संयुक्त राष्ट्र के मंच से भारत की दो टूक
अंतरराष्ट्रीय मंचों पर जब भी देश के हितों और वैश्विक शांति की बात आती है, भारत अपनी बात को बेहद बेबाकी से रखता है। न्यूयॉर्क में आयोजित संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें सत्र के दौरान देश के विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने अपने संबोधन से पूरी दुनिया का ध्यान खींचा। उन्होंने अपने भाषण में वैश्विक कूटनीति, आपसी संघर्ष, और आतंकवाद जैसे संवेदनशील मुद्दों पर खुलकर अपनी राय रखी। उनका यह भाषण ऐसे समय में आया है जब दुनिया के कई हिस्से युद्ध और तनाव की आग में झुलस रहे हैं।
विदेश मंत्री ने अपने संबोधन की शुरुआत करते हुए इस बात पर गहरी चिंता जताई कि आज भी दुनिया के विभिन्न कोनों में जारी टकराव मानवता के लिए सबसे बड़ा संकट बने हुए हैं। उन्होंने याद दिलाया कि संयुक्त राष्ट्र का मूल उद्देश्य ही दुनिया में शांति और सुरक्षा की स्थापना करना था, लेकिन आज यह संस्थाएं कई मोर्चों पर कमजोर होती दिख रही हैं। शांति बनाए रखने में नाकामी का सीधा असर आम नागरिकों के विकास और प्रगति की रफ्तार पर पड़ता है।
वैश्वीकृत दुनिया की हकीकत का जिक्र करते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि भूगोल की सीमाएं अब संघर्ष के प्रभावों को रोक नहीं सकतीं। दुनिया के किसी भी कोने में भड़की जंग का असर पूरी मानव जाति और अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बिरादरी की यह जिम्मेदारी बन जाती है कि वे कूटनीतिक रास्तों से समाधान निकालें और बातचीत के जरिए तनाव को कम करने का प्रयास करें।
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आतंकवाद और सद्भावना साथ-साथ नहीं चल सकते
अपने भाषण के दौरान विदेश मंत्री ने आतंकवाद के मुद्दे पर भारत के अडिग रुख को एक बार फिर दुनिया के सामने रखा। आतंकवाद के खिलाफ देश की जीरो टॉलरेंस की नीति को दोहराते हुए उन्होंने बिना नाम लिए पाकिस्तान को करारा जवाब दिया। उन्होंने बहुत ही स्पष्ट शब्दों में कहा कि जो देश या ताकतें वर्षों से आतंकवाद को बढ़ावा देती आ रही हैं, उन्हें अब अपना रवैया बदलना होगा।
जयशंकर ने कड़े शब्दों में कहा कि एक तरफ आतंकवाद को संरक्षण देना और दूसरी तरफ दोस्ती और सद्भावना की बात करना कतई संभव नहीं है। उन्होंने इस दोमुंही नीति को बेनकाब करते हुए कहा कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश करने से सच्चाई छिप नहीं सकती। आतंकवाद मानवता का सबसे बड़ा दुश्मन है और इसके खात्मे के लिए पूरी दुनिया को बिना किसी दोहरे मापदंड के एकजुट होना पड़ेगा।
"आतंकवाद फैलाने वालों को अब अपना रवैया बदलना ही होगा। दोस्ती और सद्भावना की बातें आतंकवाद के साए में नहीं चल सकतीं, और भारत इस मामले में पूरी तरह स्पष्ट है।" — डॉ. एस. जयशंकर, विदेश मंत्री, भारत सरकार
समुद्री सुरक्षा और वैश्विक व्यापार पर मंडराता खतरा
वैश्विक व्यापार और सप्लाई चेन की सुरक्षा का मुद्दा उठाते हुए विदेश मंत्री ने अंतरराष्ट्रीय जलमार्गों पर बढ़ते खतरों पर गहरी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि कमर्शियल शिपिंग और समुद्र में काम करने वाले कर्मचारियों को निशाना बनाया जाना किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं किया जा सकता। अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों की सुरक्षा पूरी दुनिया के आर्थिक स्वास्थ्य के लिए बेहद जरूरी है।
उन्होंने सभी पक्षों से अपील की कि वे अत्यधिक संयम बरतें और यह सुनिश्चित करें कि किसी भी स्थिति में निर्दोष नागरिकों की सुरक्षा से समझौता न हो। सप्लाई चेन में रुकावटें डालने और व्यापारिक मार्गों को बाधित करने वाली नीतियां वैश्विक अर्थव्यवस्था को गहरे संकट में धकेल रही हैं, जिससे पार पाने के लिए सामूहिक प्रयासों की आवश्यकता है।
यूक्रेन युद्ध और प्रधानमंत्री मोदी के संदेश की गूंज
यूक्रेन में लंबे समय से चल रहे संघर्ष का जिक्र करते हुए जयशंकर ने बताया कि यह जंग अब अपने पांचवें साल में प्रवेश कर चुकी है, जो पूरी मानवता के लिए एक गंभीर चिंता का विषय है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उस ऐतिहासिक संदेश को दोहराया जिसमें उन्होंने कहा था कि आज का दौर युद्ध का नहीं है और इस अंतहीन संघर्ष का अब फौरन अंत होना चाहिए।
उन्होंने जोर देकर कहा कि बल प्रयोग से किसी समस्या का स्थाई समाधान नहीं निकल सकता। बातचीत और कूटनीति ही एकमात्र ऐसा रास्ता है जिससे इस संकट को समाप्त किया जा सकता है। युद्ध के कारण ऊर्जा और खाद्य सुरक्षा पर जो असर पड़ा है, उसने विकासशील देशों की कमर तोड़ दी है.
'4F' संकट और ग्लोबल साउथ की चुनौतियां
विदेश मंत्री ने अपने संबोधन में 'ग्ローバル साउथ' यानी विकासशील और गरीब देशों की व्यथा को भी जोरदार तरीके से उठाया। उन्होंने बताया कि आज ग्लोबल साउथ के देश एक भारी-भरकम '4F' संकट से जूझ रहे हैं। इसका मतलब भोजन (Food), ईंधन (Fuel), उर्वरक (Fertilizer) और वित्त (Finance) की सुरक्षा का गंभीर संकट है।
उन्होंने आधुनिक कूटनीति की आलोचना करते हुए कहा कि आज हर चीज को हथियार के रूप में इस्तेमाल करने की प्रवृत्ति बढ़ गई है। वित्त और बाजारों तक पहुंच को सीमित करना, तकनीक के हस्तांतरण को रोकना और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं को बाधित करना ऐसी रणनीतियां हैं जो विकासशील देशों के भविष्य को अंधकार में धकेल रही हैं।
पश्चिम एशिया और फिलिस्तीन पर भारत का रुख
पश्चिम एशिया के हालातों पर बात करते हुए भारत ने अपनी मानवीय प्रतिबद्धताओं को दोहराया। जयशंकर ने बताया कि भारत फिलिस्तीनी नागरिकों के लिए लगातार राहत सामग्री और मानवीय सहायता पहुंचा रहा है। इस क्षेत्र में स्थायी शांति स्थापित करने के लिए भारत का दृढ़ विश्वास है कि 'टू-स्टेट सॉल्यूशन' (दो-राष्ट्र समाधान) ही एकमात्र व्यावहारिक रास्ता है।
उन्होंने अंत में चेतावनी दी कि यदि दुनिया लगातार खतरों, अविश्वास और दबाव की राजनीति से घिरी रही, तो यह एक गहरी खाई के किनारे खड़े होने जैसा होगा, जहां से जरा सी चूक भारी तबाही ला सकती है। सच्ची शांति के लिए आपसी भरोसा, सुरक्षा और स्थिरता का माहौल बनाना सबसे बड़ी शर्त है।








