शिक्षा का बढ़ता दायरा और बेरोजगारी का गहराता संकट
आज के दौर में शिक्षा केवल साक्षरता का माध्यम नहीं, बल्कि भविष्य की सुरक्षा का मुख्य जरिया मानी जाती है। यही कारण है कि देश में स्कूल से लेकर विश्वविद्यालयों तक युवाओं की भीड़ बढ़ती जा रही है। सरकारी और निजी शिक्षण संस्थानों के नेटवर्क में भारी विस्तार हुआ है, जिसके चलते उच्च शिक्षा पाने वाले छात्र-छात्राओं की संख्या में हर साल रिकॉर्ड उछाल आ रहा है। इसके बावजूद, एक कड़वी सच्चाई यह है कि हमारे परिसरों से निकलने वाले युवा रोजगार के बाजार में जाकर अक्सर खाली हाथ लौट आते हैं। क्या हमारी शिक्षा प्रणाली महज डिग्रियां बांटने का कारखाना बनकर रह गई है?
विभिन्न श्रम बाजार सर्वेक्षणों और सरकारी आंकड़ों पर नजर डालें तो यह बात साफ हो जाती है कि कागजी डिग्रियां और व्यावहारिक योग्यता के बीच एक बहुत बड़ी खाई पैदा हो चुकी है। उच्च शिक्षण संस्थानों से निकलने वाले नौजवानों के पास बड़ी-बड़ी डिग्रियां तो होती हैं, लेकिन जब बात किसी कंपनी या निजी क्षेत्र में काम करने की आती है, तो वे जरूरी कसौटियों पर खरे नहीं उतर पाते। इस स्थिति ने देश के नीति निर्माताओं और शिक्षाविदों के सामने एक बड़ा यक्ष प्रश्न खड़ा कर दिया है कि आखिर युवा पढ़ तो रहे हैं, पर वे सीख क्या रहे हैं?
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डिग्री और जॉब मार्केट के बीच की गहरी खाई
भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC) के पूर्व महानिदेशक और प्रख्यात मीडिया विशेषज्ञ प्रोफेसर संजय द्विवेदी का मानना है कि हमारी शिक्षा व्यवस्था में बुनियादी सुधार की सख्त जरूरत है। उनका कहना है कि जिस तरह एक भाषा का छात्र वर्षों पढ़ाई करने के बाद भी शुद्ध और प्रभावी भाषा नहीं लिख पाता, ठीक उसी तरह अन्य विषयों के विद्यार्थी भी अपनी डिग्रियों के अनुरूप कौशल विकसित करने में असफल साबित हो रहे हैं। कौशल विकास के तमाम नारों और दावों के बावजूद जमीन पर स्थिति में अपेक्षित बदलाव नहीं आया है।
निजी विश्वविद्यालयों की भारी-भरकम फीस और वहां मिलने वाली शिक्षा की गुणवत्ता के बीच का अंतर भी लगातार बहस का विषय रहा है। कई जगहों पर विद्यार्थियों के साथ ज्ञान प्राप्त करने वाले छात्र के बजाय एक ग्राहक जैसा बर्ताव होने लगा है। छात्र मोटी रकम देकर डिग्री तो हासिल कर लेते हैं, लेकिन जब वे कारपोरेट जगत या निजी क्षेत्र के दरवाजे पर पहुंचते हैं, तो उन्हें महसूस होता है कि उनकी पढ़ाई उन्हें उस दुनिया के लिए तैयार ही नहीं कर पाई है।
उद्योग जगत की मांग और पारंपरिक शिक्षा की विसंगति
निजी क्षेत्र या आधुनिक श्रम बाजार की जरूरतें अब पूरी तरह बदल चुकी हैं। आज के समय में केवल किताबी ज्ञान या परीक्षा पास कर लेना ही पर्याप्त नहीं है। नियोक्ताओं को ऐसे युवाओं की तलाश होती है जिनके पास सक्रिय व्यक्तित्व, शानदार संवाद-कौशल, तकनीकी दक्षता, जटिल समस्याओं को सुलझाने का हुनर और बदलती परिस्थितियों के मुताबिक खुद को ढालने की क्षमता हो। लेकिन विडंबना यह है कि हमारे अधिकांश शिक्षण संस्थान आज भी पुराने और पारंपरिक पाठ्यक्रम पर ही टिके हुए हैं।
"डिग्रियां सिर्फ प्रवेश पत्र सरीखी हैं, जबकि आपका कौशल ही आपको मैदान में टिकाए रख सकता है। शिक्षा का उद्देश्य केवल प्रमाणपत्र देना नहीं, बल्कि व्यक्ति को जीवन और समाज की चुनौतियों से जूझने योग्य बनाना है।" — प्रो. संजय द्विवेदी, शिक्षाविद् एवं पूर्व महानिदेशक, आईआईएमसी
उद्योगों की इस मांग और शिक्षण संस्थानों की आपूर्ति के बीच तालमेल न होने के कारण ही देश के युवा उच्च डिग्रियां हासिल करने के बाद भी छोटे-मोटे या अस्थायी कामों पर निर्भर रहने को मजबूर हैं। शोध की गुणवत्ता, छात्र-शिक्षक अनुपात और प्रायोगिक शिक्षा के मामले में हमारे संस्थान अभी भी वैश्विक मानकों से काफी पीछे चल रहे हैं। जब तक शिक्षा का यह मॉडल नहीं बदलेगा, तब तक बेरोजगारी का यह चक्रव्यूह टूट नहीं पाएगा।
स्कूली स्तर से ही व्यावसायिक शिक्षा को बढ़ावा देने की जरूरत
नई शिक्षा नीति में इस बात पर विशेष जोर दिया गया है कि स्कूली स्तर से ही, खासकर छठी कक्षा के बाद, व्यावसायिक और कौशलपरक शिक्षा को मुख्यधारा में शामिल किया जाए। लेकिन क्या हमारे मौजूदा स्कूल और कॉलेज इस बदलाव को अपनाने के लिए पूरी तरह तैयार हैं? देश की सामाजिक और भौगोलिक विविधता को देखते हुए एक जैसी शिक्षा प्रणाली लागू करना अपने आप में एक बड़ी चुनौती है। महानगरों में सुविधाओं का अंबार है, लेकिन गांवों, आदिवासी और वनवासी इलाकों के स्कूलों में शिक्षकों की भारी कमी आज भी बनी हुई है।
सरकारी और निजी दोनों ही क्षेत्र मिलकर देश की पूरी शैक्षिक जरूरत को गुणवत्ता के साथ पूरा करने में अभी तक नाकाम रहे हैं। देश में कई स्तरों की शिक्षा व्यवस्था पैदा हो गई है, जिससे समान शिक्षा और समान अवसर का सपना एक दूर की कौड़ी साबित हो रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों के शिक्षक शहरी इलाकों में नौकरी करना पसंद करते हैं, जिससे दूरदराज के इलाकों में पढ़ाई का स्तर लगातार गिरता जा रहा है।
ज्ञान और कौशल-केंद्रित शिक्षा से ही खुलेगा तरक्की का रास्ता
यदि भारत को अपने विशाल जनसांख्यिकीय लाभांश (Demographic Dividend) का वास्तविक लाभ उठाना है, तो हमें मात्रात्मक विस्तार की दौड़ से बाहर निकलकर गुणात्मक उत्कृष्टता पर ध्यान देना होगा। विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों को ऐसे नौजवान तैयार करने होंगे जो सिर्फ नौकरी तलाशने वाले न बनें, बल्कि अपनी बुद्धिमत्ता और हुनर से नए रोजगार पैदा करने की कुव्वत भी रखते हों।
समय आ गया है कि हमारी पूरी शिक्षा व्यवस्था 'डिग्री-केंद्रित' सोच से बाहर निकलकर 'ज्ञान, कौशल और व्यक्तित्व-केंद्रित' बने। जब तक डिग्रियों के साथ व्यावहारिक हुनर नहीं जुड़ेगा, तब तक युवाओं की काबिलियत अधूरी ही रहेगी। शिक्षा परिसरों को केवल प्रमाणपत्र बांटने वाले केंद्र बनने के बजाय युवाओं के भविष्य को संवारने वाली असली प्रयोगशाला बनना होगा, तभी देश का मानव संसाधन वैश्विक प्रतिस्पर्धा में मजबूत स्थिति हासिल कर पाएगा।







