नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — देश की राजनीति और कानून की दुनिया में इन दिनों वरिष्ठ वकील और सांसद कपिल सिब्बल चर्चा के केंद्र में हैं। पिछले कुछ घंटों के दौरान सुप्रीम कोर्ट के भीतर और बाहर जो कुछ हुआ, उसने हर किसी का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। एक मामले की सुनवाई के दौरान जब कपिल सिब्बल ने अदालत में अपनी बात रखी, तो मुख्य न्यायाधीश यानी सीजेआई ने उन्हें कड़ी फटकार लगाई। सीजेआई ने साफ शब्दों में कहा कि उन्हें अपनी बात के लिए सफाई देनी होगी। यह पूरा मामला देखते ही देखते मीडिया की सुर्खियों में छा गया और इस पर बहस छिड़ गई।
इस गरमागरम माहौल के बीच कपिल सिब्बल का एक और बयान सामने आया, जिसने राजनीतिक गलियारों में खलबली मचा दी। उन्होंने 'वन नेशन-वन इलेक्शन' को लेकर संसदीय समिति के सुप्रीम कोर्ट के दौरे पर तीखा हमला बोला। उन्होंने इस पूरे घटनाक्रम को पूरी तरह असंवैधानिक और एक गलत परंपरा करार दिया। उनका कहना था कि इस तरह के दौरों से न्यायपालिका की गरिमा और उसकी आजादी पर सवाल खड़े होते हैं। उनके इस बयान के बाद सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच जुबानी जंग और ज्यादा तेज हो गई है।
सुप्रीम कोर्ट पर बयान और 24 घंटे में यू-टर्न की चर्चा
इस बीच कपिल सिब्बल के बयानों को लेकर एक और बड़ी चर्चा सोशल मीडिया और कानूनी हलकों में तेजी से फैल रही है। महज चौबीस घंटे के भीतर उनके रुख में आए बदलाव को लोग यू-टर्न बता रहे हैं। पहले अदालत के कामकाज को लेकर उनके मन में जो अविश्वास दिखाई दे रहा था, वह अचानक आभार में बदल गया। अदालत में उनकी 'नो फेथ' यानी अविश्वास वाली टिप्पणी पर सुप्रीम कोर्ट की तरफ से भी तीखा जवाब आया। अदालत ने साफ किया कि जनता और वकीलों का भरोसा ही सबसे बड़ी ताकत है और इस पर सवाल नहीं उठाया जाना चाहिए।
इन तमाम कानूनी और सियासी उठापटक के बीच कपिल सिब्बल केवल अदालतों तक ही सीमित नहीं रहे, बल्कि वे सामाजिक मुद्दों पर भी पूरी तरह सक्रिय दिखे। हाल ही में 'सिटीिजन्स फॉर पीस एंड जस्टिस' यानी सीजेपी की एक अहम प्रेस कॉन्फ्रेंस शुरू हुई। इस मंच पर कपिल सिब्बल के साथ जाने-माने अभिनेता प्रकाश राज और सामाजिक कार्यकर्ता प्रशांत भूषण भी एक साथ नजर आए। इन सभी दिग्गजों ने देश के मौजूदा हालात और बुनियादी अधिकारों के मुद्दों पर खुलकर अपनी बात रखी और सरकार की नीतियों पर सवाल उठाए।
बढ़ता सियासी तनाव और आगे की कानूनी लड़ाई
द फ्रीलान्स की ग्राउंड पड़ताल बताती है कि कपिल सिब्बल के ये बयान केवल साधारण कानूनी बयान नहीं हैं, बल्कि इनके दूरगामी राजनीतिक मायने भी हैं। एक तरफ जहां वे अदालत के भीतर बड़े मामलों की पैरवी कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ वे सड़क से लेकर संसद तक सरकार को घेरने का कोई मौका नहीं छोड़ रहे हैं। उनके हर एक बयान पर देश की निगाहें टिकी हुई हैं क्योंकि आने वाले दिनों में इसका असर कई बड़े मुकदमों और चुनावी रणनीतियों पर पड़ सकता है।
आम जनता के बीच भी इन बहसों को लेकर मिली-जुली प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। कुछ लोग वकीलों और नेताओं के इन बयानों को लोकतंत्र के लिए जरूरी मान रहे हैं, तो कुछ लोगों का मानना है कि इससे अदालती कामकाज में बेवजह की रुकावट पैदा होती है। आने वाले दिनों में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि सुप्रीम कोर्ट और वरिष्ठ वकीलों के बीच का यह रिश्ता किस करवट बैठता है और राजनीतिक दलों का अगला कदम क्या होगा।
कानून और राजनीति के मोर्चे पर लगातार गरमाता माहौल
हमारी पड़ताल में यह बात भी सामने आई है कि कानूनी मामलों पर सियासत का हावी होना देश की न्याय व्यवस्था के लिए एक नई चुनौती बनता जा रहा है। कपिल सिब्बल जैसे अनुभवी नेता और वकील जब मुखर होकर सरकार और अदालती व्यवस्था पर सवाल उठाते हैं, तो चर्चा का दायरा बहुत बड़ा हो जाता है। आने वाले हफ्तों में कई और बड़े मामलों की सुनवाई होनी है, ऐसे में देखना होगा कि वकीलों और जजों के बीच का यह संवाद किस दिशा में आगे बढ़ता है।






