भारत की सांस्कृतिक विरासत को जीवित रखने वाले लोक कलाकार अक्सर आर्थिक तंगी की दोहरी मार झेलने को मजबूर होते हैं। रोजी-रोटी की जद्दोजहद में कई बार पीढ़ियों पुरानी कलाएं दम तोड़ देती हैं और प्रतिभाशाली कलाकार गुमनामी के अंधेरे में खो जाते हैं। इस गंभीर समस्या को दूर करने के लिए और कला जगत के संरक्षकों को संबल प्रदान करने के लिए सरकार ने कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। अब कलाकारों को सिर्फ अपनी कला पर ध्यान केंद्रित करने की छूट होगी, क्योंकि उनकी आजीविका की सुरक्षा के लिए विभिन्न प्रकार की वित्तीय सहायता योजनाएं धरातल पर उतर चुकी हैं।
मुख्यमंत्री कलाकार पेंशन योजना से बुढ़ापे और संकट में संबल
लंबे समय तक कला के क्षेत्र में अमूल्य योगदान देने वाले कलाकारों को अक्सर वृद्धावस्था में भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। ऐसे उपेक्षित और जरूरतमंद कलाकारों के लिए मुख्यमंत्री कलाकार पेंशन योजना एक बड़ा सुरक्षा कवच बनकर सामने आई है। इस योजना का मुख्य उद्देश्य वरिष्ठ कलाकारों को वित्तीय रूप से स्वतंत्र बनाना है ताकि उन्हें अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए किसी पर निर्भर न रहना पड़े।
योजना का लाभ उठाने के लिए आवेदक की आयु कम से कम 50 वर्ष होनी चाहिए और वह संबंधित राज्य का मूल निवासी होना चाहिए। इसके साथ ही, कला के क्षेत्र में उसका न्यूनतम 10 वर्षों का सक्रिय अनुभव होना अनिवार्य शर्त है। पात्र कलाकारों की वार्षिक आय 1.20 लाख रुपये से अधिक नहीं होनी चाहिए और वे किसी भी प्रकार की सरकारी सेवा में कार्यरत नहीं होने चाहिए। इसके लिए विभागीय पोर्टल पर ऑनलाइन पंजीकरण कराना जरूरी होता है।
"कला संस्कृति हमारी पहचान है, और इसे बचाने वाले कलाकारों की आर्थिक सुरक्षा सुनिश्चित करना हमारा नैतिक दायित्व है। कोई भी कलाकार तंगी के कारण अपनी साधना न छोड़े, इसके लिए सरकार हरसंभव प्रयास कर रही है।" — जिला कला एवं संस्कृति अधिकारी
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गुरु-शिष्य परंपरा योजना से बचेंगी दुर्लभ और विलुप्त होती कलाएं
आधुनिकता की दौड़ में देश की कई प्राचीन और दुर्लभ कला विधाएं विलुप्ति के कगार पर पहुंच चुकी हैं। इन अमूल्य परंपराओं को अगली पीढ़ी तक सुरक्षित पहुंचाने के लिए गुरु-शिष्य परंपरा योजना बेहद अहम भूमिका निभा रही है। इस योजना के माध्यम से पारंपरिक कलाओं के उस्ताद अपनी विधाओं का ज्ञान नई पीढ़ी को दे रहे हैं, जिससे कला का यह सिलसिला बिना किसी रुकावट के आगे बढ़ता रहे।
इस योजना के नियमों के अनुसार, गुरु की न्यूनतम आयु 50 वर्ष तय की गई है, जबकि प्रशिक्षण लेने वाले शिष्यों की उम्र 16 से 35 वर्ष के बीच होनी चाहिए। प्रशिक्षण प्रक्रिया को सुचारू रूप से चलाने के लिए चयनित गुरु को 15 हजार रुपये प्रति माह मानदेय दिया जाता है, वहीं उनके साथ सहयोग करने वाले संगत कलाकार को 7,500 रुपये और प्रत्येक शिष्य को तीन हजार रुपये मासिक छात्रवृत्ति मिलती है। एक कला विधा के अंतर्गत अधिकतम आठ शिष्यों को इस प्रशिक्षण का हिस्सा बनाया जाता है ताकि गुणवत्ता से कोई समझौता न हो।
कलाकार कल्याण कोष से चिकित्सा और उपकरणों के लिए बड़ी मदद
कलाकारों के जीवन में आने वाले अचानक संकटों जैसे गंभीर बीमारी, दुर्घटना या महंगे वाद्ययंत्रों की खरीद के लिए कलाकार कल्याण कोष संजीवनी का काम कर रहा है। कई बार कलाकार महंगे उपकरण या चिकित्सा खर्च न उठा पाने के कारण अपनी कला से दूर हो जाते हैं। इस कोष के जरिए उन्हें आपातकालीन परिस्थितियों में तुरंत वित्तीय सहायता मुहैया कराई जाती है।
प्रावधानों के मुताबिक, यदि कोई कलाकार गंभीर रूप से बीमार हो जाता है या दुर्घटना का शिकार होता है, तो उसे इलाज के लिए अधिकतम दो लाख रुपये तक की सहायता मिल सकती है। इसके अलावा प्रदर्शन और चाक्षुष कलाओं के विकास के लिए भी दो लाख रुपये तक की मदद का प्रावधान है। वहीं, रियायती दरों पर या अनुदान के रूप में वाद्ययंत्र, संगीत उपकरण और अन्य आवश्यक कला सामग्री खरीदने के लिए 50 हजार रुपये तक की आर्थिक मदद दी जाती है।
आम्रपाली प्रशिक्षण केंद्र के जरिए युवाओं को मिल रहा पेशेवर मंच
नवोदित और युवा कलाकारों को सही दिशा में प्रशिक्षित करने के लिए आधुनिक सुविधाओं से लैस प्रशिक्षण केंद्रों की स्थापना की जा रही है। ऐसे ही एक केंद्र के रूप में बक्सर में संचालित आम्रपाली प्रशिक्षण केंद्र युवाओं के बीच काफी लोकप्रिय हो रहा है। यहां अनुभवी और योग्य गुरुओं द्वारा शास्त्रीय नृत्य, संगीत, गायन और विभिन्न वाद्ययंत्रों का विधिवत प्रशिक्षण दिया जा रहा है।
इस केंद्र का मुख्य उद्देश्य ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों की छिपी हुई प्रतिभाओं को तलाशकर उन्हें पेशेवर स्तर पर निखारना है। प्रशिक्षित युवा आगे चलकर कला जगत में अपनी मजबूत पहचान बना रहे हैं और अपनी संस्कृति का परचम लहरा रहे हैं। इन तमाम योजनाओं की विस्तृत जानकारी और आवेदन की प्रक्रिया विभागीय वेबसाइट पर आसानी से उपलब्ध है, जिससे पात्र कलाकार बिना किसी परेशानी के इसका लाभ उठा सकते हैं।
निष्कर्ष
संस्कृति किसी भी राष्ट्र की आत्मा होती है और उसे जीवंत रखने वाले कलाकार उसके प्राण होते हैं। सरकार द्वारा चलाई जा रही ये पेंशन, छात्रवृत्ति और कल्याणकारी योजनाएं उन कलाकारों के लिए उम्मीद की एक नई किरण हैं जो अभावों के कारण अपनी कला छोड़ने को मजबूर हो जाते थे। यदि इन योजनाओं का लाभ सही समय पर और पारदर्शिता के साथ जरूरतमंदों तक पहुंचेगा, तो देश की लोक कलाएं और समृद्ध परंपराएं हमेशा के लिए अमर हो जाएंगी।








