जयपुर एयरपोर्ट पर उस वक्त हड़कंप मच गया जब जर्मनी के फ्रैंकफर्ट शहर से आ रही एअर इंडिया की एक बड़ी उड़ान को लेकर अचानक हाईजैक का खतरा मंडराने लगा। विमान में सवार यात्रियों और चालक दल के लिए यह किसी डरावने सपने जैसा था। जैसे ही विमान भारतीय वायु सीमा के करीब पहुंचा, एयर ट्रैफिक कंट्रोल को एक ऐसा सिग्नल मिला जिसने सुरक्षा महकमे की नींद उड़ा दी। तुरंत प्रभाव से विमान को उसके तय रास्ते से डायवर्ट कर दिया गया और नजदीकी जयपुर अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर उतारने का फैसला लिया गया। जमीन पर उतरते ही केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल और स्थानीय पुलिस ने पूरे विमान को अपने घेरे में ले लिया ताकि किसी भी आपात स्थिति से तुरंत निपटा जा सके।
शुरुआती रिपोर्टों के अनुसार, यह पूरा संकट कॉकपिट से मिलने वाले एक खास कोड की वजह से पैदा हुआ था जिसे विमानन की भाषा में 'स्क्वाक 7500' कहा जाता है। यह कोड सीधे तौर पर अपहरण या हाईजैक की स्थिति को दर्शाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। जैसे ही यह कोड एक्टिव हुआ, विमानन नियंत्रण कक्ष में लाल बत्तियां जल उठीं और पलक झपकते ही दिल्ली से लेकर जयपुर तक के तमाम बड़े अधिकारी हरकत में आ गए। विमान के टायर जैसे ही जयपुर के रनवे पर टिके, राहत की सांस ली गई। सुरक्षा अधिकारियों ने तुरंत विमान की सघन तलाशी शुरू कर दी ताकि यह पता लगाया जा सके कि आखिर यह कोड किसी खतरे की वजह से बजा था या इसके पीछे कोई तकनीकी चूक थी।
कॉकपिट में कैसे एक्टिव हुआ खौफनाक सिग्नल 7500
इस पूरी घटना के सामने आने के बाद सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि आखिर आधुनिक विमान के कॉकपिट में यह हाईजैक सिग्नल कैसे एक्टिव हो गया। नागर विमानन महानिदेशालय और अन्य तकनीकी विशेषज्ञों की टीमें अब इस बात की गहराई से जांच कर रही हैं कि क्या यह पायलट की तरफ से कोई गलती से दबाया गया बटन था या फिर सिस्टम में कोई बड़ी तकनीकी खराबी आई थी। इस तरह के कोड बेहद संवेदनशील माने जाते हैं और इन्हें बहुत सावधानी से डिजाइन किया जाता है ताकि पायलट आपातकाल में बिना ज्यादा बात किए जमीन पर बैठे अधिकारियों को अपनी सही स्थिति बता सके। जानकारों का कहना है कि कई बार विमान के ट्रांसपोंडर में तकनीकी गड़बड़ी आने की वजह से ऐसे झूठे सिग्नल हवा में प्रसारित हो जाते हैं जो बाद में बड़ी परेशानी का सबब बन जाते हैं।
यात्रियों के लिए यह अनुभव बेहद तनावपूर्ण और डरावना रहा क्योंकि उन्हें शुरुआत में यह नहीं पता था कि उनके विमान के साथ आसमान में क्या चल रहा है। जब विमान को अचानक जयपुर की तरफ मोड़ा गया और भारी सुरक्षा के बीच उतारा गया, तब जाकर यात्रियों को समझ आया कि मामला कितना गंभीर था। विमान के उतरने के बाद सुरक्षाबलों ने एक-एक यात्री और उनके सामान की बेहद बारीकी से जांच की। कई घंटों की लंबी पूछताछ और तकनीकी मु मुआयने के बाद जब अधिकारियों को यह पक्का यकीन हो गया कि विमान के अंदर किसी भी तरह का कोई खतरा नहीं है, तब जाकर सभी ने राहत की सांस ली। एयर इंडिया के अधिकारियों ने भी बाद में पुष्टि की कि विमान सुरक्षित है और किसी भी अप्रिय स्थिति की कोई पुष्टि नहीं हुई है।
जांच के घेरे में एयर इंडिया की फ्लाइट और ट्रांसपोंडर प्रणाली
इस घटना के बाद से विमानन सुरक्षा मानकों को लेकर एक बार फिर से गंभीर बहस छिड़ गई है कि क्या हमारे संचार तंत्र इतने संवेदनशील हैं कि एक छोटी सी तकनीकी चूक भी पूरे देश के सुरक्षा तंत्र को हिला सकती है। नागर विमानन महानिदेशालय ने इस पूरे मामले की विस्तृत रिपोर्ट तलब कर ली है और एयर इंडिया के तकनीकी स्टाफ से भी पूछताछ की जा रही है। विमान के पायलट और को-पायलट से भी लिखित में स्पष्टीकरण मांगा गया है ताकि यह साफ हो सके कि कॉकपिट में उस वक्त असल में क्या बातचीत चल रही थी। एयरलाइंस कंपनियों के लिए यह एक बड़ा सबक है कि वे अपने विमानों के इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की जांच उड़ान भरने से पहले कितनी सख्ती से करें ताकि हवा में यात्रियों की जान जोखिम में न पड़े।
जयपुर एयरपोर्ट प्रशासन ने भी इस आपातकालीन लैंडिंग के दौरान अपनी मुस्तैदी का परिचय देते हुए कम से कम समय में सभी सुरक्षा प्रोटोकॉल को पूरा किया। दमकल की गाड़ियां, एम्बुलेंस और बम निरोधक दस्ते को तुरंत रनवे के पास तैनात कर दिया गया था ताकि किसी भी संभावित खतरे से तुरंत मुकाबला किया जा सके। गनीमत यह रही कि यह पूरी घटना सिर्फ एक झूठी अफवाह और तकनीकी गड़बड़ी तक ही सीमित रही और किसी भी यात्री को खरोंच तक नहीं आई। हालांकि, इस तरह की घटनाएं बार-बार होना विमानन सुरक्षा पर एक सवालिया निशान जरूर लगाती हैं जिनका जवाब अब संबंधित जांच एजेंसियों को जल्द से जल्द देना होगा ताकि भविष्य में ऐसी गलतियों से बचा जा सके।






