द फ्रीलान्स, नई दिल्ली/कजान: भू-राजनीतिक मोर्चे पर एक बार फिर भारत और चीन के रिश्तों की सुई आगे खिसकती दिख रही है। ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के इतर कूटनीतिक गलियारों से जो खबरें छनकर आ रही हैं, वे दोनों एशियाई दिग्गजों के बीच संवाद की बहाली की ओर इशारा करती हैं। सबसे बड़ा और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण घटनाक्रम भारतीय विमानों के लिए चीनी एयरस्पेस के इस्तेमाल को दोबारा शुरू करने को लेकर चल रही उच्चस्तरीय बातचीत से जुड़ा है। यदि यह कूटनीतिक पहल परवान चढ़ती है, तो इससे न केवल एयरलाइंस का ऑपरेशनल खर्च और समय घटेगा, बल्कि व्यापारिक और कूटनीतिक बर्फ पिघलने का भी संकेत मिलेगा।
चीनी एयरस्पेस पर मंथन: समय और ईंधन की भारी बचत की उम्मीद
गलवान घाटी की झड़पों के बाद से दोनों देशों के बीच उपजे तनाव का असर नागरिक उड्डयन पर भी गहरा पड़ा था। भारतीय एयरलाइंस को पश्चिम एशिया और यूरोप जाने वाली उड़ानों के लिए लंबे और महंगे रूट लेने पड़ रहे थे, क्योंकि चीनी एयरस्पेस के कुछ हिस्सों तक पहुंच सीमित या बंद कर दी गई थी। अब जबकि दोनों देशों के शीर्ष नेतृत्व ने कूटनीतिक संवाद के द्वार खोले हैं, भारतीय विमानों के लिए चीनी हवाई क्षेत्र से गुजरने की संभावनाओं पर गंभीर बातचीत चल रही है। द फ्रीलान्स के कूटनीतिक सूत्रों के अनुसार, एविएशन और विदेश मंत्रालय के अधिकारी तकनीकी और रणनीतिक पहलुओं को साधते हुए इस प्रस्ताव को अंतिम रूप देने में जुटे हैं।
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रूसी कैमरे में कैद 'इज इट ओके?': बॉडी लैंग्वेज के मायने
कजान में आयोजित ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग की द्विपक्षीय मुलाकातों ने वैश्विक मीडिया का ध्यान खींचा है। हाल ही में रूसी मीडिया और कैमरों द्वारा जारी किए गए कुछ नए वीडियो फुटेज सामने आए हैं, जिनमें दोनों नेताओं के बीच सहज संवाद और बॉडी लैंग्वेज के गहरे निहितार्थ तलाशे जा रहे हैं। एक अनौपचारिक क्षण में पीएम मोदी द्वारा शी चिनफिंग से पूछा गया 'इज इट ओके?' कूटनीतिक हलकों में खासी चर्चा का विषय बन गया है। विश्लेषकों का मानना है कि यह आपसी संवाद दोनों देशों के शीर्ष स्तर पर जमी बर्फ को पिघलाने और सीमा विवाद से इतर आर्थिक-व्यापारिक मोर्चे पर सामान्य स्थिति बहाल करने की एक सोची-समझी कोशिश हो सकती है।
'ग्रेटर ब्रिक्स' का प्रस्ताव और अमेरिकी-यूरोपीय वर्चस्व को चुनौती
शिखर सम्मेलन के मंच से चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने 'ग्रेटर ब्रिक्स' के विस्तार का प्रस्ताव रखकर पश्चिमी देशों, विशेषकर अमेरिका और यूरोप की आर्थिक नीतियों पर बिना नाम लिए तीखा तंज कसा है। वैश्विक दक्षिण (Global South) को एकजुट करने की इस कवायद में भारत की भूमिका बेहद अहम हो गई है। हालांकि, ब्रिक्स के भीतर करेंसी के वर्चस्व और वित्तीय ढांचे को लेकर तमाम कयास लगाए जा रहे हैं, लेकिन भारत अपनी स्वतंत्र विदेश नीति और 'डिफेंस व डीप-टेक इनोवेशन' की ब्रांडिंग के साथ सम्मेलन में मजबूत उपस्थिति दर्ज करा रहा है। भारत ने अपनी तकनीकी क्षमताओं की जो प्रदर्शनी कजान में लगाई है, वह यह साबित करती है कि वह वैश्विक मंच पर किसी के पिछलग्गू बनने के बजाय एक स्वतंत्र ध्रुव के रूप में उभर रहा है।
भविष्य का भू-राजनीतिक असर
भारतीय विमानों के लिए चीनी एयरस्पेस का खुलना केवल एक तकनीकी फैसला नहीं है, बल्कि यह भविष्य के द्विपक्षीय संबंधों का एक बैरोमीटर भी साबित हो सकता है। यदि दोनों देश आसमान के रास्ते को सुगम बनाने में सफल होते हैं, तो यह जमीनी स्तर पर यानी वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर गश्त और सेनाओं के पीछे हटने की प्रक्रिया को भी गति दे सकता है। द फ्रीलान्स की यह पड़ताल स्पष्ट करती है कि कूटनीति के मंच पर तल्खी के बीच संवाद के नए रास्ते तलाशने की यह कसरत एशिया के भविष्य की दिशा तय करने में मील का पत्थर साबित हो सकती है।








