सुरक्षा बलों को मिली बड़ी कामयाबी, एनकाउंटर में मारा गया कुख्यात आतंकी मूसा
जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद के खिलाफ जारी निर्णायक जंग में सुरक्षा बलों को एक और ऐतिहासिक सफलता हासिल हुई है। खुफिया तंत्र से मिली सटीक सूचना के आधार पर चलाए गए एक संयुक्त अभियान में भारतीय सेना और सुरक्षा एजेंसियों ने पाकिस्तान स्थित आतंकवादी संगठन लश्कर-ए-तैयबा के खतरनाक कमांडर सुलेमान शाह उर्फ 'मूसा' को मार गिराया है। यह मुठभेड़ सेंट्रल कश्मीर के बडगाम जिले के अंतर्गत आने वाले वन क्षेत्र में हुई, जहां सुरक्षा बलों ने उसे चारों तरफ से घेर लिया था।
अधिकारियों के मुताबिक, राष्ट्रीय राइफल्स और अन्य सुरक्षा बलों के जवानों ने इलाके में संदिग्ध गतिविधियों को भांपते हुए घेराबंदी शुरू की थी। जैसे ही जवानों ने आतंकियों को सरेंडर करने की चेतावनी दी, वैसे ही उनकी तरफ से भारी गोलीबारी शुरू कर दी गई। सेना ने पूरी बहादुरी और संयम के साथ इस हमले का मुंहतोड़ जवाब दिया और भीषण गोलीबारी के बाद इस खूंखार आतंकवादी को ढेर कर दिया। मूसा लंबे समय से सुरक्षा एजेंसियों के राडार पर था और उसकी तलाश में कई बड़े अभियान चलाए जा रहे थे.
बता दें कि इस महीने की शुरुआत में भी यूसमर्ग की पहाड़ियों में सुरक्षा बलों के साथ उसकी मुठभेड़ हुई थी, लेकिन तब वह अंधेरे और घने जंगलों का फायदा उठाकर भाग निकलने में कामयाब रहा था। उस मुठभेड़ में उसका करीबी सहयोगी यासिर मारा गया था, जिसके बाद से सुरक्षा बलों ने उस पर शिकंजा और कस दिया था। आखिरकार दूधपथरी और गुरवतकलां के जंगलों में चले गहन अभियान के दौरान सुरक्षा बलों ने उसके खात्मा करने में सफलता प्राप्त कर ली।
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'ऑपरेशन शेरुवाली' के तहत रची गई थी रणनीतिक व्यूहरचना
आतंकी मूसा के खात्मे की यह कार्रवाई कोई अचानक उठाया गया कदम नहीं था, बल्कि यह केंद्रीय गृह मंत्रालय और सुरक्षा एजेंसियों की एक सुनियोजित रणनीति का हिस्सा था। इस बड़े मिशन को 'ऑपरेशन शेरुवाली' नाम दिया गया था, जिसे मई 2026 में विधिवत रूप से शुरू किया गया था। इस खुफिया ऑपरेशन के तहत सुरक्षा बल पिछले कई महीनों से घाटी में छिपे आतंकियों के हर एक मूवमेंट, उनके छिपने के ठिकानों और उनके लॉजिस्टिक नेटवर्क पर पैनी नजर रखे हुए थे।
तकनीकी और मानवीय खुफिया तंत्र (ह्यूमन इंटेलिजेंस) से पुख्ता जानकारी मिलने के बाद, देश की शीर्ष सुरक्षा एजेंसियों ने एक अचूक रणनीति तैयार की थी। इसके तहत जम्मू-कश्मीर पुलिस, सेना और अन्य सुरक्षा बलों ने आपसी तालमेल बैठाते हुए आतंकियों के सुरक्षित ठिकानों को एक-एक करके ध्वस्त करना शुरू किया। 'ऑपरेशन शेरुवाली' ने साबित कर दिया है कि भारत विरोधी ताकतों के पास अब घाटी में छिपने के लिए कोई सुरक्षित जगह नहीं बची है और सुरक्षा बल देश की संप्रभुता की रक्षा के लिए पूरी तरह मुस्तैद हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के सुनियोजित और खुफिया आधारित अभियानों ने आतंकवादियों की कमर तोड़ दी है। स्थानीय स्तर पर मिलने वाली जानकारियों और सेना के अत्याधुनिक उपकरणों के इस्तेमाल से आतंकियों के पास अब भागने का कोई रास्ता नहीं बचता है। 'ऑपरेशन शेरुवाली' ने एक बार फिर यह दिखा दिया है कि भारतीय सुरक्षा बल किसी भी बड़े खतरे से निपटने के लिए पूरी तरह सक्षम और तैयार हैं।
2022 से घाटी में खौफ का पर्याय बने चार कमांडरों के मॉड्यूल का अंत
इस एनकाउंटर का सबसे बड़ा रणनीतिक महत्व यह है कि इसके साथ ही लश्कर-ए-तैयबा के उस विशेष आतंकी मॉड्यूल का पूरी तरह सफाया हो गया है, जो साल 2022 से जम्मू-कश्मीर में लगातार सक्रिय था। गृह मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, इस मॉड्यूल में चार बेहद शातिर और खूंखार कमांडर शामिल थे, जिन्होंने राज्य में कई सनसनीखेज वारदातों को अंजाम देकर दहशत फैलाने की कोशिश की थी। इन चारों कमांडरों के खात्मे से लश्कर का नेटवर्क अब लगभग पूरी तरह छिन्न-भिन्न हो चुका है।
इस चार सदस्यीय आतंकी समूह में जुनैद भट, सुलेमान, यासिर और मूसा उर्फ आसिफ फौजी शामिल थे। सुरक्षा बलों ने अपनी अलग-अलग सुनियोजित कार्रवाइयों में इस गिरोह के सभी सदस्यों को एक-एक करके मौत के घाट उतार दिया है। इस सिलसिले की शुरुआत 3 दिसंबर 2024 को हुई थी, जब डाचीगाम में एक मुठभेड़ के दौरान जुनैद भट मारा गया था। इसके बाद 28 जुलाई 2025 को 'ऑपरेशन महादेव' के तहत दूसरे कमांडर सुलेमान को ढेर किया गया।
इस कड़ी में आगे बढ़ते हुए सुरक्षा बलों ने 4 सितंबर 2026 को 'ऑपरेशन असधर' के दौरान यासिर को मार गिराया और अंततः 30 सितंबर 2026 को बडगाम में मूसा उर्फ आसिफ फौजी को भी निष्प्रभावी कर दिया गया। इन चारों कमांडरों के मारे जाने से लश्कर-ए-तैयबा को ऐसा आघात लगा है जिससे उबरना उसके लिए पाकिस्तान स्थित आकाओं के वास्ते भी आसान नहीं होगा।
कई बड़े और घातक आतंकी हमलों का मास्टरमाइंड था मूसा
मरा गया आतंकवादी मूसा केवल एक साधारण आतंकी नहीं था, बल्कि वह पीर पंजाल पर्वतमाला के दोनों ओर पिछले कई वर्षों से हुए तमाम खूनी हमलों का मुख्य साजिशकर्ता था। उसने घाटी में अशांति फैलाने और सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने के लिए कई कायराना वारदातों को अंजाम दिया था। गृह मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार, उसका मॉड्यूल अगस्त 2023 के चर्चित हलान हमले और दिसंबर 2023 के डेरा की गली (DKG) हमले में सीधे तौर पर शामिल रहा था। इन हमलों में देश ने अपने कई वीर जवानों को खोया था।
इसके अतिरिक्त, यह खूंखार मॉड्यूल मई 2023 के कांडी हमले, मई 2024 के शाहसितार हमले और जून 2024 के शिव खोरी हमले से भी जुड़ा हुआ था। इतना ही नहीं, अक्टूबर 2024 में हुए गगनगीर आतंकी हमले और उसी महीने बूटापथरी में हुई हिंसक वारदात में भी इसी गिरोह के आतंकवादियों ने मासूम नागरिकों और श्रमिकों को निशाना बनाया था। इसके अलावा अप्रैल 2025 में बैसरन में हुई घटना भी इसी नेटवर्क के काले कारनामों का हिस्सा थी।
इन लगातार हमलों ने सुरक्षा एजेंसियों और सरकार के सामने एक बड़ी चुनौती खड़ी कर दी थी, जिसके बाद से ही इन आतंकियों के खात्मे के लिए विशेष ब्लूप्रिंट तैयार किया गया था। मूसा के मारे जाने के बाद अब इन सभी जघन्य मामलों के मुख्य आरोपियों का हिसाब पूरा हो चुका है, जिससे कश्मीरी अवाम और सुरक्षा बलों ने राहत की सांस ली है।
आतंकी नेटवर्क के खात्मे पर देश के सुरक्षा तंत्र का रुख
सुरक्षा मामलों के जानकारों का कहना है कि मूसा जैसे खूंखार आतंकवादियों का मारा जाना पाकिस्तान समर्थित आतंकी संगठनों के लिए एक बड़ा संदेश है। यह इस बात का प्रमाण है कि भारत की सुरक्षा और संप्रभुता के खिलाफ साजिश रचने वालों को किसी भी कीमत पर बख्शा नहीं जाएगा। भारतीय सेना, सीआरपीएफ और जम्मू-कश्मीर पुलिस के बीच आपसी समन्वय ने पिछले कुछ वर्षों में आतंकवाद के खात्मे में मील का पत्थर साबित होने वाले परिणाम दिए हैं।
घाटी में सुरक्षा बलों की बढ़ती चौकसी और अत्याधुनिक सर्विलांस सिस्टम की वजह से आतंकियों के लिए अपने नापाक मंसूबों को अंजाम देना लगभग असंभव हो गया है। स्थानीय लोगों का भी अब आतंकियों से मोहभंग हो चुका है और वे विकास की मुख्यधारा के साथ जुड़ना चाहते हैं। यही वजह है कि आतंकवादियों को अब न तो स्थानीय स्तर पर कोई पनाह मिल पा रही है और न ही लॉजिस्टिक सपोर्ट।
"आतंकवाद के खिलाफ हमारी लड़ाई पूरी प्रतिबद्धता और दृढ़ संकल्प के साथ जारी रहेगी। घाटी से आतंक के हर एक साये को मिटाने के लिए हमारे सुरक्षा बल पूरी तरह से संकल्पित हैं।" — रक्षा मंत्रालय के उच्च पदस्थ सूत्र
निष्कर्ष के तौर पर कहा जा सकता है कि मूसा का अंत जम्मू-कश्मीर में शांति और स्थिरता की बहाली की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है। हालांकि सुरक्षा एजेंसियां अभी भी किसी भी संभावित खतरे से निपटने के लिए पूरी तरह सतर्क हैं और तलाशी अभियान जारी रखे हुए हैं ताकि यदि कोई अन्य छिपा हुआ आतंकी हो तो उसे भी जल्द से जल्द ठिकाने लगाया जा सके।








