महाराष्ट्र में सूखे की विकराल मार, तीन चौथाई हिस्से में अकाल का साया
देश के सबसे बड़े और आर्थिक रूप से मजबूत राज्यों में गिने जाने वाले महाराष्ट्र इस समय गंभीर प्राकृतिक आपदा से जूझ रहा है। राज्य सरकार ने स्थिति की गंभीरता को देखते हुए एक बड़ा और कड़ा निर्णय लिया है। प्रदेश के कुल 358 तालुकों में से 265 तालुकों को आधिकारिक रूप से सूखाग्रस्त घोषित कर दिया गया है। आंकड़ों के लिहाज से देखें तो यह पूरे महाराष्ट्र का करीब 75 प्रतिशत हिस्सा है, जो इस वक्त पानी की भयंकर कमी और फसलों की बर्बादी का सामना कर रहा है। सरकार द्वारा ट्रिगर-1 के प्रावधानों को लागू करने के बाद यह कदम उठाया गया है ताकि प्रभावित क्षेत्रों में प्रशासनिक मशीनरी को युद्ध स्तर पर सक्रिय किया जा सके।
खेती किसानी पर आधारित बड़ी आबादी के लिए यह संकट किसी वज्रपात से कम नहीं है। बारिश के मौसम में बादलों की बेरुखी और मानसून के कमजोर रहने के कारण जलाशयों का जलस्तर लगातार नीचे गिरता चला गया। खेतों में नमी न होने की वजह से खरीफ की फसलें या तो उग ही नहीं पाईं या फिर शुरुआती दौर में ही सूख गईं। अन्नदाताओं की महीनों की मेहनत और पूंजी मिट्टी में मिल चुकी है, जिससे ग्रामीण इलाकों की अर्थव्यवस्था चरमरा गई है।
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कृषि संकट और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर गहराता असर
जब किसी बड़े भूभाग पर लंबे समय तक पानी की एक बूंद भी नहीं बरसती, तो उसका असर केवल खेतों तक सीमित नहीं रहता। महाराष्ट्र के इन 265 तालुकों में आज हालात यह हैं कि पीने के पानी के लिए भी महिलाओं को मीलों दूर का सफर तय करना पड़ रहा है। पशुओं के लिए चारे का संकट खड़ा हो गया है, जिसके कारण किसानों को अपने पालतू जानवरों को बचाने में भारी मशक्कत करनी पड़ रही है। ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर समाप्त हो चुके हैं, क्योंकि जब जमीन पर फसल ही नहीं होगी, तो मजदूरों को काम कहां से मिलेगा।
इस आर्थिक तंगी और बदहाली का नतीजा यह हो रहा है कि गांवों से बड़े पैमाने पर लोगों का पलायन शुरू हो गया है। आजीविका की तलाश में किसान और ग्रामीण परिवार अपने पुरखों के घरों को छोड़कर शहरों की तरफ रुख करने को मजबूर हैं। शहरों की अनियोजित बस्तियों पर इसका अतिरिक्त दबाव बढ़ रहा है और दूसरी ओर गांवों की सामाजिक संरचना कमजोर हो रही है। बच्चों की पढ़ाई और परिवारों की सेहत पर भी इस अकाल का सीधा और बुरा असर पड़ रहा है।
प्रशासनिक और संवैधानिक प्रक्रिया: सूखा घोषित करने के मायने
भारत के संघीय ढांचे में प्राकृतिक आपदाओं से निपटने की प्राथमिक जिम्मेदारी राज्य सरकारों की होती है। केंद्र सरकार इस प्रक्रिया में मुख्य रूप से एक मार्गदर्शक की भूमिका निभाती है और वित्तीय मदद या दिशा-निर्देश मुहैया कराती है। जब राज्य में सूखा जैसी स्थिति उत्पन्न होती है, तो सरकार वैज्ञानिक पैमानों और जमीनी रिपोर्ट के आधार पर अकाल का ऐलान करती है। इसमें बारिश के आंकड़ों, उपग्रह से प्राप्त तस्वीरों, फसल की बुवाई की स्थिति और भूजल के स्तर का बारीकी से अध्ययन किया जाता है।
मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व वाली महाराष्ट्र सरकार ने तमाम पैमानों पर स्थिति का आकलन करने के बाद ही यह कड़ा निर्णय लिया है। सरकार का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि प्रभावित इलाकों तक जल्द से जल्द सरकारी सहायता पहुंच सके। बैंक ऋणों की वसूली पर रोक, बिजली बिलों में राहत, बच्चों की स्कूल फीस माफ करने और विशेष राहत पैकेज के जरिए जनता को संभालने की योजना पर काम चल रहा है।
"किसानों की आंखों में आंसू और उनके माथे पर चिंता की लकीरें सरकार के लिए सबसे बड़ी प्राथमिकता हैं। इस आपदा की घड़ी में राज्य का प्रत्येक नागरिक और अन्नदाता सुरक्षित रहे, इसके लिए प्रशासन पूरी ताकत से काम कर रहा है। किसी को भी अकेला नहीं छोड़ा जाएगा।"— देवेंद्र फडणवीस, मुख्यमंत्री, महाराष्ट्र
राहत और बचाव कार्यों की रूपरेखा और भविष्य की चुनौतियां
सूखे की इस मार से उबरना आसान नहीं होगा, लेकिन प्रशासन ने कमर कस ली है। जिन इलाकों में पेयजल की भारी किल्लत है, वहां टैंकरों के जरिए पानी पहुंचाने के निर्देश दिए गए हैं। इसके अलावा मनरेगा के तहत ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर सृजित किए जा रहे हैं ताकि पलायन को रोका जा सके। पशुओं के लिए विशेष शिविर लगाए जा रहे हैं जहां मुफ्त चारा और चिकित्सा उपलब्ध कराई जा रही है।
भविष्य की चुनौतियों को देखते हुए जल संरक्षण और सिंचाई परियोजनाओं को प्राथमिकता के आधार पर पूरा करने की जरूरत महसूस की जा रही है। राज्य सरकार लंबे समय से नदी जोड़ो अभियानों और वाटरशेड विकास कार्यक्रमों पर जोर दे रही है ताकि आने वाले वर्षों में महाराष्ट्र को इस तरह के भीषण सूखे का सामना न करना पड़े। फिलहाल, सबसे बड़ी चुनौती इन 265 तालुकों के करोड़ों लोगों को इस आपदा से सुरक्षित बाहर निकालने की है।








