सरकारी अस्पतालों की कार्यप्रणाली पर उठ रहे गंभीर सवाल
देशभर के सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों में आम जनता को बेहतर इलाज और सुविधाएं देने के तमाम दावे किए जाते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत इन दावों की पोल खोलती नजर आती है। ताजा मामला एक बड़े सरकारी मेडिकल कॉलेज से जुड़ा है, जहां अस्पताल के भीतर चल रहे अवैध वसूली के खेल ने सबको चौंका दिया है। मरीज के तीमारदारों से बुनियादी सेवाओं के नाम पर सुविधा शुल्क वसूलने का एक वीडियो इन दिनों सोशल मीडिया पर तेजी से तैर रहा है। इस वीडियो ने न केवल अस्पताल प्रशासन की कार्यशैली पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि स्वास्थ्य व्यवस्थाओं की पोल भी खोल कर रख दी है।
वायरल फुटेज में साफ तौर पर देखा जा सकता है कि अस्पताल का एक कर्मचारी किस तरह खुलेआम नियमों को ताक पर रखकर कागजी कार्रवाई कर रहा है। मरीज और उनके परिजन पहले से ही बीमारी और अस्पताल के चक्कर काटकर परेशान रहते हैं, ऐसे में उनसे इस तरह की अवैध वसूली उनके जख्मों पर नमक छिड़कने जैसी है। आम आदमी जब अपनी गाढ़ी कमाई का हिस्सा इलाज में लगाता है और ऊपर से इस तरह की मनमानी का शिकार होता है, तो उसका सरकारी तंत्र से भरोसा उठने लगता है।
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वार्ड बॉय के हाथ में मरीजों की फाइल और डिस्चार्ज का जिम्मा
सामने आए वीडियो की सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इसमें एक वार्ड बॉय मरीजों के डिस्चार्ज से जुड़े महत्वपूर्ण कागजात तैयार करते हुए नजर आ रहा है। चिकित्सा जगत के स्थापित नियमों के मुताबिक, किसी भी मरीज को अस्पताल से छुट्टी देने का अधिकार केवल और केवल संबंधित चिकित्सक के पास होता है। डॉक्टर मरीज की सेहत की पूरी जांच करते हैं, उनकी रिकवरी का आकलन करते हैं और उसके बाद ही डिस्चार्ज स्लिप पर हस्ताक्षर करते हैं।
लेकिन इस मामले में डॉक्टर की गैरमौजूदगी में वार्ड बॉय खुद ही डॉक्टर की भूमिका निभाता दिखाई दिया। उसने न केवल मरीजों की फाइल संभाली बल्कि डिस्चार्ज पेपर भी खुद ही तैयार कर डाले। अस्पताल के गलियारों में इस तरह की मनमानी यह साबित करती है कि कई जगहों पर नियमों को ताक पर रख दिया गया है। जब अस्पताल के निचले स्तर के कर्मचारी इस तरह के अहम फैसले खुद लेने लगें, तो मरीजों की जान जोखिम में पड़ना स्वाभाविक है।
रिश्वतखोरी का वीडियो वायरल होने के बाद मचा हड़कंप
जैसे ही यह वीडियो इंटरनेट के विभिन्न प्लेटफार्मों पर वायरल हुआ, स्वास्थ्य महकमे में भूचाल आ गया। रातों-रात वीडियो के चर्चे होने लगे और आम जनता ने इस पर कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की। लोग सोशल मीडिया पर अस्पताल प्रशासन को आड़े हाथों ले रहे हैं और दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग कर रहे हैं। इस तरह के मामलों से संस्थान की छवि को गहरा धक्का लगता है।
अस्पताल के उच्च अधिकारियों तक जब यह मामला पहुंचा, तो वे भी स्थिति की गंभीरता को भांप गए। आनन-फानन में आंतरिक स्तर पर सुगबुगाहट शुरू हुई और पूरे घटनाक्रम की सत्यता को टटोला जाने लगा। हालांकि इस तरह के मामलों में अक्सर शुरुआती दौर में लीपापोती की कोशिशें होती हैं, लेकिन जनआक्रोश को देखते हुए इस बार प्रशासन के लिए खामोश बैठना मुमकिन नहीं था।
मेडिकल कॉलेज प्रशासन ने दिए जांच के सख्त आदेश
मामले के तूल पकड़ने के बाद मेडिकल कॉलेज के जिम्मेदार अधिकारियों ने चुप्पी तोड़ी है। अस्पताल के उप प्राचार्य ने मीडिया से बातचीत में इस पूरी घटना की पुष्टि करते हुए इसे गंभीर अनियमितता करार दिया है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि एक वार्ड बॉय द्वारा डिस्चार्ज पेपर तैयार करना और इसके एवज में तीमारदारों से पैसे लेना पूरी तरह से गैरकानूनी और नियमों के खिलाफ है।
"वार्ड में भर्ती मरीज का डिस्चार्ज पेपर वार्ड बॉय की ओर से तैयार किया जाना पूरी तरह गलत है। डिस्चार्ज के नाम पर तीमारदार से धनराशि लेने की जो शिकायत सामने आई है, उसकी निष्पक्ष जांच कराई जाएगी। जांच में आरोप सही पाए जाने पर संबंधित कर्मचारी के खिलाफ सख्त से सख्त कार्रवाई की जाएगी। हमारे संस्थान में किसी भी प्रकार की अवैध वसूली को बिल्कुल बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।" — डॉ. अनिल यादव, उप प्राचार्य, मेडिकल कॉलेज
प्रशासन की ओर से एक जांच समिति गठित किए जाने की बात कही गई है, जो इस पूरे वीडियो की सत्यता और इसमें शामिल लोगों की संलिप्तता की गहराई से पड़ताल करेगी। अधिकारियों का दावा है कि यदि कोई भी कर्मचारी इस तरह की अवैध गतिविधियों में संलिप्त पाया जाता है, तो उसे बख्शा नहीं जाएगा और अनुशासनात्मक कार्रवाई के साथ कानूनी कदम भी उठाए जाएंगे।
अस्पताल प्रबंधन और सुरक्षा व्यवस्था पर उठते बड़े प्रश्न
यह घटना केवल एक कर्मचारी की गलती भर नहीं है, बल्कि यह पूरे अस्पताल प्रबंधन की लापरवाही को उजागर करती है। सवाल यह उठता है कि क्या वार्ड के भीतर डॉक्टर और वरिष्ठ कर्मचारियों का कोई नियंत्रण नहीं है? अगर वार्ड बॉय खुलेआम इस तरह के काम कर रहे थे, तो क्या वहां तैनात अन्य सुरक्षाकर्मी और अधिकारी आंखें मूंदकर बैठे थे? ऐसे मामलों से यह साफ होता है कि निगरानी तंत्र में कहीं न कहीं बहुत बड़ी चूक है।
मरीजों की सुरक्षा और अस्पताल की गरिमा को बनाए रखने के लिए यह जरूरी है कि इस तरह के मामलों में केवल जुबानी कार्रवाई न हो, बल्कि एक ठोस मिसाल कायम की जाए। जब तक भ्रष्ट और लापरवाह कर्मियों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई नहीं होगी, तब तक आम आदमी का शोषण रुक नहीं सकता। आने वाले दिनों में जांच रिपोर्ट के आधार पर क्या कदम उठाए जाते हैं, इस पर सबकी निगाहें टिकी हुई हैं।





