सिनेमा के दिग्गज ममूटी के सम्मान पर क्यों भड़के कट्टरपंथी?
भारतीय फिल्म इंडस्ट्री में अपने बेजोड़ अभिनय और संजीदा किरदारों के लिए पहचाने जाने वाले दिग्गज अभिनेता ममूटी इन दिनों एक अजीबोगरीब विवाद के केंद्र में आ गए हैं। कला और संस्कृति की दुनिया में अपनी अलग पहचान बना चुके इस अभिनेता को हाल ही में उनकी बहुचर्चित फिल्म 'भ्रमयुगम' के लिए प्रतिष्ठित नेशनल फिल्म अवॉर्ड से सम्मानित किया गया है। इसी सिलसिले में उनकी एक यात्रा के दौरान का वीडियो सामने आया, जिसने सोशल मीडिया पर बहस छेड़ दी है।
घटना गुजरात की है, जहां एक कार्यक्रम के दौरान आयोजकों ने भारतीय संस्कृति की प्राचीन परंपरा के अनुसार अभिनेता का स्वागत किया। इस स्वागत के दौरान उनके माथे पर तिलक लगाया गया और पारंपरिक अंदाज में उनका सत्कार किया गया। जैसे ही यह वीडियो इंटरनेट पर प्रसारित हुआ, कुछ कट्टरपंथी तत्वों ने इस पर आपत्ति जताना शुरू कर दिया। इन लोगों का तर्क था कि एक मुस्लिम अभिनेता होने के नाते उन्हें माथे पर तिलक नहीं लगवाना चाहिए था।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर इस मामूली सी घटना को लेकर एक वर्ग द्वारा जिस तरह की टिप्पणियां की गईं, उसने एक बार फिर समाज में फैली संकीर्ण मानसिकता को उजागर कर दिया है। कला और संस्कृति को सीमाओं से परे मानने वाले कलाकारों को धर्म के दायरे में बांधने की यह कोशिश अब आम लोगों और अन्य कलाकारों के बीच चर्चा का विषय बन गई है।
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सोशल मीडिया पर छिड़ी बहस और ट्रोलर्स के निशाने पर अभिनेता
इंटरनेट की आभासी दुनिया में इन दिनों हर छोटी बात पर बतंगड़ बनाने का ट्रेंड सा बन गया है। ममूटी के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। एक्स और इंस्टाग्राम जैसे प्लेटफॉर्म्स पर कुछ यूजर्स ने वीडियो साझा करते हुए अभिनेता के खिलाफ अभद्र और आपत्तिजनक टिप्पणियां लिखनी शुरू कर दीं। उनका दावा था कि यह कृत्य इस्लामिक मान्यताओं के विरुद्ध है।
हालांकि, इस तरह के ट्रोलर्स की संख्या भले ही सीमित हो, लेकिन उनके द्वारा फैलाई जा रही नकारात्मकता समाज के ताने-बाने को प्रभावित करने का काम करती है। एक तरफ जहां देश-विदेश के करोड़ों प्रशंसक ममूटी की कला और उनकी सादगी के कायल हैं, वहीं दूसरी तरफ कुछ लोग हर बात में धर्म का चश्मा पहनकर नफरत का बीज बोने की कोशिश में लगे रहते हैं।
विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह की घटनाएं इस बात का प्रमाण हैं कि आज के दौर में सार्वजनिक जीवन जीने वाले लोगों को किस तरह की अनुचित ट्रोलिंग का सामना करना पड़ता है। बावजूद इसके, ममूटी की तरफ से इस विवाद पर कोई भी प्रतिक्रिया न देना उनकी परिपक्वता को दर्शाता है, जो अपने काम से आलोचकों को जवाब देना बेहतर समझते हैं।
हरिश्री यूसुफ का करारा जवाब: 'धर्म इंसानियत सिखाता है, नफरत नहीं'
जब सोशल मीडिया पर कट्टरपंथियों द्वारा ममूटी को निशाना बनाया जा रहा था, तब मलयालम सिनेमा के जाने-माने अभिनेता और फिल्ममेकर हरिश्री यूसुफ खुलकर आगे आए। उन्होंने इंस्टाग्राम पर एक वीडियो संदेश जारी कर इन ट्रोलर्स की सोच पर तीखा प्रहार किया और उन्हें संस्कृति का सही पाठ पढ़ाया।
हरिश्री यूसुफ ने अपने वीडियो में स्पष्ट शब्दों में कहा कि किसी भी मेहमान का स्वागत करना और परंपरा का सम्मान करना हमारी संस्कृति का हिस्सा है। उन्होंने जोर देकर कहा कि धर्म का असली मकसद इंसानों को बेहतर और संवेदनशील बनाना है, न कि उन्हें आपस में लड़ाना और दूरियां बढ़ाना।
"तिलक लगाना अतिथियों के स्वागत की हमारी साझा भारतीय परंपरा है। धर्म का मकसद इंसानों को बेहतर इंसान बनाना है, न कि इस तरह की क्षुद्र बातों पर आपस में नफरत फैलाना। हमें अपनी संस्कृति और आपसी भाईचारे पर गर्व होना चाहिए न कि छोटी सोच पर।" — हरिश्री यूसुफ, अभिनेता एवं फिल्ममेकर
फिल्ममेकर ने कुएं के मेंढक जैसी मानसिकता रखने वाले लोगों को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि जो लोग ऐसी बातों पर विवाद खड़ा करते हैं, वे असल में समाज की खूबसूरती और विविधता को समझ नहीं पाते। उनका यह वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है और समझदार नागरिक इसकी सराहना कर रहे हैं।
भारतीय संस्कृति और साझा विरासत की असली ताकत
भारत जैसे विविधता से भरे देश में विभिन्न धर्मों और संस्कृतियों का संगम ही इसकी असली ताकत रहा है। यहां कला, संगीत और सिनेमा ने कभी भी धर्म की दीवारों को स्वीकार नहीं किया। ममूटी जैसे कलाकार दशकों से अपने अभिनय के जरिए करोड़ों दिलों पर राज कर रहे हैं और उनकी कला किसी एक मजहब की मोहताज नहीं है।
समाज सुधारकों और बुद्धिजीवियों का मानना है कि इस तरह के विवाद केवल उन लोगों द्वारा खड़े किए जाते हैं जिनका समाज में सकारात्मक योगदान शून्य होता है। वे केवल विवादों के जरिए अपनी उपस्थिति दर्ज कराना चाहते हैं। आम जनता को ऐसी संकीर्ण बहसों से ऊपर उठकर देश की साझा संस्कृति को मजबूत करने पर ध्यान देना चाहिए।
अंततः, यह पूरा वाकया एक बार फिर यह सोचने पर मजबूर करता है कि हम किस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं जहां एक साधारण सी आत्मीय परंपरा को भी नफरत का अस्त्र बनाया जा रहा है। जरूरत इस बात की है कि हरिश्री यूसुफ जैसे समझदार कलाकारों की आवाज को समर्थन मिले ताकि नफरत फैलाने वाले तत्वों के मंसूबे कामयाब न हो सकें।







