आईआईएम (IIM) जैसी देश की शीर्ष संस्थाओं से शिक्षा ग्रहण करने वाली इस मेधावी पूर्व आईएएस अधिकारी ने प्रशासनिक सेवा को अलविदा कहकर राजनीति के अखाड़े में उतरने का साहसिक फैसला किया है। उनके इस कदम ने न केवल नौकरशाही को चौंका दिया है, बल्कि राजनीतिक दलों के भीतर भी समीकरणों पर मंथन शुरू हो गया है।
प्रशासनिक चमक से राजनीतिक मैदान तक का सफर
दिव्या मित्तल का करियर हमेशा से ही एक मिसाल रहा है। एक तेज-तर्रार आईएएस अधिकारी के रूप में उनकी पहचान जनहित के फैसलों और सख्त प्रशासनिक पकड़ के लिए जानी जाती थी। लेकिन, जब उन्होंने अचानक अपनी सरकारी कुर्सी छोड़ने का निर्णय लिया, तो कयासों का बाजार गर्म हो गया था। अब खुद दिव्या मित्तल ने साफ कर दिया है कि वे जनसेवा के अपने दायरे को और व्यापक बनाने के लिए राजनीति का रुख कर रही हैं। यह सवाल अब हर किसी की जुबान पर है कि क्या यह नौकरशाह राजनेता के रूप में अपनी पुरानी चमक बरकरार रख पाएगा?
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'किसी दल के झंडे से नहीं, अपने तरीके से'
राजनीति में अपनी पारी की शुरुआत को लेकर दिव्या मित्तल ने बेहद स्पष्ट रुख अपनाया है। हमारी पड़ताल के मुताबिक, उन्होंने दो टूक कहा है कि वे किसी पारंपरिक दल के झंडे के तले बंधकर नहीं, बल्कि अपने खुद के तरीके और शर्तो पर राजनीति की शुरुआत करेंगी। यह बयान अपने आप में अनूठा है क्योंकि भारत की दलीय राजनीति में स्वतंत्र रूप से अपनी पहचान बनाना किसी चुनौती से कम नहीं होता। क्या वे किसी नई पार्टी का गठन करेंगी या किसी क्षेत्रीय दल के साथ मजबूत गठबंधन बनाएंगी, यह आने वाला वक्त ही बताएगा। लेकिन इतना तय है कि उनकी यह 'स्वतंत्र राह' स्थापित राजनीतिक दलों के रणनीतिकारों को सोचने पर मजबूर कर रही है।
यूपी की सियासत पर क्या होगा असर?
उत्तर प्रदेश की राजनीति हमेशा से जटिल और जातिगत-धार्मिक समीकरणों से संचालित होती रही है। ऐसे में, एक पढ़ी-लिखी, पेशेवर और तेज-तर्रार महिला पूर्व आईएएस का मैदान में उतरना क्या पारंपरिक राजनीति की धारा को बदल पाएगा? जानकारों का मानना है कि शहरी मतदाताओं और युवाओं के बीच दिव्या मित्तल जैसी छवि वाले नेताओं की स्वीकार्यता अधिक होती है। हालांकि, जमीनी स्तर पर चुनावी वैतरणी पार करने के लिए केवल प्रशासनिक योग्यता काफी नहीं होती, बल्कि जनसंपर्क और राजनीतिक कौशल की भी उतनी ही परीक्षा होती है।
नौकरशाही से नेतागिरी का पुराना इतिहास
यह पहला मौका नहीं है जब यूपी या देश में किसी आईएएस-आईपीएस अधिकारी ने 'कुर्सी' छोड़कर राजनीति का दामन थामा हो। इतिहास गवाह है कि कई नौकरशाहों ने राजनीति में कदम रखा, जिनमें से कुछ ने जबरदस्त सफलता हासिल की तो कुछ हाशिए पर चले गए। दिव्या मित्तल का यह कदम इस फेहरिस्त में एक नया अध्याय जोड़ता है। जनता के बीच उनकी छवि और उनके द्वारा चुनी गई नई राजनीतिक राह तय करेगी कि नौकरशाही से नेतागिरी तक का यह सफर कितना लंबा और प्रभावशाली साबित होता है।
'सत्ता और राजनीति केवल पद पाने का जरिया नहीं, बल्कि व्यवस्था में वास्तविक बदलाव लाने का एक माध्यम है।' — दिव्या मित्तल के करीबी सूत्रों के अनुसार उनका मूल दृष्टिकोण।




