पश्चिम बंगाल की राजनीति में नाटकीय बदलाव
भारतीय राजनीतिक गलियारों में समझौते और गठबंधन की परिभाषाएं अक्सर बदलती रहती हैं, लेकिन पश्चिम बंगाल के सियासी मैदान में जो तस्वीर अब उभर रही है, वह बेहद हैरान करने वाली है। दशकों तक एक-दूसरे के खून के प्यासे रहे राजनीतिक दल आज बदली हुई परिस्थितियों में एक मंच पर आने की जुगत भिड़ा रहे हैं। खासकर तृणमूल कांग्रेस सुप्रीमो ममता बनर्जी का रुख इस मामले में सबसे ज्यादा चर्चा का विषय बना हुआ है। कभी वामपंथियों के खिलाफ आक्रामक तेवर अपनाकर बंगाल की सत्ता पर काबिज होने वाली ममता बनर्जी का आज लेफ्ट की तरफ हाथ बढ़ाना भारतीय राजनीति के बदलते समीकरणों की एक नई दास्तां कह रहा है।
यह सियासी बदलाव अचानक नहीं आया है, बल्कि इसके पीछे राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष को एकजुट करने की एक सोची-समझी रणनीति काम कर रही है। सीपीआई(एम) महासचिव एमए बेबी की ओर से चुनाव आयोग और स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी एसआईआर के मुद्दे पर विपक्षी दलों को एक पत्र भेजा गया था। इस पत्र में सभी दलों से आपसी मतभेद भुलाकर संयुक्त मोर्चेबंदी करने की अपील की गई थी। इस पहल के बाद ही ममता बनर्जी ने आगे बढ़कर लेफ्ट नेतृत्व से संपर्क साधा और फोन पर लंबी चर्चा की। दोनों नेताओं के बीच आगामी विपक्षी बैठकों और साझा रणनीति को लेकर महत्वपूर्ण संवाद हुआ है, जिसने राजनीतिक विश्लेषकों को नए सिरे से सोचने पर मजबूर कर दिया है।
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सेरामपुर की जनसभा में ममता का बड़ा संदेश
कुछ दिन पहले सेरामपुर में आयोजित एक विशाल जनसभा के दौरान ममता बनर्जी ने अपने पुराने तेवर से बिल्कुल अलग हटकर बयान दिया। उन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा कि अब यह पूछने या देखने का कोई औचित्य नहीं बचा है कि कौन लाल झंडे वाला है, कौन नीला है और कौन पीला है। उनके इस बयान के गहरे राजनीतिक निहितार्थ निकाले जा रहे हैं। मुख्यमंत्री ने साफ कर दिया कि मौजूदा समय में वैचारिक मतभेदों को दरकिनार करके केवल और केवल विपक्षी एकजुटता पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है। उन्होंने आगामी 30 सितंबर को प्रस्तावित इंडिया ब्लॉक की बैठक का हवाला देते हुए सभी क्षेत्रीय और राष्ट्रीय दलों से आपसी अहंकार त्यागकर एकजुट होने का आह्वान किया।
हालांकि, राजनीतिक जानकारों का मानना है कि ममता बनर्जी के मुंह से इस तरह की बातें सुनना बंगाल की जनता और जमीन पर संघर्ष करने वाले कार्यकर्ताओं के लिए आसान नहीं है। जिस पार्टी का वजूद ही वामदलों के खिलाफ दो दशक लंबे हिंसक और वैचारिक संघर्ष की कोख से निकला हो, उस पार्टी के सर्वोच्च नेता का अपनी धुर विरोधी विचारधारा के साथ गलबहियां करना कई तरह के सवाल खड़े करता है। बंगाल की राजनीति में वामपक्ष और तृणमूल के बीच का द्वंद केवल चुनावी नहीं, बल्कि अस्तित्व की लड़ाई रहा है। ऐसे में अचानक से पुरानी कड़वाहट को भुला देने का संदेश देना एक बड़ा राजनीतिक जोखिम भी साबित हो सकता है।
ऐतिहासिक दुश्मनी और संघर्ष की लंबी दास्तां
यदि हम बंगाल के राजनीतिक इतिहास के पन्नों को पलटें तो यह साफ नजर आता है कि ममता बनर्जी की राजनीतिक पहचान ही वाममोर्चा के विरोध की बुनियाद पर खड़ी हुई है। वर्ष 1998 में जब उन्होंने कांग्रेस से अलग होकर अपनी नई राजनीतिक जमीन तलाशनी शुरू की, तो उनका एकमात्र एजेंडा लेफ्ट फ्रंट के 34 साल पुराने शासन को खत्म करना था। इसके बाद के डेढ़ दशक तक बंगाल की सड़कों से लेकर विधानसभा तक केवल एक ही गूंज सुनाई देती थी—तृणमूल बनाम सीपीएम। राज्य के कोने-कोने में दोनों दलों के कार्यकर्ताओं के बीच टकराव की अनगिनत कहानियां आज भी लोगों के जेहन में ताजा हैं।
लंबी राजनीतिक तपस्या और जनआंदोलनों के बाद आखिरकार साल 2011 का वह ऐतिहासिक दिन आया, जब ममता बनर्जी के नेतृत्व में कांग्रेस और तृणमूल के गठबंधन ने वामदलों के दुर्ग को ध्वस्त कर दिया। इसके बाद से लगातार ममता बनर्जी वामपंथियों को बंगाल के पिछड़ेपन और विनाश के लिए जिम्मेदार ठहराती रहीं। लेकिन आज वक्त का पहिया इतनी तेजी से घूमा है कि वही दोनों ताकतें राष्ट्रीय परिदृश्य में एक-दूसरे की पूरक बनने की कोशिश कर रही हैं। दशकों पुराने तीखे आरोपों, हमलों और सियासी जख्मों का बिना कोई हिसाब-किताब चुकाए इस तरह गले मिलना बंगाल के आम मतदाताओं को असमंजस में डाल रहा है.
"जो पार्टी कभी सीपीएम के लंबे और दमनकारी शासन के खिलाफ संघर्ष करके सत्ता में आई थी, आज वही सीपीएम उसकी राजनीतिक साझेदार बनती जा रही है। यह बंगाल की जनता के साथ सीधा धोखा है।" — शुभेंदु अधिकारी, नेता प्रतिपक्ष, पश्चिम बंगाल
राष्ट्रीय पटल पर ममता के बार-बार बदलते सियासी पाले
यदि राष्ट्रीय राजनीति के कैनवास पर ममता बनर्जी के सफर को देखा जाए, तो उनका इतिहास लगातार समझौते और अवसर के अनुकूल पाला बदलने का गवाह रहा है। साल 1999 में जब अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में एनडीए सरकार बनी, तो तृणमूल कांग्रेस उसका हिस्सा बन गई और ममता बनर्जी ने रेल मंत्रालय की कमान संभाली। हालांकि, सालभर के भीतर ही उन्होंने एनडीए का दामन छोड़ दिया, लेकिन फिर 2003 में वे वापस वाजपेयी सरकार में शामिल हो गईं और कोयला व खान मंत्रालय संभाला। इसके बाद साल 2009 के लोकसभा चुनाव में वे कांग्रेस नीत यूपीए-2 सरकार के साथ जुड़ीं और एक बार फिर रेल मंत्री की कुर्सी संभाली।
लेकिन यह गठबंधन भी ज्यादा लंबा नहीं चल सका। साल 2012 आते-आते ममता बनर्जी ने मल्टी-ब्रांड खुदरा व्यापार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश यानी एफडीआई, डीजल के दामों में बढ़ोतरी और रसोई गैस यानी एलपीजी पर सब्सिडी सीमित करने जैसे कड़े फैसलों का विरोध करते हुए केंद्र सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया। इस प्रकार, भाजपा कभी उनकी सहयोगी रही तो कभी प्रमुख राजनीतिक निशाना बनी। कांग्रेस के साथ भी उनके संबंध उतार-चढ़ाव से भरे रहे और अब वामदलों के साथ उनका यह नया समीकरण इस बात की तस्दीक करता है कि राजनीति में कोई भी स्थाई दोस्त या दुश्मन नहीं होता, केवल तात्कालिक राजनीतिक जरूरतें ही सर्वोपरि होती हैं।
लेफ्ट कैडर में असमंजस और वैचारिक भंवर
राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी एकता की कवायद भले ही सुगबुगाहट पैदा कर रही हो, लेकिन जमीनी स्तर पर इसका असर बिल्कुल अलग है। सीपीआई(एम) के स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं के लिए तृणमूल कांग्रेस के साथ किसी भी तरह का तालमेल बिठाना आसान नहीं है। पार्टी नेताओं का यह कहना है कि यह कोई चुनावी गठबंधन नहीं है, बल्कि केवल कुछ खास संवैधानिक और प्रशासनिक मुद्दों पर विपक्ष को एक मंच पर लाने की कोशिश है। इसके बावजूद, बंगाल के वामपंथी कार्यकर्ता इस नए समीकरण को लेकर बेहद सतर्क और असहज नजर आ रहे हैं। उनका मानना है कि दशकों तक जिस पार्टी के अत्याचारों के खिलाफ उन्होंने लाठियां खाईं, आज उसी के साथ खड़े होने से पार्टी की मूल विचारधारा पर सवालिया निशान लग सकते हैं।
वरिष्ठ लेफ्ट नेता सुजान चक्रवर्ती ने अपने बयानों में स्पष्ट किया है कि पार्टी का भाजपा विरोध कोई नया नहीं है और वे अकेले भी भगवा दल का मुकाबला करने में सक्षम हैं। उनका यह बयान इस बात का साफ संकेत है कि बंगाल की कम्युनिस्ट यूनिट ममता बनर्जी के साथ किसी भी प्रकार की जल्दबाजी भरी राजनीतिक समझ के प्रति बेहद सतर्क रहना चाहती है। वे अच्छी तरह जानते हैं कि तृणमूल का पूरा राजनीतिक वजूद ही उनके खात्मे पर टिका था। ऐसे में, महज राष्ट्रीय स्तर के कुछ बड़े नेताओं के कहने पर जमीन पर अपनी राजनीतिक पहचान को दांव पर लगाना लेफ्ट कैडर के लिए किसी बड़े खतरे से खाली नहीं होगा।
निष्कर्ष: सुविधा की राजनीति का नया दौर
कुल मिलाकर, पश्चिम बंगाल से लेकर दिल्ली तक फैली यह पूरी सियासी पटकथा इस बात की गवाही देती है कि राजनीति में विचारधाराएं अक्सर तात्कालिक सत्ता समीकरणों और चुनावी मजबूरियों के आगे घुटने टेक देती हैं। जब ममता बनर्जी को भाजपा के साथ की जरूरत महसूस हुई, वे एनडीए का हिस्सा बन गईं; जब कांग्रेस का साथ मुफीद लगा, वे यूपीए में शामिल हो गईं; और जब बंगाल में अपनी जड़ें जमानी थीं, तो उन्होंने एंटी-लेफ्ट आंदोलनों को अपनी राजनीति की मुख्य धुरी बना लिया। आज जब उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर एक बड़े सियासी मंच और विपक्षी सुरक्षा कवच की दरकार है, तो वे एक बार फिर अपने सबसे पुराने दुश्मन की ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाने से नहीं हिचकिचा रही हैं। यह घटनाक्रम भारतीय लोकतंत्र के उस कड़वे सच को उजागर करता है, जहां वफादारियां और सिद्धांत मौसम की तरह बदलते रहते हैं।









