तेल अवीव और वाशिंगटन से आ रही ग्राउंड रिपोर्ट बताती है कि पश्चिम एशिया का भू-राजनीतिक नक्शा एक बार फिर तेजी से बदल रहा है। लाल सागर और यमन के रास्ते इजराइल पर लगातार हमले कर रहे हूती विद्रोहियों से निपटने के लिए अब कूटनीतिक और सैन्य मोर्चे पर नए समीकरण बन रहे हैं। इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने अमेरिका के माध्यम से सऊदी अरब तक एक अहम संदेश पहुंचाया है। इस संदेश का मुख्य मकसद क्षेत्रीय सुरक्षा के साझा मोर्चे पर आपसी तालमेल बढ़ाना है ताकि ईरान समर्थित हूती मिलिशिया के बढ़ते खतरों का मिलकर मुकाबला किया जा सके।
इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में हाल ही में सऊदी अरब की राजधानी रियाद के आसमान में सुनी गई तेज धमाकों की आवाजें और मिसाइल हमले हैं। सऊदी रक्षा बलों ने दावा किया है कि उन्होंने देश के हवाई क्षेत्र की तरफ बढ़ रही एक खतरनाक बैलिस्टिक मिसाइल को हवा में ही नष्ट कर दिया। इस घटना के बाद खाड़ी देशों की चिंताएं काफी बढ़ गई हैं। सऊदी अरब पहले से ही यमन सीमा पर हूती हमलों से जूझता रहा है। अब रियाद और तेल अवीव के बीच अप्रत्यक्ष रूप से संवाद के रास्ते तलाशने की कोशिशें तेज हो गई हैं, जिसमें अमेरिका मुख्य मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है।
लाल सागर में सुरक्षा और इजराइल की नई सैन्य रणनीति
हूती विद्रोहियों ने पिछले कुछ महीनों में अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक जहाजों और इजराइल के दक्षिणी बंदरगाहों को अपना मुख्य निशाना बनाया है। इससे वैश्विक समुद्री व्यापार मार्ग बुरी तरह प्रभावित हुआ है। इजराइल की नौसेना और वायुसेना लगातार इन खतरों से निपटने के लिए अपनी ऑपरेशनल क्षमताएं बढ़ा रही हैं। प्रधानमंत्री नेतन्याहू का यह संदेश इस बात का संकेत है कि इजराइल अकेले के बजाय क्षेत्रीय सहयोग के साथ इन ताकतों को घेरना चाहता है। सऊदी अरब और अन्य खाड़ी देशों के पास इस क्षेत्र में मजबूत रडार और डिफेंस सिस्टम मौजूद हैं, जिनका उपयोग इस साझा खतरे से निपटने में किया जा सकता है।
दूसरी ओर, कूटनीतिक गलियारों में इस बात की चर्चा भी तेज है कि अमेरिका इस पूरे मामले में एक बड़े क्षेत्रीय गठबंधन की रूपरेखा तैयार कर रहा है। वाशिंगटन चाहता है कि इजराइल और अरब देश मिलकर ईरान समर्थित प्रॉक्सी संगठनों के खिलाफ एक मजबूत दीवार खड़ी करें। हालांकि, सऊदी अरब की तरफ से अभी तक इस प्रस्ताव पर कोई आधिकारिक और खुला बयान सामने नहीं आया है, लेकिन खुफिया और कूटनीतिक स्तर पर बैठकों का दौर लगातार जारी है। क्षेत्रीय मामलों के जानकारों का मानना है कि आने वाले दिनों में पश्चिम एशिया की राजनीति में बहुत बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं।
जासूसी और सुरक्षा घेराबंदी के बीच कूटनीतिक सुगबुगाहट
इसी बीच, पश्चिम एशिया से जुड़े कूटनीतिक घटनाक्रमों के साथ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सुरक्षा एजेंसियों की सक्रियता भी चरम पर है। हाल ही में तकनीकी कंपनियों और कूटनीतिक कार्यालयों के भीतर जासूसी की घटनाओं ने सुरक्षा चिंताओं को और गहरा कर दिया है। इन तमाम घटनाओं का असर सीधे तौर पर मध्य एशिया और खाड़ी देशों की सुरक्षा नीतियों पर पड़ रहा है। सऊदी अरब जैसे देश अपनी आंतरिक और बाहरी सुरक्षा को लेकर बेहद सतर्क हो गए हैं क्योंकि हूती विद्रोहियों की ओर से लगातार आधुनिक हथियारों और ड्रोन्स का इस्तेमाल किया जा रहा है।
द फ्रीलान्स की ग्राउंड पड़ताल बताती है कि आने वाले हफ्तों में लाल सागर और यमन सीमा पर तनाव और अधिक बढ़ सकता है। इजराइल अपनी रक्षा के लिए हरसंभव कदम उठाने के मूड में है और अमेरिकी प्रशासन इस कसमकस के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है। सऊदी अरब के लिए यह स्थिति इसलिए भी संवेदनशील है क्योंकि वह अपने विजन के तहत देश में आर्थिक सुधार और विकास के बड़े प्रोजेक्ट चला रहा है, जिन्हें क्षेत्रीय अशांति से भारी नुकसान पहुंच सकता है। यही वजह है कि कूटनीतिक चैनलों के जरिए पर्दे के पीछे बातचीत की रफ्तार काफी तेज हो चुकी है।
क्षेत्रीय स्थिरता पर मंडराते खतरे और भविष्य के समीकरण
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा प्रभाव पूरे पश्चिम एशिया की अर्थव्यवस्था और सुरक्षा पर पड़ रहा है। तेल आपूर्ति के मुख्य रास्ते और समुद्री मार्ग फिलहाल उच्च खतरे के दायरे में हैं। भारत और अन्य एशियाई देशों के लिए भी यह चिंता का विषय है क्योंकि इस क्षेत्र में होने वाली किसी भी हलचल का सीधा असर ऊर्जा सुरक्षा और कच्चे तेल की कीमतों पर पड़ता है। कूटनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि सऊदी अरब और इजराइल किसी साझा सुरक्षा समझौते पर आगे बढ़ते हैं, तो आने वाले समय में यमन और हूती विद्रोहियों के खिलाफ एक बड़ा संयुक्त सैन्य या कूटनीतिक अभियान देखने को मिल सकता है।






