भारतीय शेयर बाजार में विदेशी निवेशकों की बिकवाली का दौर तेज
भारतीय शेयर बाजार इन दिनों एक बड़े वित्तीय बदलाव के दौर से गुजर रहा है। पिछले कुछ महीनों से बाजार की चाल पर पैनी नजर रखने वाले विशेषज्ञों का मानना है कि विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) का भारतीय बाजारों से मोहभंग होता नजर आ रहा है। सितंबर के आंकड़े बताते हैं कि विदेशी निवेशकों ने भारी मात्रा में अपनी पूंजी समेट ली है। इस भारी निकासी ने न सिर्फ घरेलू बाजार के निवेशकों की नींद उड़ाई है, बल्कि नीति निर्माताओं के सामने भी कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
आंकड़ों के अनुसार, सितंबर महीने में विदेशी निवेशकों ने शुद्ध रूप से कुल 45,536 करोड़ रुपये भारतीय शेयरों से बाहर निकाल लिए। यह आंकड़ा पिछले कई महीनों की तुलना में काफी बड़ा है और यह इस बात का संकेत है कि वैश्विक स्तर पर रणनीतिक बदलाव हो रहे हैं। जानकारों का कहना है कि जब विदेशी निवेशक इतनी बड़ी मात्रा में पैसे निकालते हैं, तो इसका सीधा असर सूचकांकों और ब्लू-चिप शेयरों पर पड़ता है।
बाजार विशेषज्ञों के मुताबिक, इस भारी बिकवाली के पीछे कई अंतरराष्ट्रीय और घरेलू कारक जिम्मेदार हैं। हालांकि भारत की आर्थिक वृद्धि दर दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के मुकाबले अभी भी मजबूत बनी हुई है, लेकिन इसके बावजूद विदेशी पूंजी का प्रवाह कमजोर हुआ है। एसएंडपी ग्लोबल और क्रिसिल की हालिया रिपोर्ट में भी इस बात की पुष्टि की गई है कि वित्त वर्ष के दौरान विदेशी निवेश पर दबाव लगातार बना हुआ है।
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कच्चे तेल की कीमतें और वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताएं
विदेशी निवेशकों द्वारा पैसा निकाले जाने के पीछे सबसे बड़े कारणों में पश्चिम एशिया में जारी तनाव और कच्चे तेल की ऊंची कीमतें हैं। होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़ी आपूर्ति संबंधी चिंताओं के कारण क्रूड ऑयल के दाम लगातार अस्थिर बने हुए हैं। जब भी कच्चे तेल के दाम चढ़ते हैं, तो भारत जैसे आयातक देशों के चालू खाते के घाटे (CAD) और राजकोषीय स्थिति पर सीधा असर पड़ता है, जिससे विदेशी निवेशक सतर्क हो जाते हैं।
इसके अलावा, अमेरिकी बॉण्ड पर मिलने वाली ऊंची प्रतिफल दर (Yield) ने भी विदेशी निवेशकों को आकर्षित किया है। निवेशक सुरक्षित माने जाने वाले अमेरिकी बाजारों की ओर रुख कर रहे हैं, जिसके चलते उभरते बाजारों जैसे कि भारत से पूंजी की निकासी तेज हो गई है। रुपये की विनिमय दर में उतार-चढ़ाव और डॉलर के मुकाबले उसकी कमजोरी ने भी विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों को मुनाफावसूली करने पर मजबूर किया है।
जुलाई और अगस्त के महीनों में भारतीय शेयरों में जोरदार खरीदारी देखने को मिली थी, जिसके बाद सितंबर में निवेशकों ने ऊंचे स्तरों पर मुनाफावसूली (Profit Booking) करना बेहतर समझा। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आधारित उत्तर एशियाई बाजारों की तरफ भी पूंजी का रुख तेजी से बदला है, जिससे भारतीय इक्विटी बाजार से पैसा बाहर गया है।
टाटा ट्रस्ट्स में अंदरूनी कलह और गवर्नेंस का विवाद
एक तरफ जहां विदेशी निवेशकों की बिकवाली से बाजार दबाव में है, वहीं दूसरी ओर देश के सबसे बड़े औद्योगिक घरानों में शुमार टाटा ग्रुप में अंदरूनी गवर्नेंस को लेकर उठा विवाद भी चर्चा का विषय बना हुआ है। टाटा ट्रस्ट्स के जॉइंट नॉमिनी डायरेक्टर वेणु श्रीनिवासन ने टाटा संस के मामलों में नोएल टाटा की भूमिका और चेयरमैनशिप को लेकर औपचारिक आपत्ति दर्ज कराई है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, श्रीनिवासन ने महाराष्ट्र चैरिटी कमिश्नर को पत्र लिखकर नोएल टाटा को ट्रस्टी और चेयरमैन बनाए रखने के साथ-साथ उनके बेटे नेविल टाटा को ट्रस्टी नियुक्त किए जाने पर भी सवाल उठाए हैं। इस विवाद का मुख्य बिंदु यह है कि क्या चैरिटी ट्रस्ट्स को व्यावसायिक कंपनियों के फैसलों में सीधे तौर पर दखल देना चाहिए या नहीं।
टाटा ग्रुप के भीतर मुख्य रूप से यह मतभेद भी सामने आया है कि क्या 'टाटा संस' को शेयर बाजार में लिस्ट कराया जाना चाहिए या नहीं। वेणु श्रीनिवासन इसके पक्ष में बताए जा रहे हैं, जबकि नोएल टाटा इस कदम के सख्त खिलाफ हैं। इस तरह के वैचारिक और कॉरपोरेट गवर्नेंस के मुद्दों ने निवेशकों के बीच एक अलग तरह की सुगबुगाहट पैदा कर दी है।
माहिरों की राय और आगे की क्या है राह
वित्तीय बाजार के विश्लेषकों का मानना है कि निवेशकों को घबराने की जरूरत नहीं है, बल्कि बाजार के इस दौर को एक स्वाभाविक करेक्शन के रूप में देखना चाहिए। घरेलू संस्थागत निवेशकों (DII) ने जिस प्रकार से बाजार में अपनी पकड़ मजबूत की है, उसने विदेशी निवेशकों की बिकवाली के झटके को काफी हद तक संभाल कर रखा है।
"भारतीय अर्थव्यवस्था के बुनियादी फंडामेंटल्स मजबूत हैं, लेकिन वैश्विक भू-राजनीतिक हालात और ब्याज दरों के रुख के कारण अल्पावधि में उतार-चढ़ाव बना रहेगा। निवेशकों को चुनिंदा शेयरों में ही निवेश करना चाहिए।"— वित्तीय विश्लेषक, द फ्रीलांस रिसर्च विंग
आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या वैश्विक बाजार की स्थितियां सुधरने के बाद विदेशी निवेशक दोबारा भारतीय बाजारों की ओर लौटते हैं या नहीं। फिलहाल, निवेशकों को अपनी पोर्टफोलियो रणनीति को बहुत ही सावधानी के साथ तय करने की सलाह दी जा रही है।





