वैश्विक रक्षा बाजार में भारत का बढ़ता दबदबा
भारतीय रक्षा उद्योग ने अंतरराष्ट्रीय पटल पर एक नया मील का पत्थर हासिल कर लिया है। देश में निर्मित अत्याधुनिक हथियार प्रणालियां अब दुनिया भर के कई देशों की रक्षा जरूरतों का अहम हिस्सा बनती जा रही हैं। वैश्विक रक्षा मंचों पर भारत की स्वदेशी तकनीकी क्षमता की गूंज सुनाई दे रही है, और इसका सबसे बड़ा उदाहरण हमारी मिसाइल प्रणालियों की रिकॉर्ड तोड़ मांग है। रक्षा मंत्रालय के शीर्ष अधिकारियों के अनुसार, मित्र राष्ट्र अब भारतीय रक्षा उपकरणों पर भरोसा जता रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत का रक्षा निर्यात अब केवल पारंपरिक हथियारों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उच्च तकनीक वाले रणनीतिक हथियारों की श्रेणी में भी मजबूती से अपनी जगह बना चुका है। मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत की पहलों ने घरेलू रक्षा उत्पादन को एक नई गति दी है, जिसके परिणामस्वरूप दुनिया के कई देश अपनी सुरक्षा को चाक-चौबंद करने के लिए भारतीय रक्षा प्रणालियों का रुख कर रहे हैं।
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ब्रह्मोस मिसाइल के निर्यात ने पार किए नए आयाम
भारत की सबसे घातक सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल 'ब्रह्मोस' की लोकप्रियता अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आसमान छू रही है। रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण बयान में खुलासा किया है कि ब्रह्मोस मिसाइल का कुल निर्यात बहुत जल्द 600 मिलियन डॉलर के आंकड़े को पार करने वाला है। फिलीपींस, इंडोनेशिया और वियतनाम जैसे दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के साथ इस अत्याधुनिक हथियार प्रणाली को बेचने के लिए पुख्ता अनुबंध और समझौते संपन्न हो चुके हैं।
फिलीपींस के साथ हुआ सौदा करीब 33 करोड़ डॉलर का है, जिसके तहत मिसाइलों की खेप की डिलीवरी भी शुरू हो चुकी है। इसके अलावा, वियतनाम और इंडोनेशिया के साथ भी करोड़ों डॉलर के रक्षा सौदे फाइनल हुए हैं। रक्षा सचिव ने यह भी स्पष्ट किया कि इस मिसाइल का हवा से प्रक्षेपित किया जाने वाला संस्करण भी पूरी तरह तैयार है, जिसका सुखोई लड़ाकू विमानों पर सफल परीक्षण और प्रदर्शन किया जा चुका है।
मध्य एशिया तक पहुंची 'आकाश' मिसाइल की मारक क्षमता
ब्रह्मोस की सफलता के बाद, भारत की स्वदेशी कम दूरी की सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल 'आकाश' ने भी वैश्विक बाजार में अपनी धाक जमा ली है। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन यानी डीआरडीओ द्वारा विकसित और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों द्वारा निर्मित इस मिसाइल का उत्पादन अब पूरी तरह स्थिर हो चुका है, जिससे अंतरराष्ट्रीय ग्राहकों की मांग को समय पर पूरा किया जा रहा है।
पश्चिमी एशियाई देश आर्मेनिया द्वारा साल 2022 में इस प्रणाली को चुने जाने के बाद, अब मध्य एशिया के अन्य देशों ने भी इसमें गहरी दिलचस्पी दिखाई है। आर्मेनिया को आकाश मिसाइलों की डिलीवरी 2024 से शुरू हो चुकी है। अब इस कड़ी में ताजिकिस्तान और तुर्कमेनिस्तान के नाम भी जुड़ गए हैं, जिन्हें इन घातक मिसाइलों का निर्यात आरंभ कर दिया गया है।
फ्रांसीसी कमांडर ने की स्वदेशी तेजस की तारीफ
एक तरफ जहां भारतीय मिसाइलें ग्लोबल मार्केट में धूम मचा रही हैं, वहीं दूसरी तरफ भारत के स्वदेशी लड़ाकू विमान 'तेजस' ने विदेशी रक्षा विशेषज्ञों का दिल जीत लिया है। राजस्थान के जोधपुर में आयोजित भारतीय वायुसेना के बहुराष्ट्रीय युद्धाभ्यास 'तरंग शक्ति' में भाग ले रहे फ्रांसीसी एयर डिफेंस के डिप्टी कमांडर जूलियन सबेने ने तेजस की जमकर प्रशंसा की है।
"तेजस ने उड़ान भरने के बाद मुझे फ्रांस के पुराने और ऐतिहासिक मिराज 2000 लड़ाकू विमान की याद दिला दी। आसमान में राफेल के साथ तेजस का तालमेल वाकई जबरदस्त है और यह भारत की बढ़ती तकनीकी संप्रभुता का बड़ा प्रमाण है।" — जूलियन सबेने, डिप्टी कमांडर, फ्रांसीसी एयर डिफेंस
फ्रांसीसी अधिकारी का यह बयान इस बात का गवाह है कि भारतीय विमानन उद्योग अब वैश्विक मानकों पर खरा उतर रहा है। भारत और फ्रांस के पास राफेल विमानों का वास्तविक युद्धक अनुभव है, जिससे दोनों देश आपसी रणनीतिक संवाद और अनुभव साझा कर रहे हैं।
आत्मनिर्भरता से ग्लोबल सुपरपावर बनने की ओर कदम
भारत सरकार का मुख्य उद्देश्य देश को रक्षा उत्पादन के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाना था, लेकिन अब यह नीति ग्लोबल डिफेंस एक्सपोर्ट का एक बड़ा इंजन बन गई है। रक्षा क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले वर्षों में भारत के रक्षा निर्यात के आंकड़े और भी ऊंचे स्तर पर पहुंचेंगे। मित्र देशों की बढ़ती रक्षा आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए भारत अब एक भरोसेमंद और लागत प्रभावी विकल्प के रूप में उभर रहा है।
भारतीय रक्षा उद्योगों, विशेषकर बीडीएल और बीईएल जैसी कंपनियों की उत्पादन क्षमता में भारी इजाफा हुआ है। घरेलू सुरक्षा बलों की जरूरतों को पूरा करने के साथ-साथ ग्लोबल साउथ के देशों के लिए भारत सुरक्षा का एक मजबूत स्तंभ बनकर सामने आ रहा है। यह पूरी प्रक्रिया देश की अर्थव्यवस्था को गति देने के साथ-साथ वैश्विक कूटनीति में भारत के कद को और अधिक मजबूत कर रही है।







