नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — देश के कई हिस्सों में इस समय धान भंडारण को लेकर किसानों और प्रशासन की चिंताएं तेजी से बढ़ गई हैं। गूगल ट्रेंड्स पर अचानक उठे 'धान्य निल्ला' या धान भंडारण के इस विषय ने सबको चौंका दिया है। खेतों में फसल पककर तैयार है और कटाई का काम भी जोरों पर चल रहा है। लेकिन, सबसे बड़ा सवाल यह है कि इस बार किसानों द्वारा बेची जाने वाली फसल को रखा कहां जाएगा। सरकारी और निजी गोदामों में पहले से ही पिछले साल का अनाज बड़ी मात्रा में भरा हुआ है।
देश के प्रमुख कृषि राज्यों जैसे पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और छत्तीसगढ़ में हालात ज्यादा गंभीर नजर आ रहे हैं। हमारी टीम ने जब जमीनी स्तर पर जाकर मंडियों और गोदामों का जायजा लिया, तो स्थिति काफी चिंताजनक मिली। मंडियों में खुले आसमान के नीचे धान की बोरियां कतारों में रखी हुई हैं। अचानक बारिश या खराब मौसम होने पर इस खुले में रखे अनाज के खराब होने का खतरा बहुत ज्यादा बढ़ जाता है। किसान अपनी मेहनत की कमाई को बचाने के लिए तिरपाल और प्लास्टिक से बोरियों को ढकने की कोशिश कर रहे हैं।
गोदामों में जगह क्यों कम पड़ रही है?
इस संकट के पीछे सबसे बड़ा कारण पिछले सीजन में रिकॉर्ड उत्पादन और धीमी निकासी बताया जा रहा है। सरकार की तरफ से खाद्यान्न को दूसरे राज्यों या बंदरगाहों तक समय पर भेजने के लिए जैसी रफ्तार होनी चाहिए थी, वह नहीं दिख रही है। रेलवे रैकों की कमी और ढुलाई में देरी के कारण गोदामों से पुराना अनाज बाहर नहीं निकल पा रहा है। जब तक पुराने स्टॉक को बाहर नहीं भेजा जाएगा, तब तक नए धान को रखने के लिए जगह बनना नामुमकिन है। अधिकारी इस समस्या से निपटने के लिए अब वैकल्पिक जगहों की तलाश कर रहे हैं।
राज्य सरकारों और भारतीय खाद्य निगम के बीच इस मुद्दे पर लगातार बैठकों का दौर जारी है। सरकार का दावा है कि किसानों का एक-एक दाना एमएसपी पर खरीदा जाएगा और उसे सुरक्षित रखने के पुख्ता इंतजाम किए जा रहे हैं। लेकिन जमीन पर तस्वीर अभी भी बहुत धुंधली नजर आ रही है। कई जगहों पर साइलो और आधुनिक गोदाम बनाने के वादे कागजों तक ही सीमित रहे हैं। समय पर बुनियादी ढांचा तैयार न होने का खामियाजा अंततः देश के अन्नदाता किसानों को ही भुगतना पड़ रहा है।
किसानों और मंडियों पर इसका सीधा असर
गोदामों में जगह न होने की वजह से मंडियों में खरीद की प्रक्रिया भी धीमी पड़ गई है। आढ़तियों और व्यापारियों का कहना है कि जब तक पुराना धान गोदामों में जाएगा नहीं, तब तक नई आवक को संभालना बहुत मुश्किल होगा। इस वजह से कई मंडियों में किसानों को अपनी ट्रैक्टर ट्रॉलियों के साथ कई-कई दिनों तक इंतजार करना पड़ रहा है। किसानों को अपनी फसल औने-पौने दामों पर बेचने का डर भी सताने लगा है क्योंकि वे खुले में ज्यादा दिन तक फसल को नहीं रख सकते हैं।
इस पूरी स्थिति ने देश की कृषि वितरण और भंडारण व्यवस्था की पोल खोलकर रख दी है। यदि समय रहते इस समस्या का कोई ठोस हल नहीं निकाला गया, तो आने वाले दिनों में किसानों का गुस्सा सड़कों पर फूट सकता है। सरकार को तुरंत प्रभाव से विशेष ट्रेनें चलाकर पुराने अनाज को अन्य राज्यों में भेजना चाहिए। द फ्रीलान्स की टीम इस पूरे मामले पर लगातार नजर बनाए हुए है और आगे भी जमीनी अपडेट आप तक पहुंचाती रहेगी।
भविष्य के लिए क्या तैयारी कर रही है सरकार?
इस गंभीर संकट से सबक लेते हुए अब प्रशासनिक स्तर पर दीर्घकालिक योजनाओं पर विचार किया जा रहा है। सरकार निजी क्षेत्र की मदद से बड़े पैमाने पर साइलो यानी आधुनिक धातु के गोदाम बनाने की योजना पर काम कर रही है। इन आधुनिक गोदामों में अनाज लंबे समय तक सुरक्षित रहता है और कीटों का खतरा भी कम होता है। हालांकि, इन परियोजनाओं को जमीन पर उतरने में अभी कुछ महीनों या सालों का समय लग सकता है, लेकिन तात्कालिक राहत के लिए अभी भी आपातकालीन कदम उठाने की सख्त जरूरत है।








