नई दिल्ली/इंदौर — देश के मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानवेश कुमार इस समय प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारों में एक साथ कई वजहों से चर्चा का केंद्र बने हुए हैं। द फ्रीलान्स की टीम ने जब गूगल ट्रेंड्स और विभिन्न मीडिया स्रोतों की पड़ताल की, तो पता चला कि उनके नाम पर इस समय दो अलग-अलग तरह की खबरें बहुत तेजी से आम लोगों के बीच आ रही हैं। एक तरफ जहां उनके पुराने बयानों और एक पुराने मामले को लेकर राजनीतिक सवाल उठाए जा रहे हैं, तो वहीं दूसरी तरफ वे चुनाव सुधारों और जमीनी स्तर के प्रशासनिक कामों में पूरी तरह जुटे हुए हैं। आम जनता और पाठकों के लिए यह जानना जरूरी है कि इस पूरे घटनाक्रम की असलियत क्या है और चुनाव आयोग इस समय किन अहम चुनौतियों का सामना कर रहा है।
शुरुआत इस बात से करते हैं कि हाल ही में उर्दू अखबारों और कुछ अन्य मीडिया मंचों पर यह मांग उठाई गई थी कि मुख्य चुनाव आयुक्त को अपने पद से हट जाना चाहिए क्योंकि आयोग की साख दांव पर लगी है। इस मांग के पीछे कुछ पुराने वाक्यों और पुराने मामलों का हवाला दिया जा रहा है, जिनमें एक सुसाइड नोट में उनका नाम आने का भी जिक्र मीडिया रिपोर्ट्स में किया गया है। जानकारों का कहना है कि चुनाव आयोग जैसी बड़ी संवैधानिक संस्था के मुखिया पर जब इस तरह के सवाल उठते हैं, तो लोकतांत्रिक व्यवस्था में उस पर बहस होना लाजमी हो जाता है। हालांकि, इन तमाम बहसों के बीच चुनाव आयोग की तरफ से अपने तय प्रशासनिक कामकाज और चुनावी तैयारियों पर पूरा ध्यान दिया जा रहा है, ताकि देश की लोकतांत्रिक प्रक्रिया में किसी भी तरह की कोई रुकावट न आए।
इंदौर में बूथ स्तर के अधिकारियों का बड़ा सम्मेलन
विवादों और बहसों के बीच मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानवेश कुमार ने अपना प्रशासनिक दौरा जारी रखा है और वे हाल ही में मध्य प्रदेश के इंदौर शहर पहुंचे। इंदौर में उन्होंने बूथ स्तर के अधिकारियों यानी बीएलओ के एक बड़े सम्मेलन में हिस्सा लिया। इस सम्मेलन का मुख्य मकसद देश में चुनावी मशीनरी को मजबूत करना और जमीनी स्तर पर काम करने वाले कर्मचारियों का हौसला बढ़ाना था। चुनाव आयोग का यह साफ मानना है कि देश में निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव कराने की सबसे बड़ी जिम्मेदारी बूथ स्तर पर काम करने वाले इन कर्मचारियों की ही होती है। जब अधिकारी मजबूत होंगे और उन्हें सही दिशा-निर्देश मिलेंगे, तभी आम वोटर बिना किसी डर या परेशानी के अपने मताधिकार का इस्तेमाल कर सकेगा।
इस सम्मेलन के दौरान मुख्य चुनाव आयुक्त ने अधिकारियों से सीधे संवाद किया और उन्हें आगामी चुनावी चुनौतियों के लिए पूरी तरह तैयार रहने को कहा। उन्होंने इस बात पर बहुत जोर दिया कि आज के समय में तकनीक और सोशल मीडिया के जरिए बहुत सारी फर्जी खबरें फैलाई जा रही हैं। चुनाव के समय इन गलत जानकारियों से आम जनता भ्रमित हो सकती है और कई बार चुनाव की पूरी प्रक्रिया पर भी सवालिया निशान लग जाते हैं। इसलिए, सभी अधिकारियों का यह कर्तव्य बनता है कि वे ऐसी झूठी और भ्रामक जानकारियों का तुरंत खंडन करें। सही और आधिकारिक आंकड़े समय पर जनता के सामने लाए जाने चाहिए ताकि किसी भी तरह की अफवाह को फैलने से रोका जा सके।
फर्जी खबरों से निपटने के लिए आयोग की सख्त रणनीति
आज के दौर में सोशल मीडिया पर फेक न्यूज या गलत खबरें फैलाना एक बहुत बड़ी समस्या बन चुका है। चुनाव आयोग इस बात को लेकर पूरी तरह सतर्क है कि देश में होने वाले चुनाव किसी भी तरह के डिजिटल दुष्प्रचार का शिकार न बनें। इंदौर के सम्मेलन में ज्ञानवेश कुमार ने साफ शब्दों में कहा कि जिला प्रशासन और चुनाव से जुड़े सभी अधिकारियों को सोशल मीडिया पर पैनी नजर रखनी होगी। यदि कहीं से भी कोई झूठी खबर फैलाई जाती है, तो उसकी सच्चाई का पता लगाकर तुरंत उसका जवाब देना जरूरी है। चुनाव आयोग का यह निर्देश उन तमाम लोगों के लिए एक कड़ा संदेश है जो चुनावों के दौरान माहौल खराब करने की कोशिश करते हैं।
मैदान पर काम करने वाले कई बूथ अधिकारियों ने द फ्रीलान्स से बातचीत में बताया कि इस तरह के सम्मेलनों से उन्हें बहुत मदद मिलती है। जब देश का मुख्य चुनाव आयुक्त खुद आकर उनसे बात करता है और उनकी समस्याएं सुनता है, तो काम करने का हौसला काफी बढ़ जाता है। अधिकारियों का कहना है कि उन्हें निर्देश मिला है कि वे अपने-अपने इलाकों में लोगों को जागरूक करें और मतदान के प्रति उनका विश्वास मजबूत करें। फर्जी खबरों से लड़ने के लिए जमीनी स्तर पर कमेटियां भी बनाई जा रही हैं जो हर एक बात पर नजर रख रही हैं।
संस्था की साख और आगे की प्रशासनिक चुनौतियां
एक तरफ जहां राजनीतिक गलियारों में उनके पुराने मामलों और फैसलों को लेकर आलोचनाएं हो रही हैं, वहीं दूसरी तरफ चुनाव आयोग अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी निभाने में पूरी ताकत से जुटा हुआ है। देश के सबसे बड़े लोकतंत्र को सुचारू रूप से चलाने के लिए चुनाव आयोग की निष्पक्षता सबसे अहम मानी जाती है। जानकारों का मानना है कि जब तक चुनाव आयोग पारदर्शी तरीके से काम करता रहेगा, तब तक संस्था की साख पर कोई बड़ा आंच नहीं आ सकती। द फ्रीलान्स की इस ग्राउंड पड़ताल से यह साफ हो जाता है कि मौजूदा समय में मुख्य चुनाव आयुक्त के सामने एक साथ दोहरी चुनौती है—एक तरफ विरोधियों के तीखे सवालों का सामना करना और दूसरी तरफ देश भर में चुनावी मशीनरी को चुस्त-दुरुस्त रखना। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि आयोग इन दोनों मोर्चों पर किस तरह संतुलन बनाकर आगे बढ़ता है।



